विश्वविद्यालयों में विचारों की विविधता बर्दाश्त नहीं!
यह बड़ी अच्छी बात है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति ने परिसर में हुई हिंसा की घटना पर चिंता ज़ाहिर की है। आज के पहले उन्होंने कभी यह नहीं किया है। पिछले हफ़्ते उत्तरी परिसर में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की भेदभाव विरोधी नियमावली के पक्ष में एक प्रदर्शन के दौरान खुद को पत्रकार कहनेवाली एक महिला और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प और हिंसा हुई। जब प्रदर्शकारियों में से कुछ विद्यार्थी रिपोर्ट लिखवाने थाने गए तो वहाँ पहले से एक उग्र भीड़ मौजूद थी। भद्दी भद्दी गालियाँ देते हुए और ‘देश के ग़द्दारों को गोली मारो’ के नारे लगाती इस भीड़ ने रिपोर्ट लिखवाने के लिए पहुँचे विद्यार्थियों पर हमला करने की कोशिश की। इस भीड़ में एक महिला ‘ब्राह्मणवाद ज़िंदाबाद’ के नारे लगाते हुए दिख रही है जिसे भीड़ ने कंधे पर उठा रखा है। मालूम हुआ कि वह खुद ब्राह्मण नहीं है। लेकिन ब्राह्मणवादी है। इसी से हम समझ सकते हैं कि ब्राह्मणवाद वास्तव में एक विचारधारा है जिसे ग़ैरब्राह्मण भी मान सकते हैं। उसे मानने के लिए ब्राह्मण होना ज़रूरी नहीं है।
रिपोर्ट लिखवाने थाना गए विद्यार्थियों को इस हिंसा से बचने के लिए थाने के भीतर एक कमरे में कई घंटे बैठे रहना पड़ा। पुलिस को इन्हें हिंसक भीड़ से बचाने और भीड़ को बाहर रखने के लिए ख़ासी मशक़्क़त करनी पड़ी। पुलिस ने थाने पर हमलावर इस भीड़ के आगे भारी संयम का परिचय दिया। क्या यह संयम इसलिए था कि यह भीड़ विद्यार्थियों की थी या इसलिए कि यह राष्ट्रवादी भीड़ थी? अगर ‘ब्राह्मणवाद ज़िंदाबाद’ की जगह कोई और नारा लगता तो क्या पुलिस उतना ही संयम दिखलाती?
हिंसा की इस तरह की घटना में जैसा होता है; हिंसा की शुरुआत, किसने हिंसा की, इन बातों को लेकर तुरत ही ख़ासा भ्रम पैदा हो जाता है। रुचि तिवारी नामक महिला का दावा है कि वह पत्रकार है और उसपर हमला किया गया। लेकिन वीडियो में दीख रहा है कि वह ख़ुद मारपीट कर रही है। फिर उसे कुछ विद्यार्थी पकड़ कर पुलिस के हवाले करने की बात कर रहे हैं। उसके बाद ‘देश के ग़द्दारों को गोली मारो’ के नारे लगाती भीड़ पुलिस स्टेशन के बाहर इकट्ठा हो आती है। हिंसा करनेवाले कौन हैं, यह साफ़ दिख रहा है।
यूजीसी नियमावली का विरोध क्यों?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भेदभाव के ख़िलाफ़ नियमावली जारी की। ठीक उसी वक्त से तथाकथित उच्च जाति के लोगों ने, जिनमें विद्यार्थी भी शामिल हैं, इसके ख़िलाफ़ आंदोलन शुरू कर दिया। उनका विरोध इतना उग्र था कि सर्वोच्च न्यायालय तक उससे प्रभावित हो गया और उसने नियमावली की कार्रवाई पर रोक लगा दी। अदालत ने यह आशंका भी जतलाई कि इस तरह की नियमावली से समाज बँट सकता है। उसके बाद से नियमावली लागू करवाने के लिए प्रदर्शन हो रहे हैं।
ज़ाहिर है, ये प्रदर्शन प्रायः दलित, अति पिछड़ा समुदाय के लोगों के द्वारा ही किए जा रहे हैं। इन प्रदर्शनों में कुछ ‘यू ट्यूबर’ घुसकर खुलेआम उकसावे भरे सवाल करते हैं जिनमें दलित समुदाय के प्रति घृणा साफ़ दिखलाई पड़ती है।
पत्रकार नहीं, यू ट्यूबर!
ये पत्रकार नहीं हैं। यू ट्यूब के लिए वीडियो ज़रूर बनाते हैं। ये वीडियो उत्तेजना पैदा करनेवाले और ख़ासे भड़काऊ होते हैं। प्रायः ये लोग दक्षिणपंथी, जातिवादी विचार का प्रचार करनेवाले होते हैं। इनका काम ऐसे वीडियो बनाना है जिससे समाज में मौजूद ‘उच्च जाति’ के लोगों के पूर्वग्रहों को सहलाया जा सके और उनमें दलित और ‘पिछड़ी’ जातियों के ख़िलाफ़ घृणा भड़काई जा सके।
इनके सवाल इतने अपमानजनक होते हैं कि कोई भी उत्तेजित हो सकता है। फिर आरोप लगाया जा सकता है कि दलितों में अपने प्रति आलोचनात्मक सवाल को लेकर सहिष्णुता नहीं है। उन्हें ही हिंसक ठहराया जा सकता है। इस भड़काऊ हरकत को पत्रकारिता का नाम देकर यू ट्यूबर खुद का बचाव कर सकते हैं।
यह संयोग नहीं है कि इस घटना के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने यू ट्यूबर रुचि तिवारी के पक्ष में बयान जारी किया है। यह भी संयोग नहीं है कि कुलपति महोदय ने इस घटना के बाद बयान देना ज़रूरी समझा है। इरफ़ान हबीब पर हमला
इस घटना के एक दिन पहले उत्तरी परिसर में ही हिंसा का एक और वाक़या हो चुका था। ‘आर्ट्स फैकल्टी’ के बाहर एक सभा में इतिहासकार एस. इरफ़ान हबीब बोल रहे थे। परिसर के भीतर से उनपर एक बाल्टी फेंकी गई। बाल्टी उनपर नहीं गिरी। उसका पानी ज़रूर उनपर गिरा। फिर पत्थर भी फेंके गए। एक बिलकुल शांतिपूर्ण सभा पर इस हमले के लिए क्या बहाना था? हमला छिपकर किया गया। क्या इसे इसलिए नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए कि किसी को चोट नहीं पहुँची? इरादा चोट पहुँचाने और सभा में अव्यवस्था पैदा करना तो था ही।
यह सब कुछ विश्वविद्यालय के सुरक्षाकर्मियों के सामने हुआ। लेकिन हमला करनेवाले की पहचान नहीं की जा सकी। एक अध्यापक और विद्वान पर इस हमले के बाद कुलपति ने कोई अफ़सोस नहीं ज़ाहिर किया। मानो, यह हमला उनके विचार की आलोचना की एक वैध शैली मात्र है।पिछले 11 वर्षों में परिसरों में हिंसा की घटनाओं में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। प्रायः यह हिंसा हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के पैरोकार छात्र संगठन की तरह से की जाती है। वे सभाओं में अव्यवस्था फैलाने की कोशिश करते हैं, अध्यापकों और विद्यार्थियों पर हमले करते हैं। उन्हें इसका यक़ीन होता है कि प्रशासन उनके साथ होगा।
वे यह भी जानते हैं कि पुलिस भी उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं करेगी। 5 साल पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कई घंटे तक ये हमलावर विद्यार्थियों और अध्यापकों के साथ मार पीट करते रहे। उन सबके चेहरे वीडियो में साफ़ दिख रहे हैं और उनके नाम भी मालूम हैं। लेकिन आज तक पुलिस उन्हें खोज नहीं पाई है। अधिक मुनासिब यह कहना होगा कि वह इन्हें खोजना नहीं चाहती है।
हिंसक कौन- वामपंथी या राष्ट्रवादी?
यह बहुत दिलचस्प है कि वामपंथियों को स्वाभाविक तौर पर हिंसा का समर्थक माना जाता है लेकिन वामपंथी छात्र संगठन हिंसा करते हों, इसके उदाहरण नहीं मिलते। वाम शासन का पश्चिम बंगाल का दौर अपवाद है। केरल में भी गाहे-बगाहे इसके उदाहरण मिलते रहे हैं। लेकिन पूरे भारत से परिसर में राष्ट्रवादी हिंसा के उदाहरण इतने हैं कि यह कहना ग़लत नहीं होगा कि राष्ट्रवाद के इस हिंदुत्ववादी संस्करण के स्वभाव में ही हिंसा है।
इस राष्ट्रवादी हिंसा के प्रति प्रशासन प्रायः सहिष्णु होता है। दूसरे छात्र संगठनों को मात्र इस आधार पर प्रताड़ित किया जा सकता है कि उन्होंने कोई सभा क्यों की या कोई फ़िल्म क्यों दिखलाई। कई बार प्रशासक खुद इस हिंसा का समर्थन और प्रचार करते दिखलाई पड़ते हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रति उनका पक्षपात स्पष्ट है। परिसर में ‘हिंसा’ की इस वारदात के एक दिन पहले दिनभर एक कार्यक्रम में ‘भारत माता की जय, वंदे मातरम्, जय श्रीराम’ के नारे लगते रहे। क्या किसी और कार्यक्रम की इजाज़त दी जा सकती है जिसमें इसी तरह लाउडस्पीकर से कोई और नारेबाज़ी की जाए?
विविधता का कितना सम्मान?
कुलपति ने ठीक ही कहा है कि विचारों की विविधता का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन कौन है जो ‘राष्ट्रवादी’ विचार के अलावा परिसर में किसी और विचार को बर्दाश्त नहीं कर सकता? क्या यह सच नहीं कि एबीवीपी के अलावा और किसी छात्र संगठन को गोष्ठी, सभा की इजाज़त नहीं दी जाती? फिर विचार की विविधता के सम्मान की अपील का क्या अर्थ है? क्या कुलपति ने खुद यह नहीं कहा था कि परिसर में अध्यापकों के भेस में माओवादी छिपे हैं और उनका समूल नाश करना सबका कर्तव्य है?
परिसर विचार-विमर्श की जगह है। विचार एक दूसरे से टकराएँगे और उस टकराहट में उत्तेजना भी होगी। इस द्वंद्व और टकराहट को शारीरिक हिंसा में बदलने से रोकना सबका कर्तव्य है। लेकिन सबसे अधिक यह कर्तव्य प्रशासन का है कि वह अपने आचरण से प्रदर्शित करे कि वह ‘राष्ट्रवादी’ हिंसा को भी जायज़ नहीं मानता। उसके बिना सहिष्णुता की बात, बस, बात ही है!