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अयोध्या: क्या आगे बढ़ने का मौक़ा आ गया है?

महात्मा गाँधी ने कहा था कि मैं उम्मीद करता हूँ कि मेरे सपनों का फ़ेडरल कोर्ट अगर वजूद में आता है तो यूरोपीय और हर कोई, सारे अल्पसंख्यक निश्चिन्त रह सकते हैं कि कोर्ट उन्हें निराश नहीं करेगा....। तो क्या आज की अदालत यह कह सकती है कि गाँधी के इस आश्वासन की उसे याद भी है? क्या उच्चतम न्यायालय ने अपने फ़ैसले से हमें आगे बढ़ने का अवसर दिया है?
अपूर्वानंद

9 नवंबर, 2019 के बाद अब यह कहा जा रहा है कि ठहरे रहने का नहीं, आगे बढ़ने का वक़्त है। शायद उच्चतम न्यायालय ने अपने फ़ैसले से हमें आगे बढ़ने का अवसर दिया है। ऐसे लोगों की यह समझ है कि पिछले 30 वर्षों से भी कुछ अधिक से देश राम मंदिर की राजनीति के भँवर में फँस गया था। बड़ी अदालत ने झटके से उसे उससे निकाल लिया है। इससे बेहतर शायद यह कहना होगा कि पिछले कुछ वर्षों से देश जो तेज़ी से बहुसंख्यकवाद की खाई में गिर रहा था और लगता था कि हमारी अदालत उसमें रुकावट बन कर खड़ी हो जाएगी, वह भरम टूट गया। अदालत ने न सिर्फ़ ख़ुद को रास्ते से हटा लिया है बल्कि गिरते देश को एक धक्का और दे दिया है ताकि वह उस खाई में जल्दी जा गिरे। अदालत ने इस निर्णय में जो एकता दिखाई है, जिसे सर्वसम्मति कहा जा रहा है, वह बाहर राजनीतिक जगत में भी दिखलाई पड़ रही है। कांग्रेस पार्टी ने निर्णय का स्वागत किया है। उसके प्रवक्ताओं और नेताओं ने इसे ऐतिहासिक तक बतलाया है। निर्णय देते हुए अदालत की पीठ ने जो सर्वसम्मति दिखलाई है, उसे अभिषेक मनु सिंघवी ने अभूतपूर्व कहा है। बाक़ी दलों ने भी इसकी आलोचना नहीं की है। वह काम जिसे सिविल सोसाइटी कहा जाता है, उसके लिए छोड़ दिया गया है या कुछ अकेली आवाज़ों के लिए।

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इस निर्णय की फौरी पृष्ठभूमि पर विचार कर लेना हमारे लिए उपयोगी होगा। वह इसलिए कि उससे उस दबाव का अंदाज़ होगा जो देश पर बढ़ता ही गया है। इस मामले को एक तरह से अदालत ने आगे बढ़कर हाथ में लिया। यह न्यायमूर्ति केहर के वक़्त से दीख रहा था कि ऊँची अदालत की दिलचस्पी इसमें बढ़ रही है। उसने जो जल्दी दिखलाई, वह अदालत के स्वभाव के विपरीत है। यह कहना ठीक न होगा कि अदालत को राजनीतिक सन्दर्भ का अहसास न था। या, क्या उसी वजह से यह तत्परता थी? क्या अदालत को इसका पूरा अंदाज़ था कि इस मामले पर विचार करने के लिए जितने प्रकार के संसाधन चाहिए, वे उसके पास हैं?

जो भी हो, इस निर्णय का नुक़सान बड़ी अदालत को दोतरफा हुआ है। अल्पसंख्यकों के बीच तो उसकी विश्वसनीयता लगभग समाप्त ही हो गई है, हिंसा की राजनीति करनेवालों के सामने भी उसकी इज़्ज़त घट गई है। वे अब जनता के बीच शान से यह कह सकेंगे कि हमने अदालत का काम आसान किया। अगर हम 1992 में मसजिद न गिराते, तो बेचारी अदालत यह निर्णय भी न दे पाती। लेकिन अब यह यक़ीन बढ़ गया है कि अदालत बहुसंख्यकवाद के लिए क़ानूनी तर्क पेश करने को पेश है। यह ख़बर अदालत के लिए बहुत अच्छी नहीं है।

आपका कार्य ठीक है या नहीं इसे जाँचने का क्या तरीक़ा है? गाँधी का ताबीज भारत की हर पाठ्यपुस्तक में छपा रहता है। 

जाँच की कसौटी है, पंक्ति में खड़े आख़िरी आदमी पर आपके किए का असर। क्या वह उसे और कमज़ोर, और असुरक्षित, और सशंकित करता है या हिम्मत देता है और अपनी निगाह में उसे और ऊँचा उठाता है? ठीक इसके उलट क्या वह दबंग, गुंडे और हिंसक व्यक्ति या समूह को और ढीठ बनाता है या उसे अनुशासित करता है?

इस फ़ैसले की परख भी कैसे होगी? इसका पहला सबूत तो यही होगा कि निर्णय का स्वागत किस तरह किया जा रहा है? 1992 की 6 दिसंबर को अयोध्या में मसजिद गिराए जाने के अभियान के अगुआ, उस हिंसा के मुख्य अभियुक्तों के भी प्रमुख, लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि वे आज सही साबित हुए और इस निर्णय से धन्य महसूस कर रहे हैं। उन्होंने जो आंदोलन किया था, उसके लक्ष्य को प्राप्त करने में अदालत के इस निर्णय ने मदद की है। यह एक वक्तव्य हमारे न्यायमूर्तियों को उनकी सर्वसम्मत शांतिकामी निद्रा से जगाने के लिए काफ़ी होना चाहिए। लेकिन हम जानते हैं कि ऐसा न होगा।

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गाँधी की कसौटी पर फ़ैसले के मायने क्या? 

इस तरह गाँधी की इस कसौटी पर यह फ़ैसला खोटा साबित होता है, दोनों तरफ़ से। यह अल्पसंख्यकों को और हीन बनाता है और बहुसंख्यकवादी हिंसक राजनीति को और बल देता है।

इससे आगे बढ़कर यह इस देश में धर्मनिरपेक्ष राजनीति को और कमज़ोर करता है। इस वक़्त जब चुनावी मजबूरियों के चलते राजनीतिक दल धर्मनिरपेक्ष शब्द का उच्चारण तक भूल गए हैं क्योंकि उससे हिंदू मतदाता के बिदक जाने का डर है, अदालत इस डर के परदे में एक छेद कर सकती थी। क्योंकि उसे वोट नहीं लेने हैं। भारत में उच्चतम न्यायालय का जो रुआब है, उसे भी अगर अदालत ध्यान में रखती तो वह इस डूबती राजनीति को एक सहारा दे सकती थी। ऐसा उसने नहीं किया।

कहा जाता है कि सामान्य समय में नहीं, संकट के समय आपके चरित्र की जाँच होती है। आपातकाल की याद करते हुए हम न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना को ही याद करते हैं, उनके साहस को। उस वक़्त का दबाव झेलना सबके बूते की बात न थी। आख़िर न्यायमूर्ति खन्ना के साथ पीठ पर चार और बिरादर थे। वे सब भारत के मुख्य न्यायाधीश हुए। न्यायमूर्ति खन्ना ने अपनी सिद्धांतप्रियता की क़ीमत दी। लेकिन इसी कारण तब 'न्यूयॉर्क टाइम्स' ने उनके लिए लिखा,

अगर कभी भारत अपनी आज़ादी और जम्हूरियत को वापस हासिल कर पाया जो उसकी ख़ास पहचान हुआ करती थी, तब कोई न कोई ज़रूर न्यायमूर्ति खन्ना के लिए एक स्मारक खड़ा करेगा।


'न्यूयॉर्क टाइम्स' (न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना के फ़ैसले पर)

पीठ के बाक़ी बिरादरों को सबसे ऊँची कुर्सी तो मिली लेकिन यह अयाचित सम्मान उन्हें नहीं नसीब हुआ। इतिहास ने किसे सम्मानित किया? लेकिन इस महत्वाकांक्षा के वशीभूत न्यायमूर्ति खन्ना ने अपना स्टैंड न लिया होगा। वह नफ़े-नुक़सान की भावना से निरपेक्ष जो एक न्याय की भावना है, उसी से प्रेरित थे।

क्या यह बात इस निर्णय के बारे में कही जा सकती है? इसके पक्ष में जो सबसे बड़ा तर्क दिया जा रहा है, वह यह कि यह व्यावहारिक निर्णय है। व्यावहारिकता प्रशंसा नहीं है, वह सिद्धांत का पालन न कर पाने की बाध्यता का स्वीकार भर है। 

आज़ादी के पहले भारत में उच्चतम न्यायालय के गठन को लेकर जो बहस चल रही थी, उसमें जिन्ना और आंबेडकर ने अपने संदेह व्यक्त किए थे। ऐसे ही संदेह यूरोपियनों की ओर से भी ज़ाहिर किए गए। गाँधी ने कहा, ‘मैं उम्मीद करता हूँ कि मेरे सपनों का फ़ेडरल कोर्ट अगर वजूद में आता है तो यूरोपीय और हर कोई, सारे अल्पसंख्यक निश्चिन्त रह सकते हैं कि कोर्ट उन्हें निराश नहीं करेगा....।’

क्या आज की अदालत यह कह सकती है कि गाँधी के इस आश्वासन की उसे याद भी है? क्या उसने अल्पसंख्यकों को निराश नहीं किया है?

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