मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा है कि गीता कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं है। वह नीति शास्त्र या नीति विज्ञान का ग्रंथ है। इसलिए उसे पढ़ाया जाना कोई धार्मिक गतिविधि नहीं है। कोयम्बतूर स्थित अर्श विद्या परंपरा ट्रस्ट को संघीय सरकार ने एफ़ सी आर ए लाइसेंस देने से मना कर दिया था क्योंकि उसके मुताबिक़ ट्रस्ट धार्मिक गतिविधियों में संलग्न है। इसका प्रमाण यह था कि वह गीता की शिक्षा देता है। एफ़ सी आर ए क़ानून के मुताबिक धार्मिक स्थलों के रखरखाव, धार्मिक ग्रंथों के संरक्षण, मुद्रण आदि के लिए बाहरी पैसा लिया जा सकता है लेकिन धार्मिक प्रचार के लिए नहीं।संभवतः गीता की शिक्षा को हिंदू धर्म का प्रचार मान कर अर्श विद्या ट्रस्ट को विदेशी पैसा लेने से मना कर दिया गया। अब अदालत ने ट्रस्ट को राहत दी है और कह दिया है कि गीता की शिक्षा धार्मिक प्रचार नहीं क्योंकि गीता धार्मिक ग्रंथ नहीं है।
उच्च न्यायालय का कहना है कि गीता धार्मिक ग्रन्थ नहीं है, बल्कि साभ्यतिक ग्रंथ है।वह नीति की शिक्षा देनेवाला ग्रंथ है। उसी तरह वेदान्त और हठयोग भी किसी एक धर्म तक सीमित नहीं किए जा सकते। गीता को भी किसी एक धर्म तक सीमित नहीं किया जा सकता।वह संपूर्ण भारतीय सभ्यता का अंग है। वैसे, गीता को तो कई राज्यों में स्कूलों में बरसों से पढ़ाया जाता रहा है। भारतीय जनता पार्टी नीत सरकार के मुताबिक़ यह धार्मिक नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता की अभिव्यक्ति है।विश्व हिंदू परिषद ने ख़ासकर अल्पसंख्यक समुदाय के अध्यापकों को गीता अनिवार्यतः पढ़ाए जाने की सिफ़ारिश की थी और इसे शिक्षक प्रशिक्षण के लिए अनिवार्य कर देने की माँग की थी। शायद इस कारण कि अल्पसंख्यकों को भारतीय बनाया जाना शेष है और गीता या रामायण पढ़ाकर उन्हें भारतीय बनाया जा सकता है।
समझना कठिन है कि गीता की स्वीकार्यता के लिए इसे धार्मिक की बजाय सांस्कृतिक या साभ्यतिक ग्रंथ क्यों कहा जाना चाहिए ? गीता सिर्फ़ धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत है, कह कर इसकी व्यापकता साबित करने की कोशिश की जाती है। तो क्या जो धार्मिक है, वह संकुचित है और इसलिए हीन है? ऐसा करके गीता की महत्ता तो सिद्ध होती है, लेकिन क्या धर्म एक संकुचित श्रेणी नहीं बन जाता? दूसरे, क्या सारे धार्मिक ग्रंथ व्यापक अर्थ में नीति के ग्रंथ नहीं हैं? क्या क़ुरान, बाइबिल या तोरा जितने धार्मिक ग्रंथ हैं उतने ही सांस्कृतिक भी। धर्म को संस्कृति से अलगाना संभव नहीं। लेकिन जैसे कोई भाषा सिर्फ़ एक भाषा नहीं होती बल्कि उसमें बहुभाषिकता अनिवार्यतः शामिल है, उसी तरह संस्कृति भी बहुसांस्कृतिकता के गुण से मुक्त नहीं हो सकती। क्या धर्म के बारे में यही दावा किया जा सकता है?
हम जानते हैं कि क्यों गीता को धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक कहकर सबके लिए अनिवार्य करने की सिफ़ारिश की जाती है। स्कूलों में सरस्वती वंदना को भी यही कहकर उचित ठहराया जाता है कि यह मात्र धार्मिक नहीं, सांस्कृतिक है। बाक़ी सब धर्म हैं लेकिन हिंदू धर्म नहीं, संस्कृति है। इस तर्क को आगे बढ़ाकर राम पर या हिंदू आराध्यों पर भी लागू कर दिया जाता है। ग़ैर हिंदुओं को भी उनकी आराधना करनी चाहिए क्योंकि वे सांस्कृतिक हैं।
धर्म और संस्कृति के रिश्ते पर हमें नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है।क्या धर्म में जड़ता और संकीर्णता का बोध है और संस्कृति में प्रवाह का और संशोधन का ? क्या धर्म में यह शक्ति नहीं कि वह सार्वभौम अनुभव बन सके? या वह इसलिए संभव नहीं है क्योंकि उसके आधिकारिक व्याख्याकारों या प्रवक्ताओं का संस्थानीकरण हो चुका है और उसके अनुयायी तो हो सकते हैं लेकिन उन्हें उसके साथ कल्पनाशील रिश्ता बनाने की इजाज़त नहीं?
जो भी हो, गीता जैसे ग्रंथ को पढ़ाए जाने का मतलब क्या हो सकता है? उसके पहले पढ़ाए जाने की क्रिया का अर्थ ही समझने की आवश्यकता है। किसी भी विचार की शिक्षा का उद्देश्य उसके लिए अनुयायी तैयार करना नहीं बल्कि उसके ऐसे अध्येता तैयार करना है जो उसे आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ सकें। वह एक हिसाब से धर्मनिरपेक्ष गतिविधि बन जाता है। यानी, उसे पढ़ने-पढ़ानेवाले भी एक धर्म तक सीमित नहीं हो सकते। लेकिन किसी भी ग्रंथ या व्यक्ति को जब कक्षा में जगह मिलती है तो उससे अपेक्षा होती है कि वह प्रश्नों की आँच बर्दाश्त कर सके। धार्मिक शिक्षा और शिक्षा के बीच एक अंतर है। किसी भी धार्मिक शिक्षा का उद्देश्य उस दृष्टि से धार्मिक जन तैयार करना है जबकि शिक्षा का उद्देश्य आलोचनात्मक दिमाग़ विकसित करने में व्यक्ति की मदद करना है।धार्मिक शिक्षा हिंदू या ईसाई या मुसलमान या ईसाई बनाती है। अपने आप में यह बात बुरी या हीन नहीं है, लेकिन जिसे हम आधुनिक शिक्षा कहते हैं, उसका मक़सद यह नहीं है।उसके लिए मदरसे, सेमिनरियाँ मौजूद हैं।
यह प्रश्न मात्र गीता के अध्ययन अध्यापन के लिए प्रासंगिक नहीं। प्रायः भारत में इसे लेकर विवाद होता रहा है कि सावरकर को पढ़ाया जाए या नहीं, मार्क्स और माओ को पाठ्यक्रम में शामिल करें या नहीं।इसके पीछे धारणा यह है कि कि इन्हें पढ़ाने का मतलब इनका गुणगान है। क्या मार्क्स को पढ़ाने का उद्देश्य मार्क्सवादी जमात तैयार करना है? या अध्येता या विद्यार्थी को मार्क्स को समझने के साधन और क्षमता मुहैया कराना है? ऐसा करने के लिए हमें मार्क्स के आलोचकों को भी पढ़ना होगा। यही बात गांधी पर लागू होती है। गांधी को पढ़ाने का उद्देश्य गांधीवादी बनाना नहीं, उसी तरह सावरकर को पढ़ाने का मक़सद सावरकवादी तैयार करना नहीं हो सकता। यह तक कि संविधान की पढ़ाई का मतलब भी यही है कि उसकी परीक्षा की जा सके।
- पिछले दिनों इसपर बहुत बहस हुई है कि मनुस्मृति को पढ़ाया जाए या नहीं। मनुस्मृति अवश्य ही पढ़ाई जानी चाहिए लेकिन तब आप कक्षा में आंबेडकर की मनुस्मृति की व्याख्या या आलोचना को दरकिनार नहीं कर सकते। कोई भी विषय कक्षा में प्रवेश करते ही विचारणीय हो जाता है, अनुकरणीय मात्र नहीं रह जाता।
- इक़बाल को पढ़ाएँ कि नहीं? उन्होंने पाकिस्तान की वकालत की, क्या इसलिए उन्हें कक्षा से बाहर कर दें? या उन्हें आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ें?
दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं जो शिक्षा के दायरे से बाहर हो। लेकिन जो भी धर्म से किसी तरह जुड़ा है, वह एक या दूसरे प्रकार की आस्था का विषय हो जाता है। आस्था प्रश्नातीत है और संदेह या सवाल से परे है। अगर कोई गाय को पवित्र मानता है तो हम उससे जैवशास्त्रीय बहस नहीं करके यह साबित नहीं कर सकते कि गाय अन्य जानवरों की तरह की एक और जानवर है। उसी तरह यज्ञ आदि को इस आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता कि वे वातावरण को शुद्ध करते हैं। किसी भी धार्मिक आचार व्यवहार को वैज्ञानिक कहकर उसकी वकालत करना हीनता- बोध का परिचायक है।
लेकिन जब कोई किसी अकादमिक चर्चा में यह दावा करे कि गाय के रंभाने से ऑक्सीजन पैदा होती है तो उसे प्रमाण देना होगा। या आई आई टी के वैज्ञानिकों ने पंचगव्य पर जो शोध किया है, उसे अन्य वैज्ञानिकों के सवालों की कसौटी पर कसा जाना होगा।
शायद यह कारण था कि एक धार्मिक व्यक्ति गांधी ने धर्म को स्कूली शिक्षा से अलग रखने के लिए कहा था। सवाल है कि किसी धार्मिक ग्रंथ को कौन पढ़ाएगा।उसे किस दृष्टि से पढ़ाया जाएगा? क्या उसकी कक्षा में सवालों की इजाज़त होगी? धर्म और संस्कृति में एक अंतर किया जा सकता है कि संस्कृति तो प्रश्न आमंत्रित कर सकती है लेकिन धर्म इसकी इजाज़त नहीं देता या अधिक ठीक कहना यह होगा कि उस समय उस धर्म के आधिकारिक प्रवक्ता इसकी अनुमति नहीं देंगे।
एक समय तक राम कथा सर्जनात्मकता का स्रोत रही लेकिन जैसे ही उसके एक संस्करण को धार्मिक पद प्रदान कर दिया गया, कल्पना का उससे लोप हो गया। उसी तरह गीता की व्याख्याएँ होती रही हैं, लेकिन क्या आज किसी आम्बेडकर को उसकी व्याख्या की इजाज़त है? इस प्रश्न के उत्तर से ही हम यह जान सकते हैं कि वह स्कूलों या विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा सकती है या नहीं।