एक दौर था जब भारत 200 सालों की ग़ुलामी के बाद आज़ाद हुआ देश था। भारत को सब कुछ शुरू से बनाना था। आर.सी. दत्त, एम.जी. रानाडे और दादाभाई नौरोजी ने भारत में अंग्रेज़ों द्वारा की गई आर्थिक लूट का व्यापक अध्ययन किया था। जब देश आज़ाद हुआ तब भारत के पास अथाह ग़रीबी, बीमारियों से पीड़ित अनगिनत लोग, व्यापक अशिक्षा जैसी गंभीर समस्याएं और चुनौतियाँ थीं। मुट्ठी भर की भारत की जीडीपी से ना मजबूत सेना बनाई जा सकती थी, न ही बड़े अस्पताल और शिक्षण संस्थान बनाये जा सकते थे, इसके बावजूद महात्मा गांधी के उत्तराधिकारी और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने जो उपलब्धि हासिल की, उतनी उपलब्धि उनके आगे आने वाली सरकारें नहीं प्राप्त कर सकीं। उस समय भारत में आईआईटी, एम्स, आईआईएम, डीआरडीओ, इसरो जैसे संस्थानों को खड़ा किया गया और BARC जैसे संस्थानों ने देश की सुरक्षा में नए आयाम जोड़े। उभरते और संभलते भारत को, जो युद्ध लड़ने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था क्योंकि उसके पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे, 25 सालों के छोटे से अंतराल में ही तीन-तीन युद्ध लड़ने पड़ गए। इतनी चुनौतियों के बाद भी उस समय भारत को कोई अपमानित नहीं कर सका।
भले ही भारत चीन के साथ युद्ध हार गया हो, भले ही अपने देश के लोगों के पेट को भरने के लिए देश के प्रधानमंत्री को अमेरिका तक जाना पड़ा हो, भले ही भारत को हथियार खरीदकर अपनी सुरक्षा करनी पड़ी हो लेकिन अपमान कभी नहीं हुआ। अगर अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन और उनके सलाहकार हेनरी किसिंजर ने भारत को कमजोर समझने की कोशिश भी की तो पीएम इंदिरा गांधी ने वो सबक सिखाया कि आजतक अमेरिकी प्रशासन उसे याद रखता है।
पीएम मोदी के दौर में भारत
आज़ादी के 75 साल हो चुके हैं और मुझे याद नहीं, न ही मैंने कहीं पढ़ा कि आख़िरी बार भारत इतना अपमानित कब हुआ था जितना इन दिनों हो रहा है। लेकिन किसी को यह भी तो नहीं पता था कि इस देश के इतिहास में ऐसा भी समय आयेगा, जब प्रधानमन्त्री की कुर्सी पर नरेंद्र मोदी आसीन होंगे। कोई यह भी नहीं जानता था कि नरेंद्र मोदी स्वतंत्र भारत के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री साबित होने वाले हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए और देश के प्रधानमंत्री बनने से पहले मोदी ने खुद ही अपनी पीठ ज़ोर ज़ोर से थपथपाई। ऐसा विज्ञापन किया और साबित करने की कोशिश की जैसे उनके पीएम बनते ही भारतीय अर्थव्यवस्था चीन और अमेरिका की अर्थव्यवस्था से भी आगे निकल जाएगी, भारत के किसी पड़ोसी देश के साथ सीमा विवाद नहीं होंगे, और पूरी दुनिया के तमाम बहुपक्षीय मंचों पर भारत की तूती बोलने लगेगी। आज पीएम मोदी के शासन के 12 साल बीत चुके हैं। सारा भ्रम टूट चुका है। पीएम मनमोहन सिंह के समय जो डॉलर 50-60 रुपये पर चलता था आज वो 92-93 रुपए पर चल रहा है, चीन ने गलवान जैसी घटना कर डाली, भारत की सीमा में घुसकर बस्तियाँ बना डालीं और पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत बस मुंह देखता रह गया, फ्लैग मीटिंग्स करता रह गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तो सारी सीमाएँ पार कर दीं। वो हर दूसरे दिन नरेंद्र मोदी का नाम लेकर भारत को अपमानित करते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति, कभी भारत की संप्रभुता को चुनौती देकर कहते हैं कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध ख़त्म करवाया, कभी बोलने लगते हैं कि जहाँ से मैं चाहूँगा वहीं से भारत कच्चा तेल ख़रीदेगा। भारत के हितों के ख़िलाफ़ राष्ट्रपति ट्रंप ने मोदी पर दबाव बनाकर ट्रेड-डील करवा डाली और आज तमाम मंचों पर जाकर बोलते हैं कि कल तक भारत, अमेरिका पर टैरिफ़ लगाता था और आज अमेरिका भारत पर टैरिफ़ लगा रहा है। ट्रम्प ने ये सारी बातें न जाने कितनी बार कहीं होंगी, अब तो इनकी गिनती करना मुश्किल हो गया है।
लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिम्मत नहीं हुई कि ट्रम्प को मुँहतोड़ जवाब देते। उन्होंने एक कमजोर और रीढ़विहीन नेता की तरह ट्रंप रूपी इस चुनौती का सामना ही नहीं किया।
संसद में विपक्ष की आवाज़
जब विपक्ष इन बातों का विरोध संसद में करता है तो संसद की ‘चेयर’ के माध्यम से विपक्ष की आवाज़ को भरपूर दबाने की कोशिश की जाती है, मीडिया में सिर्फ़ और सिर्फ़ पीएम मोदी का एजेंडा चलता है उन्हें विकास पुरुष, महान पुरुष और ना जाने क्या-क्या साबित करने के लिए एंकर अपनी जान भी दाँव पर लगाने को तैयार हैं। मतलब यह कि विपक्ष द्वारा प्रतिरोध के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले हर रास्ते को लगभग पूर्णतया बंद कर दिया गया है।
मोदी सरकार ने विपक्ष और देश के संस्थानों के साथ क्या-क्या किया है उसे फ्रीडम हाउस रिपोर्ट-2025 से समझ सकते हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार अब भारत ‘आंशिक रूप से फ्री’ देश है, पूर्णतया नहीं। इसके अलावा वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक-2025 को भी देख सकते हैं, इस सूचकांक में भारत 180 देशों के मुक़ाबले 151वें स्थान पर है। साफ़ है कि मोदीकाल के भारत में विरोध, प्रतिरोध और असहमति के लिए अब जगह नहीं है। इन शब्दों को और संबंधित कार्यकलापों को सरकार द्वारा पोषित मीडिया द्वारा देशद्रोह की तरह समझा जा रहा है।
यूथ कांग्रेस के प्रदर्शन की आलोचना क्यों?
नई दिल्ली में चल रही अंतरराष्ट्रीय AI समिट में, परिसर के भीतर जाकर इंडियन यूथ कांग्रेस (IYC) के कार्यकर्ताओं द्वारा शर्ट खोलकर किए गए विरोध प्रदर्शन को न सिर्फ़ मोदी सरकार बल्कि उनके द्वारा पोषित मीडिया और मीडिया का वो हिस्सा भी जिसे मेनस्ट्रीम का ‘अल्टरनेट’ कहा जाता है, वो भी इस विरोध प्रदर्शन को लेकर कांग्रेस की आलोचना कर रहा है। मेरी नजर में इसमें आलोचना बनती ही नहीं। असल में भारत में पत्रकारिता संभवतया कभी अपने परिपक्कव अवस्था में पहुँची ही नहीं। यह कहा जा रहा है कि जहाँ दुनियाभर के राजनेता और टेक लीडर्स बैठे थे वहाँ शर्ट उतारकर प्रदर्शन करने से भारत की साख गिर गई है। असल बात तो यह है कि इससे भारत की साख बढ़ सकती थी यदि इसे सकारात्मक लिया जाता और सरकार के ख़िलाफ़ एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन के रूप में समझा जाता। कम से कम दुनिया भर के लीडर्स यह तो समझ रहे हैं कि भारत में अधिनायकवादी सरकार का लोकतांत्रिक प्रतिरोध करने के लिये कुछ आवाज़ें तो हैं।
विपक्ष का विरोध अपमान नहीं, सम्मान की बात
साथ ही यह भी कि भले ही ट्रंप जैसे सिरफिरे नेता के सामने मोदी जी ने हथियार डाल दिए हों लेकिन भारत का विपक्ष किसी भी हालत में ट्रम्प को स्वीकार करने वाला नहीं। यह निराशा नहीं आशा का प्रतीक है, यह अपमान नहीं गौरव और सम्मान की बात है। इससे भी ज़रूरी बात यह है कि IYC ने अपने इस क़दम से यह सन्देश देने की कोशिश की है कि पीएम मोदी को यह पता चलना चाहिए कि 75 साल पुराने भारत के लोकतंत्र को, असहमति को, संस्थानों के दरवाज़े बंद करके और मीडिया को लाचार बनाकर मारा नहीं जा सकता। जब औपचारिक मंचों को सरकार संवादहीन बना देगी तो ऐसे अनौपचारिक मंचों में जाकर केंद्र सरकार की नीतियों का विरोध किया जाना ज़रूरी भी है और किया जाना चाहिए। अब यह मोदी सरकार पर है कि वो इस प्रदर्शन को सकारात्मक लेती है या नकारात्मक। यदि सहज लिया गया तो इससे भारत का सम्मान बढ़ेगा और यदि इसका दमन किया गया तो भारत लोकतांत्रिक हलकों में शामिल भी नहीं हो पायेगा। अभी आंशिक रूप से फ्री है, आने वाले समय में शायद इतना भी स्वतंत्र न रहे।
IYC कांग्रेस द्वारा AI समिट में किया गया प्रदर्शन, भारत का अपमान नहीं करता यह सिर्फ़ इतना संदेश देता है कि भारत में लोकतांत्रिक मंचों को मिटाया जा रहा है और यह बात पूरी दुनिया में जानी चाहिए।
असहमति की आवाज़ अहम क्यों?
भारत में लोकतंत्र की स्थापना मोदी/आरएसएस/बीजेपी के हित के लिए नहीं की गई थी। अगर कोई इस लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेगा तो इस तरह के प्रदर्शन और भी आम हो जाएँगे। इससे निपटने का सबसे सही तरीका है कि IYC द्वारा किए गए प्रदर्शन को सहज लिया जाये और संसद जैसे मंचों को सरकारी पकड़ से मुक्त किया जाये, चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को बाध्य किया जाये जिससे वो निष्पक्ष व्यवहार करें। केंद्र सरकार की नीतियों का विरोध भारत की बेइज्ज़ती नहीं है। यह बात सबको साफ़ हो जानी चाहिए। प्रदर्शन, असहमति, धरने और प्रतिरोध व्यक्तिगत नहीं होते, ये सब देश को बचाने और असहमतियों की रक्षा करने के लिए होते हैं, इससे लोकतंत्र मज़बूत होता है। IYC के प्रतिरोध को इस तरह समझना चाहिए कि पीएम मोदी के कार्यकाल में पूरी दुनिया में भारत अपमानित हो रहा है क्योंकि वो कुछ नहीं कर पा रहे हैं। तो सवाल यह है कि क्या ऐसे में विपक्ष को भी चुप रहना चाहिए? मेरी नजर में नहीं, विपक्ष को जहाँ मौका मिले वहां पर ग़लत नीतियों का विरोध करना चाहिए, बोलना चाहिए! और यूथ कांग्रेस ने यही किया।
राहुल गांधी पर हमला क्यों?
पर सत्ता पक्ष इस विरोध प्रदर्शन को सकारात्मक नहीं ले रहा है, वो इसे राहुल गांधी और देशद्रोह से जोड़ रहा है। इस घटना से दो दिन पहले सत्ता के संरक्षण में गुंडागर्दी करने वाले सड़कछाप नेता राहुल गांधी और कांग्रेस के 25 सांसदों को घर में घुसकर गोली मारने की धमकी दे चुके हैं, धमकी देने वाला व्यक्ति लोकसभा अध्यक्ष का करीबी बताया जा रहा है या कम से कम उनके साथ उसकी कई तस्वीरें हैं, संसदीय कार्य मंत्री खुलेआम नेता प्रतिपक्ष को देश-विरोधी बोल रहे हैं, बीजेपी का एक प्रदेश अध्यक्ष राहुल गांधी को गोली मारने की बात कर रहा है। सवाल यह है कि विपक्ष के सबसे बड़े नेता को गोली मारने की धमकी जब सत्ताधारी दल की तरफ़ से आ रही है तो क्या इससे देश की प्रतिष्ठा बढ़ रही है? महात्मा गांधी के देश में जो कृत्य किया जा रहा है उससे क्या देश की प्रतिष्ठा बढ़ रही है? संसद की गरिमा बढ़ रही है?
मोदी जी अपने समय के भारत के बारे में रात में सोते समय यह ज़रूर सोचें कि देश को क्या हो गया है और वह कहाँ पहुँच गया है। नेता प्रतिपक्ष यानी असहमति की सबसे बड़ी आवाज़, अर्थात लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रहरी, उसके ऊपर मानहानि के अनगिनत मुक़दमे चल रहे हैं जिससे वो कुछ बोल ना सके? दूसरी तरफ़ इंग्लैंड है जहाँ संवैधानिक राजतंत्र और संसदीय लोकतंत्र का शासन है वहाँ के राजा को अपने ही कॉमनवेल्थ नेशन ऑस्ट्रेलिया में जाकर एक महिला सांसद से कितनी कड़वी और गुस्सैल आवाज़ सुननी पड़ती है, “आप हमारे राजा नहीं हैं, यह आपकी भूमि नहीं है, चले जाओ”, और इसे वहां बहुत ही सहज और लोकतांत्रिक प्रक्रिया समझा जा रहा है। लेकिन भारत में अपरिपक्व पत्रकारिता ऐसी घटनाओं को देशद्रोह से जोड़ रही है।लोकतंत्र की कमतर समझ रखने वालों में मुखर विपक्ष और देशद्रोह के बीच अन्तर करने की क्षमता नहीं होती। इसलिए अब जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी फिर से कह रहे हैं कि “प्रधानमंत्री कॉम्प्रोमाइज़्ड हैं, उनका विश्वासघात अब उजागर हो चुका है।
वह रीनिगोशिएट नहीं कर सकते। वह फिर से आत्मसमर्पण करेंगे।” तो इसे भी राष्ट्रद्रोह की परिधि में समझा जाएगा। जबकि यह राष्ट्रद्रोह नहीं है, यह एक सतर्क संकेत हो सकता है जिसे समझा जाना चाहिए, देश के पत्रकारों द्वारा भी और संस्थाओं द्वारा भी।
जरा सोचकर देखिए अगर असहमति और प्रतिरोध देशद्रोह है तो इस देश के 60% नागरिक देशद्रोही हैं! यह कैसी सोच है? ये कैसा भारत बना दिया गया है?
जहाँ देश का अपमान सहने वाली सत्ता, देश के हितों से समझौता करने वाली सत्ता को देशद्रोही सत्ता समझा जाना चाहिए था वहाँ ऐसी सत्ता को ‘एक्सपोज़’ करने वालों को ही देशद्रोही समझा जा रहा है। अब देशद्रोह मेरे लिए एकदम नया शब्द बन चुका है!