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गुजरात दंगे: इंसाफ के लिये कुछ सुलगते सवाल! 

संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने 24 जून, 2022 को 50 साल पुराने रो बनाम वेड निर्णय को 6-3 के बहुमत से उलट दिया। 1973 का रो निर्णय महिला अधिकार के दृष्टिकोण से ऐतिहासिक था। 1973 के इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्वीकार किया था कि अमेरिका का संविधान महिलाओं को गर्भपात का अधिकार देता है। 1973 में न्यायालय ने समूचे अमेरिका के विभिन्न राज्यों में चल रहे गर्भपात विरोधी क़ानूनों को ख़त्म कर दिया था। लेकिन अब वही सर्वोच्च न्यायालय उसी संविधान से निकलने वाले इस गर्भपात के अधिकार को मानने से इनकार कर रहा है।

संविधान एक ही है पर न्यायाधीश बदल गए हैं और शायद इसलिए संविधान से मिलने वाले अधिकारों के स्वरूप और मात्रा को भी बदल दिया गया है। ऐसी चर्चा है कि इस नए निर्णय को देने वाली न्यायपीठ में कंजरवेटिव न्यायाधीशों का बहुमत था। मतलब साफ है कि न्याय की उपलब्धता में विचारों को थैले के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। 

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1973 में जिस समय अमेरिका का सर्वोच्च न्यायालय इस ऐतिहासिक निर्णय को दे रहा था उसके लगभग 3 महीने बाद अप्रैल 1973 में भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी केशवानंद भारती मामले में अपना निर्णय सुना रहा था। 13 न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने 7-6 के बहुमत से संविधान की ‘आधारभूत संरचना’ का सिद्धांत दिया। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय संसद की शक्ति को सीमित करते हुए कहा कि संसद अनुच्छेद-368 के तहत संविधान के किसी भी भाग का संशोधन कर सकती है लेकिन ऐसे किसी भी संशोधन से संविधान के आधारभूत ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए।

न्यायालय ने संविधान के भाग-3 में दिए गए मूल अधिकारों को संविधान का आधारभूत अंग माना। ऐसा ही एक मूल अधिकार है, अनुच्छेद-14 जो कि प्रत्येक नागरिक को कानून के समक्ष समता का अधिकार तथा कानून का समान संरक्षण प्रदान करता है। दुर्भाग्य यह है कि भारत में मूल अधिकारों की होली वर्ष में कई बार जलती है; उसके अगले दिन और आने वाले कई दिनों तक प्रशासन और सरकारें मनमाने ‘रंग’ खेलते हैं।

गुजरात दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी (वर्तमान प्रधानमंत्री) की भूमिका को लेकर जाकिया जाफ़री ने सर्वोच्च न्यायालय में एक अर्जी दाखिल की थी। जिसे 24 जून, 2022 को खारिज कर दिया गया। 2002 में गोधरा में साबरमती ट्रेन में आग लगने के कारण अयोध्या से लौट रहे 59 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी। 27 फरवरी 2002 को घटी इस दुर्घटना के अगले दिन से ही गुजरात में मुस्लिम विरोधी दंगे शुरू हो गए। उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे। 28 फरवरी को गुलबर्ग सोसाइटी में हुए हत्याकांड में कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की निर्ममता से हत्या कर दी गई। तब से लेकर आजतक उनकी 82 वर्षीय पत्नी जाकिया जाफ़री न्याय के लिए संघर्षरत हैं। 

सर्वोच्च न्यायालय ने 2008 में गुजरात सरकार से गुजरात दंगों को लेकर SIT बनाने का निर्देश दिया था। इस SIT ने 2012 में अपनी क्लोजर रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी समेत 64 अन्य लोगों को क्लीन चिट दे दी थी।

जाकिया इसके खिलाफ गुजरात उच्च न्यायालय गईं लेकिन वहाँ उनकी याचिका खारिज कर दी गई। अंत में जाकिया भारत के सर्वोच्च न्यायालय पहुंचीं ताकि SIT की रिपोर्ट को चैलेंज कर सकें। लेकिन जस्टिस खानविलकर की पीठ ने न सिर्फ उनकी याचिका खारिज कर दी बल्कि कुछ ऐसी टिप्पणियाँ भी कीं जिनकी अपेक्षा न्यायपालिका से कम ही रहती है।

न्यायमूर्ति खानविलकर की पीठ ने दिसंबर 2021 में ही जाकिया जाफरी के मामले की सुनवाई पूरी करके अपना निर्णय रिजर्व कर लिया था। 24 जून 2022 को 452 पेज के अपने निर्णय को सुनाते हुए जस्टिस खानविलकर ने जाकिया जाफरी की “वृहद् षड्यंत्र’ (लार्जर कॉन्सपिरेसी) की याचिका पर कहा कि यदि गुजरात दंगों में वृहद् षड्यंत्र के तर्क को स्वीकार कर लिया जाए तो क्या गोधरा में ट्रेन के जलने को भी वृहद् षड्यंत्र के दायरे में ले आना चाहिए? न्यायमूर्ति खानविलकर ने एक खास किस्म के तर्क को प्रवेश देकर स्वयं ही स्वयं के निर्णय पर प्रश्न उठा दिया। यदि उन्हें कहीं से भी लगता है कि गोधरा ट्रेन कांड एक लार्जर कॉन्सपिरेसी का हिस्सा है तो उन्हें इस कांड की दोबारा जाँच के आदेश दे देने चाहिए थे। इस मामले में आखिर सर्वोच्च न्यायालय से अधिक सक्षम कौन सी संस्था है? क्या किसी एक संशय को दूर करने के लिए दूसरे संशय को प्रश्रय देना न्यायसंगत लगता है?

विमर्श से ख़ास

न्यायमूर्ति खानविलकर ने SIT की रिपोर्ट पर विश्वास जताते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता जिससे उनके खिलाफ़ कोई मुक़दमा चलाया जाए। उन्होंने कहा कि SIT की जांच सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में तथा एमिकस क्यूरी के कठोर सुपरविजन में हुई है। लेकिन तथ्य यह है कि SIT की नियुक्ति और कार्य प्रक्रिया पर शुरुआत से ही आरोप लगते रहे हैं। 2008 में सर्वोच्च न्यायालय के तीन जज, न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत, न्यायमूर्ति सतशिवम और न्यायमूर्ति आफताब आलम की पीठ ने गुजरात सरकार से, गुजरात सरकार के ही खिलाफ SIT बनाने को कहा। मुझे नहीं पता कि न्याय का कौन सा सिद्धांत आरोपी को स्वयं की जांच का अधिकार देता है लेकिन प्रथम दृष्टया यह गलत प्रतीत होता है। इतना ही नहीं, जिन 5 लोगों को मिलाकर SIT बनाई गई उनमें से 3 गुजरात पुलिस के ही अधिकारी थे। ये तीनों ही अधिकारी तत्कालीन गुजरात सरकार के अंतर्गत ही कार्यरत थे। ऐसे में क्या गुजरात पुलिस के द्वारा गुजरात पुलिस की अक्षमता की जांच करना उचित था, खासकर तब जब राज्य के मुख्यमंत्री के ऊपर भी आरोप लग रहे हों? आगे चलकर SIT की रूपरेखा लगातार बदलती रही, बहुत से पुराने सदस्य चले गए और कई नए सदस्य आ गए।

जहां तक सवाल एमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन का है तो उन्होंने 2012 में अपनी रिपोर्ट, जोकि SIT की क्लोजर रिपोर्ट का ही एक हिस्सा थी, में कहा था कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 153 A (1)(a) व (b), 153 B (1)(c), 166 और 505 (2) के तहत मुक़दमा चलाया जा सकता है। द हिन्दू की एक रिपोर्ट के अनुसार राजू रामचंद्रन ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि उन्होंने (मुख्यमंत्री) पुलिस वालों को आदेश दिए थे कि “हिन्दू दंगाइयों पर कार्रवाई थोड़ी नर्म हो”। यहाँ तक कि राजू रामचंद्रन की रिपोर्ट के अनुसार उनके दंगे को संभालने के तरीकों और अप्रिय मीडिया भाषणों की वजह से स्थिति बिगड़ गई। यह अलग बात है कि SIT ने एमिकस क्यूरी के सभी दावों को खारिज कर दिया। शायद यह न्यायिक विषय ही है कि न्यायपालिका ने एमिकस क्यूरी के दावों को तवज्जो न देकर SIT को तवज्जो दी।

गुजरात दंगों के प्रकरण में कम से कम तीन लोग ऐसे सामने आए जिन्होंने तत्कालीन नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ बोला और बयान दिए। ये तीन लोग थे- गुजरात कैडर के आईपीएस संजीव भट्ट, गुजरात के पूर्व गृहमंत्री हरेन पंड्या और आईपीएस आर.बी. श्रीकुमार।

लेकिन जस्टिस खानविलकर ने अपने निर्णय में इन तीनों के बारे में लिखा कि “संजीव भट्ट, हरेन पंड्या और आर.बी. श्रीकुमार की गवाही इस मुद्दे को सिर्फ सनसनीखेज बनाने और राजनैतिक रूप देने की थी, यद्यपि यह सिर्फ झूठ से परिपूर्ण थी”। जस्टिस खानविलकर ने जो ऑब्जर्व किया वही कहा। न्यायपालिका का पूरा सम्मान करते हुए मेरे मन में कुछ प्रश्न उबल रहे हैं। 

प्रश्न बिल्कुल शुरुआत से जब SIT के गठन के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से कहा था। क्या यह कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इन्टरेस्ट का मामला नहीं था? राज्य सरकार अपने ही ख़िलाफ़ जांच कैसे ‘ईमानदारी’ से कर लेगी? जिन तीन जजों ने ऐसा आदेश दिया था, उनमें से एक जज को रिटायरमेंट के बाद काले धन पर गठित की गई दो सदस्यीय समिति का उपाध्यक्ष बनाया गया था, जबकि उन न्यायमूर्ति के खिलाफ स्वयं आयकर विभाग ने 2019 में कहा कि उन्होंने “2017-18 वर्ष के लिए 1.06 करोड़ रुपये तक की आय को छिपाया था”। अर्थात उन्होंने इस पर टैक्स नहीं दिया था। अंततः उन्होंने “विवाद से विश्वास ऐक्ट, 2020” के तहत लाई गई स्कीम के माध्यम से अपने प्रत्यक्ष कर विवाद को सुलझाया ताकि उन्हें किसी कानूनी कार्यवाही में न फंसना पड़े। 2008 की बेंच के दूसरे जज, जो कि भारत के मुख्य न्यायाधीश भी बने, उनको उनके रिटायरमेंट के बाद मोदी सरकार द्वारा एक राज्य का राज्यपाल बनाया गया।

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जो लोग गुजरात दंगों के लिए बनी SIT में शामिल हुए उन्हें बेहतरीन पद प्रदान किए गए। उदाहरण के लिए SIT में शामिल शिवानंद झा (आईपीएस) गुजरात पुलिस के DGP बनकर रिटायर हुए तो उनके साथ ही SIT में शामिल आशीष भाटिया, आईपीएस, वर्तमान में गुजरात के DGP हैं। बाद के दिनों में SIT में शामिल हुए वाई.सी. मोदी (आईपीएस) को 2017 में नेशनल इंवेस्टिगेटिव एजेंसी (NIA) का मुखिया बनाया गया और SIT के प्रमुख व पूर्व सीबीआई निदेशक आर.के. राघवन; जिन्होंने 2017 में SIT के चीफ के पद से स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दे दिया था उन्हें उसी वर्ष नवंबर में साइप्रस का उच्चायुक्त बना दिया गया। 

देखा जाए तो इसमें वास्तव में कोई परेशानी नहीं कि कोई आईपीएस अधिकारी NIA का चीफ बने या किसी राज्य का पुलिस प्रमुख। लेकिन संजीव भट्ट, आर बी श्रीकुमार और हरेन पंड्या को सिर्फ और सिर्फ नुकसान ही क्यों हुआ? क्या ये सिर्फ इत्तेफाक है कि आर बी श्रीकुमार द्वारा नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना के बाद उनका प्रमोशन रोक दिया गया? 1971 बैच के इस ऑफिसर को पहले कैट और फिर हाईकोर्ट में जाकर अपने को साबित करना पड़ा और अन्ततः यह काबिल अधिकारी रिटायरमेंट के बाद प्रमोशन के साथ DGP के पद से रिटायर हुआ। अचानक से राज्य सरकार को श्रीकुमार के खिलाफ 1987 का एक पुराना मामला मिल गया और इस मामले में उन पर चार्जशीट दाखिल कर दी गई। चार्जशीट की वजह से आज यह ऑफिसर अपनी पेंशन तक से वंचित है।

संजीव भट्ट ने जो बयान दिया उसके बाद उनके खिलाफ 90 के दशक का एक मामला खोल दिया गया और अब वो पिछले कई सालों से जेल में बंद (आजीवन कारावास) हैं।

बाबू बजरंगी नरोदा पटिया हत्याकांड का दोषी है। इस कांड में 97 मुस्लिमों की हत्या हुई जिनमें 36 औरतें और 35 बच्चे शामिल थे। इस आदमी को 2012 से 2016 के बीच 14 बार अल्पकालिक जमानतें मिलीं और फिर 2017 में साबरमती जेल में एक अटेंडेंट दिया गया और अंततः 2019 में उसे ‘स्वास्थ्य कारणों’ से जमानत पर रिहा कर दिया गया।  

अदालत के सरकार के खिलाफ बयान देने वाले आईपीएस आर बी श्रीकुमार के बयानों को सनसनीखेज और ‘असत्य से परिपूर्ण’ कहने के एक दिन बाद ही 25 जून को गुजरात स्पेशल फोर्स ने पहले तीस्ता सीतलवाड़ को और फिर गुजरात ATS ने आईपीएस आर बी श्रीकुमार को गिरफ्तार कर लिया। एक ताकतवर सरकार का विरोध कोई आसान काम नहीं है। सरकार के साथ टकराने वाले नागरिकों और नागरिक संगठनों को सिर्फ न्यायपालिका का ही सहारा होता है। 

संदेश क्या है? एक संदेश तो लोकतंत्र के लिए है और दूसरा नागरिकों के लिए। ये सवाल तो उठेगा कि जब स्वास्थ्य कारणों से बाबू बजरंगी जैसा कातिल छोड़ा जा सकता है तो सिद्दिक कप्पन जैसा पत्रकार क्यों नहीं? 35 बच्चों की हत्या का दोषी बाबू बजरंगी स्वास्थ्य कारणों से छोड़ा जा सकता है तो 85 साल के स्टैन स्वामी क्यों नहीं?

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वंदिता मिश्रा
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