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अपने रथ से ख़ून की लकीरें खींचने वाले आडवाणी कितने उदार?

आडवाणी ने टिप्पणी की है कि बीजेपी अपने विरोधियों या आलोचकों को कभी राष्ट्रविरोधी नहीं कहती। इसे पढ़कर कई लोग गदगद हो उठे और कहने लगे कि देखिए यह है एक वरिष्ठ उदारचेता नेता का स्वभाव। लेकिन इसपर नहीं सोचा कि आडवाणी रथ निकालते थे और यह रथ जिस रास्ते से गुज़रा वहाँ और जहाँ नहीं पहुँचा, वहाँ भी ख़ून की लकीरें खिंच गयीं। 
अपूर्वानंद

कुपथ-कुपथ रथ दौड़ाता जो, पथ निर्देशक वह है, 

लाज लजाती जिसकी कृति से, धृति उपदेश वह है, 

मूर्त दंभ गढ़ने उठता है शील विनय परिभाषा, 

मृत्यु रक्तमुख से देता जन को जीवन की आशा... 

समय था जब हिंदी पढ़नेवालों को जानकी वल्लभ शास्त्री की ये पंक्तियाँ ज़ुबानी याद रहा करती थीं। इनका इस्तेमाल करने के मौक़े भी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कम नहीं रहा करते थे। पिछले कुछ वर्षों में बार-बार ये कानों में बज उठी हैं। इधर 6 अप्रैल को जब लाल कृष्ण आडवाणी को अख़बारों और मीडिया में अपनी तक़रीबन 600 शब्दों की टिप्पणी के चलते फिर छाया हुआ देखा तो फिर से शास्त्रीजी याद आ गए।

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6 अप्रैल भारतीय जनता पार्टी का स्थापना दिवस है। मुकुल केसवन ने ठीक लिखा है कि आडवाणी के लिखे को पढ़कर स्मरण हुआ कि इसी दिन यह पार्टी बनी थी। बेहतर होता कि ऐसा हुआ ही न होता। केसवन के मुताबिक़ इस पार्टी का बनना (भारत के) अंत का आरम्भ था। जो लोग याद रखते हैं, वे जानते हैं कि यह पार्टी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उन सदस्यों के द्वारा बनाई गई थी जो इंदिरा गाँधी का विरोध करने के लिए गठित जनता पार्टी में पहले शामिल तो हो गए थे जिससे उन्हें एक ढाल भी मिल सके और वे सरकार में भी घुस सकें, लेकिन बाद में जब यह कहा गया कि उन्हें संघ से रिश्ता तोड़ना होगा पार्टी में रहने को तो उन्होंने जनता पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी की स्थापना करना तय किया। एक तरह से यह जन संघ का नया अवतार था। लेकिन इसकी स्थापना से यह बहुत साफ़ था कि इस राजनीतिक दल की प्राथमिक पहचान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उसके नाभिनाल संबंध से ही बनती है। यह संघ की राजनीतिक शाखा है। इस तरह यह भारत के दूसरे राजनीतिक दलों की तरह की कोई सामान्य पार्टी नहीं। इसका संचालन सूत्र इसके मुख्यालय से दूर कहीं और किसी के हाथ है।

आडवाणी और उदार?

बहरहाल! आडवाणी ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यह पार्टी अपने विरोधियों या आलोचकों को कभी राष्ट्रविरोधी नहीं कहती। आडवाणी ने पार्टी के उदार स्वभाव और जनतांत्रिक रवैए की याद दिलाई। इसे पढ़कर कई लोग गदगद हो उठे। कई ने कहा कि देखिए यह है एक वरिष्ठ उदारचेता नेता का स्वभाव। लेकिन हमने इसपर नहीं सोचा कि आख़िर यह मामूली-सी बात आज क्यों इतनी असाधारण जान पड़ रही है! शायद इसकी फौरी पृष्ठभूमि यह है कि कांग्रेस पार्टी के घोषणापत्र पर हमला करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि वह टुकड़े-टुकड़े गैंग का लिखा दस्तावेज़ है। शायद यह कि पिछले पाँच वर्षों में भाजपा और केंद्र सरकार के हर आलोचक को राष्ट्रविरोधी ठहराया गया है। आरोप लगाया गया है कि उनका  आतंकवादियों से गठजोड़ है।

आडवाणी को फिर पिछले पाँच वर्षों में अपनी पार्टी का यह स्वभाव क्यों नहीं याद आया? क्यों इस सरकार की आख़िरी घड़ी में उन्हें इसकी सुध आयी? वह भी तब जब उनका टिकट इस चुनाव में कट गया! यह अपने लोगों से ही अपमानित व्यक्ति की ख़ुद को शालीन दिखलाने की दयनीय कोशिश थी। इसलिए इसमें कोई दम न था! 

फिर भी आडवाणी की इस टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देखकर अपने हालात पर रोना आया! जिसे जेल में होना चाहिए था, वह बाहर बैठा लोगों को उदारता, जनतंत्र और सभ्यता का पाठ पढ़ा रहा है। और लोग सर धुन रहे हैं!

लाल कृष्ण आडवाणी पर्यायवाची हैं भारत में अल्पसंख्यक मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत और हिंसा के। शास्त्रीजी की कविता में ‘कुपथ कुपथ रथ दौड़ानेवाले’ का ज़िक्र है। आडवाणी ने सिर्फ़ एक बार रथ नहीं निकाला। टोयोटा मोटरगाड़ी को रथ का भेष देकर उस पर वे सवार हुए। वह स्वतंत्र भारत में पहली बार मुसलमान विरोधी अभियान का खुलेआम एलान था। ‘बाबर की औलादों को जूता मारो... को’ जैसा नारा दीवारों पर हर जगह इस दौर में लिखा गया, यह कहा गया कि उनकी जगह या तो कब्रिस्तान या पकिस्तान में है। बाक़ी नारों की बात हम नहीं कर रहे जो सिर्फ़ आडवाणी के नेतृत्व में लगाए जा रहे थे और जिनकी किसी सभ्य समाज में कोई जगह नहीं।

आडवाणी का रथ और ख़ून की लकीरें

आडवाणी का यह रथ जिस रास्ते गुज़रा वहाँ और जहाँ नहीं पहुँचा, वहाँ भी ख़ून की लकीरें खिंच गयीं। मुसलमानों को खुलेआम गाली दी जा सकती है और भारत में वह राजनीति का जायज़ तरीक़ा माना जाएगा, यह और किसी ने नहीं, आडवाणी ने निश्चित किया। यह न भूलें कि उस रथ पर राम का स्वांग धरे आडवाणी का परिचारक जो था, वह आज भारत का प्रधानमंत्री है।

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मुसलमान विरोधी घृणा के सफल प्रचारक

मुसलमान विरोधी घृणा के जनक आडवाणी नहीं हैं, लेकिन वह उसके सबसे सफल प्रचारक हैं। इस नफ़रत की मिट्टी से एक राजनीतिक हिंदू गढ़ा गया और उसे जायज़ राजनीति माना गया। आज आडवाणी की प्रशंसा सुनकर इसलिए हैरानी नहीं होती कि चाहे वामपंथी हों या समाजवादी, उन्होंने इस आडवाणी के दल के साथ सहयोग करने से गुरेज़ नहीं किया। यह भी न भूलें कि धर्मनिरपेक्षता के अलंबरदार तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने आडवाणी के इस घृणा अभियान के ख़िलाफ़ कोई कारगर कदम नहीं उठाया और एक लंबा वक्त गुज़र जाने के बाद आडवाणी को बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के दृढ़ संकल्प के चलते ही गिरफ़्तार किया जा सका। लेकिन तबतक काफ़ी तबाही हो चुकी थी और आगे बर्बादी का रास्ता बन चुका था।

यह भी याद रखें कि भारत के बुनियादी सिद्धांत धर्मनिरपेक्षता का मज़ाक उड़ाते हुए छद्म धर्मनिरपेक्षता जैसा शब्द आडवाणी का लोकप्रिय बनाया हुआ है। यह धर्मनिरपेक्षता की नींव पर ही चोट थी। लेकिन इसे भी भारत के सभ्य, शिक्षित समाज ने वैध माना। आडवाणी एक सम्मानित व्यक्ति बने रहे।

पिछले लोकसभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी के धुर विरोधी नीतीश कुमार जैसे लोगों ने आडवाणी को राष्ट्रपुरुष कहा और प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वाधिक योग्य बताया। यह भूलते हुए कि मुसलमान इसके बारे में क्या सोचते हैं? यह नियति का व्यंग्य है कि आज नीतीश नरेंद्र मोदी और अमित शाह नीत भारतीय जनता पार्टी के प्रायः अनुचर हैं! 

आडवाणी के रथ की बागडोर किसके हाथ?

आडवाणी ने जो रथ हाँका था उसकी बागडोर उनके योग्य शिष्य के हाथ है। इससे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भारत विजय का सपना भले पूरा होता दीख रहा हो, हम जानते हैं कि हमारा भारत इस रथ के चक्कों के नीचे कुचला जाकर लहूलुहान हो चुका है। आडवाणी को इसकी सजा कब मिलेगी?

अपूर्वानंद
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