"हमारे सपने डर के मुक़ाबले बहुत बड़े हैं।”2026 के सरकार विरोधी आंदोलन के एक प्रदर्शनकारी ने पत्रकार को जवाब दिया जब वह उससे पूछ रही थीं कि इतनी ज़बरदस्त नाकेबंदी, पुलिस बंदोबस्त और पुलिस की धमकियों के बाद भी क्या वह विरोध-प्रदर्शन में हिस्सा लेने की बात सोच रहा है। इस साल जुलाई के महीने से दिल्ली में नौजवानों के जो विरोध प्रदर्शन शुरू हुए, उनके न रुकनेवाले सिलसिले को देख कर यह माना जा सकता है कि यह जवाब सिर्फ़ उस एक नौजवान का नहीं था।
डरना स्वाभाविक है और उसकी वजह बहुत साफ़ है।कॉक्रोच जनता पार्टी के आह्वान पर 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस ने क्रूरता के साथ नौजवानों को मारा। उसने न सिर्फ़ अपनी लाठियों का इस्तेमाल किया, बल्कि पैलेट गन भी चलाई। नौजवान बुरी तरह ज़ख़्मी हुए।पुलिस ने निशाना लगाकर नौजवानों पर हमला किया। लड़कियों के साथ भी रियायत न थी, बल्कि उनके साथ और बुरा व्यवहार हुआ।मार पीट के साथ यौन दुराचार भी।
हमें दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में पढ़ने वाली एक लड़की मिली जिसने पहली बार कोई प्रदर्शन देखा था और पहली बार ही पुलिस की कार्रवाई भी देखी थी।उसने कहा कि वह प्रशासनिक या पुलिस सेवा में जाना चाहती थी लेकिन दिल्ली पुलिस का बर्ताव देखकर अब वह पुलिस अधिकारी नहीं बनना चाहती है।लेकिन वह इस डर से प्रदर्शन छोड़कर जाने को तैयार नहीं थी कि उसके साथ भी पुलिस वैसा ही कर सकती है।
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20 जुलाई के पुलिस के दमन के बाद यह होना चाहिए था कि सड़कें ख़ाली हो जातीं।लेकिन लोग और ज़्यादा उमड़ आए।ऐसे लोग जंतर-मंतर और आसपास की सड़कों पर उतरे जो कभी किसी सामूहिक कार्रवाई में नहीं गए थे। वे नौजवान सड़क पर निकल पड़े, जिन्हें माना जाता था कि वे अराजनीतिक होते हैं और ज़्यादा वक्त सोशल मीडिया पर वक्त काटते हैं। उन्होंने पुलिस का सामना किया और इस डर का भी कि उन्हें गिरफ़्तार किया जा सकता है या मारा जा सकता है।
सिर्फ़ दिल्ली नहीं, भारत के अनेक शहरों में नौजवान सरकार का विरोध करते हुए कई दिनों तक सड़कों पर रहे। उनके शिक्षा संस्थानों ने उन्हें धमकी देते हुए पत्र जारी किए फिर भी अनेक छात्र प्रदर्शन में शामिल हुए।
20 जुलाई के भयानक पुलिस दमन के बाद जैसे पुलिस, जेल और किसी भी तरह के दंड का भय लोगों के भीतर से निकल गया। विरोध मानो ख़ुद को साबित करने का एक माध्यम बन गया। जो विरोध में नहीं जा सका, वह जैसे इस वक्त पूरा इंसान नहीं।
जुलाई के विरोध प्रदर्शन ने युवा पीढ़ी के मन से सामूहिक कार्रवाई को लेकर संकोच मिटा दिया। ऐसा नहीं कि भय पूरी तरह निकल गया, लेकिन सामूहिकता ने उसका सामना करने की ताक़त दी।जिन्हें मार पड़ी थी,वे युवा दुबारा, तिबारा सड़क पर दिखलाई दिए।अपने ज़ख्मों के साथ, लेकिन उनके लिए वे कोई सहानुभूति नहीं चाह रहे थे। उन चोटों और घावों ने उन्हें भारतीय जनता पार्टी की सरकार के क्रूर चरित्र का सीधा परिचय दिया था। उनके शरीरों पर पड़े हुए निशान से अधिक प्रामाणिक और क्या हो सकता था!
भय वास्तविक होता है। पुलिस के डंडों और बूटों से चोट लगती है। गिरफ़्तारी कोई सामान्य बात नहीं। लेकिन आंदोलन इन सबसे जूझने की ताक़त देता है। एक बार जब भय छँट जाता है, तब जेल और पुलिस की प्रताड़ना की आशंका रुकावट नहीं बन पाती।
भारत की पुलिस सिर्फ़ युवाओं को नहीं डराती।वह उनके माता-पिता को फ़ोन करके भी धमकी देती है। अधिकतर युवाओं की पृष्ठभूमि अत्यंत साधारण है। वे निम्न या माफ़ी वित्त परिवारों से आते हैं। उनके वर्तमान और भविष्य को लेकर उनके माता-पिता का चिंतित होना बहुत स्वाभाविक है। अनेक के परिवार सरकार समर्थक हैं या हिंदुत्ववादी है। ऐसे युवा भी न सिर्फ़ सड़क पर आए, बल्कि उन्होंने कैमरे पर अपने परिवार की विचारधारा की आलोचना भी की।
जुलाई के बाद 10 अक्टूबर को चुनाव प्रक्रिया में धाँधली के ख़िलाफ़ लोग सड़क पर उतरे। इस बार तो दिल्ली में सरकार ने कर्फ़्यू ही लगा दिया।लेकिन जगह-जगह नौजवानों के जत्थे पुलिस को चकमा देते हुए विरोध प्रदर्शन करने में कामयाब हो गए। इस बार पुलिस का दमन कुछ और ज़्यादा था। उसके बावजूद प्रदर्शनों का सिलसिला नहीं रुका।
अब हर कोई यह कह रहा है कि लोगों के मन से भय निकल गया है। इसके चलते सरकार का काम और मुश्किल हो गया है। लोगों को अब बंद रखना कठिन है। वे बोल रहे हैं और सड़क पर सरकार का विरोध कर रहे हैं।
लेकिन डर से आज़ादी कोई पहली बार नहीं दिखलाई पड़ रही। 2019 में जब नागरिकता के क़ानून में संशोधन किया गया, तब उत्तर प्रदेश में मुसलमानों ने विरोध प्रदर्शन किया। पुलिस ने अंधाधुंध गोली चलाई और 23 मुसलमान मारे गए। लेकिन विरोध जारी रहा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में विद्यार्थियों ने विरोध प्रदर्शन किया तो पुलिस ने बेरहमी से उनका दमन किया। इसके जवाब में वह आंदोलन शुरू हुआ जिसे हम शाहीन बाग़ के नाम से जानते हैं। मुसलमान औरतें अपने घरों से निकलीं और सड़क पर धरना देकर बैठ गईं। धीरे धीरे यह पूरे भारत में फैल गया और लगभग 200 शहरों में शाहीन बाग़ शुरू हो गए।
इसके ख़िलाफ़ भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने पूरे भारत में दुष्प्रचार किया। दिल्ली में शाहीन बाग़ पर हमले भी हुए। लेकिन औरतें अपनी जगह से नहीं हटीं। उनमें कोई डर नहीं था। उनमें से अधिकतर पहली बार घरों से निकलीं थीं। वे बहुत पढ़ी-लिखी न थीं और उन्हें पारंपरिक भी कहा जा सकता है।लेकिन उन्हें मालूम था कि नाइंसाफ़ी क्या है और इन्साफ़ के लिए खड़ा होना और लड़ना हर इंसान का फ़र्ज़ है।
फ़रवरी में दिल्ली में उनके ख़िलाफ़ हिंसा की गई और फिर कोविड का हमला हुआ। उस वजह से शाहीन बाग़ आंदोलन स्थगित करना पड़ा। लेकिन यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वह किसी डर की वजह से ख़त्म नहीं हुआ। बल्कि शाहीन बाग ने यह दिखलाया कि डर का सामना कैसे किया जाता है।
उसी साल किसानों का आंदोलन भी शुरू हुआ। भाजपा सरकार ने किसानों को भी तरह-तरह से डराने की कोशिश की। उनपर मुक़दमे किए गए, उनके ख़िलाफ़ पूरे देश में दुष्प्रचार किया गया, उन्हें आतंकवादी और ख़ालिस्तानी कहा गया। जब वे पंजाब और हरियाणा से दिल्ली की तरफ़ चले तो सड़कें खोद डाली गईं और उन पर कीलें ठोंक दी गईं। दिल्ली की सीमाओं को सील कर दिया। कुछ हज़ार किसानों के ख़िलाफ़ पूरी राजकीय ताक़त लगा दी गई। लेकिन किसानों ने उसे धता बताते हुए वहीं डेरा डाल दिया। उन पर भाजपा के गुंडों ने हमला किया।मुक़दमे किए गए। लेकिन किसान बिना डरे टिके रहे। उन्होंने चारों मौसम झेले।और सरकार को घुटने टेकने को मजबूर किया।
जब हम आंदोलनों की बात करते हैं तो इस देश में बस्तर, झारखंड, ओडिशा के आदिवासियों को भूल जाते हैं जो बरसों से ज़मीन, जंगल और पानी को बचाने के लिए अलग-अलग तरह से आंदोलन करते रहे हैं। उनका काम और मुश्किल है क्योंकि उन्हें न सिर्फ़ पुलिस का सामना करना पड़ता है, बल्कि कॉरपोरेट घरानों के गुंडे भी उनपर हमला करते हैं। उन्हें अख़बारों, टीवी और सोशल मीडिया पर जगह भी नहीं मिलती। व्यापक उदासीनता और राजकीय दमन का सामना करते हुए आंदोलन जारी रखना आसान नहीं है।इसलिए असल निर्भय ये प्रायः निरक्षर आदिवासी हैं।
यह निर्भयता अब दिल्ली की सड़कों पर दिखलाई पड़ रही है। वह अब घर-घर में व्यक्त हो रही है। हिंदू-मुसलमान का भेद अब नहीं है। युवाओं ने वयस्कों को भी प्रेरित किया कि वे अपने संकोच और भय के बंधन से बाहर निकलें। 20 जुलाई के बाद बड़ी संख्या में बड़े-बुजुर्ग नौजवानों के हौसले के कारण बाहर निकले।
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यह ठीक ही कहा जा रहा है कि कॉक्रोच जनता पार्टी के आंदोलन के कारण सामान्य जनसंख्या के भीतर से इस सरकार का डर निकल गया है। लेकिन जैसा हमने कहा, किसानों, आदिवासियों और मुसलमान औरतों में पहले ही निर्भयता देखी गई थी।शायद अधिक ठीक यह कहना होगा कि बड़ी हिंदू आबादी ने अपने भीतर जो काल्पनिक भय बिठा रखा था, वह अब दूर हो गया है। क्योंकि जिन्हें जब-जब ज़ुल्म का अहसास हुआ, उन्होंने उसी वक्त सरकार का विरोध किया।
जनतंत्र का गहरा रिश्ता भय से मुक्ति से है। जनतंत्र के लिए प्रश्न करना, सरकार की आलोचना करना स्वाभाविक माना जाना चाहिए। यह अच्छा है कि अब सड़कें लोगों से आबाद दिखलाई पड़ रही हैं।