आत्मद्वेषी हिंदू :कुछ वक्त से यह शब्द-युग्म बार बार सुनाई पड़ता है या पढ़ने में आता है। इसे ठीक से परिभाषित नहीं किया गया है। क्या ये उस प्रकार के हिंदू हैं जो हिंदू होने पर ही लज्जित हैं? आत्मद्वेषी हिंदू कौन है? वह जो ख़ुद से घृणा करता हो, जिसे अपने हिंदू होने पर लज्जा का अनुभव होता हो?
आत्मद्वेषी हिंदू के समतुल्य एक शब्द और है: आत्मद्वेषी यहूदी। आज इसका इस्तेमाल उनके लिए होता है जो इस्राइल और यहूदी समाज में व्याप्त फ़िलस्तीन और अरब विरोधी विचारों के आलोचक है या ज़ायनिज़्म के विरोधी हैं।लेकिन आरंभ में जिन लोगों ने इसका प्रयोग किया, उनके लिए इसका अर्थ यह नहीं था।
पॉल रिटर की किताब On the Origins of Jewish Self-Hatred (2012) में इसके इतिहास का ज़िक्र है। यह युद्धकालीन यूरोप में यहूदी समाज के भीतर आत्मचिंतन की प्रवृत्ति का द्योतक था। भारत में हिंदुओं की स्थिति से नितांत भिन्न स्थिति यूरोप के यहूदियों की थी। वहाँ वे अल्पसंख्यक थे और उनके ख़िलाफ़ विद्वेष और घृणा का लंबा इतिहास था।एक अल्पसंख्यक समुदाय अपने बारे में और प्रायः अपने ख़िलाफ़ पूर्वग्रहों को आत्मसात् कर लेता है और ख़ुद को बहुसंख्यक समुदाय की कसौटी पर खरा साबित करने की कोशिश करने लगता है।वह उसमें घुलमिल जाने का प्रयास करते हुए ख़ुद से की जाने वाली माँगों को पूरा करने की कोशिश करता है।
रिटर ने इसके उलट यह कहा कि यह पद आत्मालोचना की प्रवृत्ति का सूचक था और सकारात्मक था।लेकिन कालांतर में यहूदियों की स्थिति बदल गई। उनका एक देश बना जहाँ वे बहुसंख्यक हैं। उस देश को उन्होंने अपना दैवी अधिकार माना। वह उनकी दैवी और पवित्र भूमि है और वे उसके दावेदार और पहले लोग हैं। अन्य किसी का उस पर अधिकार नहीं है। जो भी ग़ैर-यहूदी इस्राइल में हैं, वे दूषक तत्त्व हैं और उनका सफ़ाया करने का अधिकार यहूदियों को है।
ऐसे यहूदी मौजूद हैं जो इस धारणा के आलोचक और विरोधी हैं। उन्हें आत्मद्वेषी यहूदी कहकर उनका तिरस्कार किया जाता है। आज के समय आत्मद्वेषी यहूदी उसे कहा जाता है जो ‘सेक्युलर’ है, फ़िलस्तीनियों के अधिकार का पक्षधर है और यहूदियों के लिए किसी भी विशेषाधिकार का विरोध करता है।ज़ायनवादियों के बीच यह नकारात्मक है और ऐसे लोगों की भर्त्सना के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
भारत में भी आत्मद्वेषी यहूदी की तर्ज़ पर आत्मद्वेषी हिंदू शब्द का आविष्कार किया गया है। यह उनके लिए इस्तेमाल किया जाता है जो भारत में अल्पसंख्यक समुदाय के समान नागरिक अधिकार की वकालत करते हैं। वे हिंदू श्रेष्ठतावाद के विरोधी हैं और हिंदुत्व के विचार के आलोचक है।
आत्मद्वेषी हिंदू वे लोग हैं जो इस बात पर अपनी फ़िक्र ज़ाहिर कर रहे हैं कि हिंदू समाज में हिंदुत्व के विचार के प्रति स्वीकृति बढ़ती जा रही है। बार-बार कहे आने के बाद भी दुहराना ज़रूरी है कि हिंदुत्व हिंदूपन नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक-सांस्कृतिक विचार का नाम है।
हिंदुत्व को हिंदू धर्म से बहुत पहले विनायक दामोदर सावरकर ने अलग कर दिया था। उनके अनुसार इसका अर्थ है भारत नामक भूभाग में रहनेवाले लोग जिनकी पितृ भूमि और पवित्र भूमि, दोनों ही इसी भौगोलिक क्षेत्र में है। उन्होंने कहा कि हमें हिंदी की तरह हिंदू के मूल शब्द के चक्कर में पड़कर इसे इतना नहीं खींच देना चाहिए कि यह निरर्थक ही हो जाए। अगर हम ऐसा करेंगे तो किसी मुसलमान को सिर्फ़ इसलिए हिंदू कह बैठेंगे क्योंकि वह भारत का निवासी है। हिंदू सिर्फ़ वे हैं, भारत जिनकी पितृ भूमि और धर्म भूमि, दोनों ही है। उनके मुताबिक़ मुसलमान, ईसाई, यहूदी और पारसी हिंदू नहीं हो सकते क्योंकि भले ही उनकी पितृ भूमि भारत हो, पवित्र भूमि भारत नहीं है।
हिंदुत्व के इस विचार के अनुसार ये सभी ग़ैर हिंदू हिंदू हो सकते हैं अगर वे अपनी अलग पहचान इस हिंदुत्व में विलीन कर दें। इस तरह हिंदुत्ववादियों का एक कर्तव्य मुसलमानों और ईसाइयों आदि को हिंदू बनाना भी है। सावरकर के अनुसार भारत में मुसलमानों के जबरन घुस आने के बाद से भारत के हिंदुओं के लिए जीवन और मरण का युद्ध शुरू हो गया। वह युद्ध चल रहा है और तब तक ख़त्म नहीं होगा जब तक सभी ग़ैर हिंदुओं का हिंदूकरण न कर दिया जाए।
हिंदुत्व के इस विचार को घर घर तक ले जाने और हिंदुत्ववादी हिंदू तैयार करने का असली काम सावरकर न कर पाए। वह काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कर रहा है। इस विचार का व्यावहारिक रूप है भारत में मुसलमानों, ईसाइयों आदि को दूसरे दर्जे में धकेलना। हिंदुओं में उनके ख़िलाफ़ विद्वेष पैदा करना। हिंदुओं को यह अहसास दिलाना कि वे चारों तरफ़ से घिरे हुए हैं।उनको यह बतलाना कि ऐतिहासिक रूप से उनके साथ मुसलमानों और ईसाइयों ने अन्याय किया है। हिंदू स्वभावतः अहिंसक होने के कारण उनके शिकार हुए हैं। अब वक्त आ गया है कि वे इस ‘क्लीव’ अहिंसा को त्यागकर शत्रु भाव विकसित करें और अपने शत्रुओं का विनाश करें।
मुसलमानों और अन्य ग़ैर हिंदुओं के ख़िलाफ़ घृणा का प्रचार और उनके विरुद्ध हिंसा को जायज़ ठहराना हिंदुत्ववादियों का अनिवार्य कार्य है। अपूर्वानंद के इसी लेख में
सत्य हिन्दी पर वक्त बेवक्त कॉलम से
जो भी इसका विरोध करता है, उस पर आरोप लगाया जाता है कि वह हिंदू समाज को कमजोर कर रहा है। जो हिंदू अपने हिंदू समाज में फैल रही इस प्रवृत्ति की आलोचना करते हैं, उन्हें आत्मद्वेषी हिंदू या हिंदू विरोधी कहा जाता है।
अपने समय में स्वामी विवेकानंद पर इसी तरह के आरोप लगे थे।उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस को भी रूढ़िवादियों का हमला झेलना पड़ा था। महात्मा गांधी से तो हिंदुत्ववादी शुरू से ही नाराज़ हैं। उन पर हिंदुओं को पुंसत्वविहीन करने का आरोप है। विवेकानंद,परमहंस या अरविंद के मुक़ाबले गांधी को सबसे ज़्यादा घृणा का सामना करना पड़ा है।
हिंदुत्ववादियों ने कई बार गांधी की हत्या का प्रयास किया क्योंकि वे उन्हें हिंदू विरोधी मानते थे और आख़िरकार सावरकर के शिष्य और आर एस एस के एक स्वयंसेवक ने उन्हें मार ही डाला। इसलिए हिंदुत्ववादी इसे गांधी वध कहते हैं। संघ गांधी के हत्यारे से अपने संबंध से इनकार करता है। लेकिन क्या हम एक प्रसिद्ध स्वयंसेवक अटल बिहारी का वक्तव्य भूल सकते हैं कि जो एक बार स्वयंसेवक हो गया, वह हमेशा स्वयंसेवक बना रहता है?
गांधी के बाद हिंदुत्ववादियों की घृणा सबसे अधिक नेहरू से है। लेकिन वे नेहरू को हिंदू मानने से ही इंकार करते हैं। ऐसा वे गांधी के साथ नहीं कर सकते। क्योंकि गांधी खुद को सनातनी हिंदू कहते थे और उनके जीवन को देखते हुए उन्हें ग़ैर हिंदू कहना कठिन था। फिर भी एक लोकप्रिय मत है कि गांधी ने हिंदुओं में हीन भावना पैदा की और इस प्रकार वे आत्मद्वेषी हिंदू थे।
हिंदू समाज में फैल रहे श्रेष्ठतावाद, अन्यों के प्रति घृणा और आत्ममोह के प्रति सावधान करनेवाले हिंदू आत्मद्वेषी हिंदू नहीं हैं। वे आत्मावलोकन करनेवाले आत्मालोचक हिंदू हैं। जिस समाज में आत्मालोचना की क्षमता ख़त्म हो जाती है, वह धीरे धीरे मरने लगता है।