17 अप्रैल, 2026 भारतीय जनतंत्र के इतिहास की कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण तारीख़ों में से एक गिनी जाएगी। इस रोज़ भारत के विपक्षी दलों ने प्रदर्शित किया कि उन्हें जनतंत्र पर मंडरा रहे ख़तरे की गंभीरता का पूरा अहसास है।जो एकता और राजनीतिक समझ वे 2019 में नागरिकता संविधान संशोधन विधेयक के समय नहीं दिखला पाए थे, वह 17 अप्रैल, 2026 को हासिल कर ली गई। उन्होंने साथ मिलकर संसद में सीटों की संख्या 850 करने की सरकार की कोशिश को नाकाम कर दिया।  
सरकार की यह हार भारतीय जनतंत्र के जीवित रहने के लिए ज़रूरी थी।अपनी जीत से  विपक्ष में आत्मविश्वास लौटा है।जनता में भी अब विपक्ष का पक्ष जानने की उत्सुकता बढ़ी है और उसने इस बार संसद की बहस को भी कुछ अधिक ध्यान से देखा और सुना है।वह ‘मुख्यधारा’ की मीडिया से बाहर जाकर जानने का प्रयास कर रही है कि सरकार उसके साथ कहाँ और कैसे छल-कपट कर रही है।इसलिए इस बार शायद ही वह सरकार के इस झाँसे में आए कि वह महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए क़ानून ला रही थी और महिला विरोधी विपक्ष ने उसे यह करने नहीं दिया। 
जनता विपक्ष के इस तर्क को भी सुनना चाहेगी कि संसद में महिलाओं के आरक्षण का क़ानून तो 2023 में ही बन चुका है, फिर सरकार उसे लागू क्यों नहीं कर देती? क्या संसद की मौजूदा 543 की संख्या में वह आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता? महिलाओं को 33% आरक्षण देने के लिए संसद सदस्यों की संख्या बढ़ाने की ज़रूरत क्यों है? 
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क्या जनता सिद्धार्थ वरदराजन के इस लेख को नहीं पढ़ सकती या उसे इसके बारे में कोई बतला नहीं सकता कि असल इरादा महिलाओं की आवाज़ को और जगह देने का नहीं, बल्कि विधायिकाओं में पुरुषों का दबदबा बनाए रखने का है।वे पूछते हैं कि  566 पुरुष और 284 महिला का अनुपात 362 पुरुष और 181 महिला के अनुपात से बेहतर क्यों और कैसे है? वे ठीक ही लिखते हैं कि यह कुछ कुछ एक हवेली में मर्दाना जगह को और फैला कर एक जनाना के लिए कोना बनाने जैसा ही है।
विपक्ष ने ठीक आरोप लगाया है कि असल मक़सद महिलाओं की आड़ में सांसदों का पुनर्वितरण करने का था जिसका सबसे ज़्यादा नुक़सान ‘ग़ैर हिंदी’ प्रदेशों को होनेवाला था।सरकार द्वारा प्रस्तावित विधेयक में संसद में सिर्फ़ मर्दों का दबदबा नहीं, बल्कि हिंदी प्रदेशों का वर्चस्व बढ़ाने की साज़िश भी थी, यह सिद्धार्थ वरदराजन ने अपने लेख में तर्कपूर्ण ढंग से समझाया है। 
सरकार की यह दलील भी लचर है कि अगर विपक्ष मान जाता तो वह हर जगह सांसदों की संख्या में 50% की बढ़ोत्तरी की बात इस विधेयक में जोड़ देती। फिर वह यह विलाप भी कर रही है कि विपक्ष इतना असभ्य है कि वह प्रधानमंत्री तक के आश्वासन पर भरोसा करने को तैयार नहीं! 

इससे बड़ा अपमान जनतंत्र का और क्या हो सकता है कि प्रधानमंत्री पर भरोसा न किया जाए!

प्रियंका गांधी ठीक कह रही हैं कि इस प्रधानमंत्री और सरकार का भरोसा नहीं किया जा सकता जो हर संवैधानिक प्रक्रिया को एक के बाद एक ध्वस्त करती जा रही है और जिसकी शब्दावली में सच की कोई जगह नहीं। नरेंद्र मोदी और उनके मंत्री सच बोलने में असमर्थ हैं। यह बात तो इस सरकार के समर्थक भी मानते हैं कि उनकी सरकार झूठ बोलने और धोखा देने में माहिर है।वे इस बात में गर्व महसूस करते हैं कि उनका झूठ सच मान लिया जाता रहा है।
जनता सरकार के झूठ को सच क्यों मान लेती है? क्योंकि मीडिया उसे सच की तरह प्रसारित करता है। इस बार भी मीडिया यह कह रहा है विपक्ष ने महिला आरक्षण विधेयक को गिरा दिया है।यह झूठ है।सच यह है कि महिला आरक्षण के बहाने संसद,विधायिकाओं की संरचना को बदलने के सरकारी प्रयास को विपक्ष ने विफल कर दिया है।अगर यह नहीं था तो इसके साथ दो और विधायकों को क्यों नत्थी किया गया था ?अगर इरादा महिलाओं को आरक्षण देना था तो फिर चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन के विधेयक को इसके साथ क्यों जोड़ा गया था? इसके साथ संघशासित प्रदेशों से संबंधित विधेयक क्यों नत्थी कर दिया? 
इससे साफ़ है कि असल बात महिलाओं के लिए जगह बढ़ाने की नहीं, बल्कि उसके बहाने भारत के चुनावी नक़्शे को बदल देने की है।दक्षिण, उत्तर पूर्व के क्षेत्रों और ख़ासकर मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को सीमित करके निष्प्रभावी बना देने की साज़िश को समझना इतना कठिन नहीं है।हम देख चुके हैं कि असम और जम्मू-कश्मीर में चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन में मुसलमानों की किस तरह राजनीतिक रूप से कमज़ोर कर दिया गया है। महिलाओं को आरक्षण देने के लिए इन दोनों विधेयकों को पारित करना क्यों ज़रूरी है?
यह सबसे सरल सवाल है जो मीडिया को पूछना चाहिए, लेकिन वह नहीं पूछ रहा है।वह सरकारी झूठ की आँधी उठा रहा है जिसमें लोगों की निगाहें मुँद जाएँ और वे न देख पाएँ कि उनके साथ क्या किया जा रहा है। विश्लेषकों का एक दल है जो इस पूरे प्रकरण को नरेंद्र मोदी के मास्टर स्ट्रोक की तरह पेश कर रहा है।कहा जा रहा है कि सरकार को मालूम था कि यह विधेयक पारित नहीं हो पाएगा लेकिन उसने जान बूझ कर यह किया जिससे वह विपक्ष को महिला विरोधी साबित कर सके।विपक्ष को अब साबित करना पड़ेगा कि वह महिला विरोधी नहीं है। 
इस क़िस्म का तर्क बोगस है। सरकार को पहले से यह नहीं मालूम था कि इस बार वह विपक्ष में विभाजन नहीं पैदा कर पाएगी। उसने कोशिश भरपूर की। लेकिन इस बार बिहार, बंगाल, आदि जगहों में एस आई आर की प्रक्रिया में खुलेआम मतदाताओं का नाम काटने की सामूहिक नाइंसाफ़ी ने विपक्ष को सावधान कर दिया है। उसे मालूम है कि यह सरकार हर तिकड़म करके अपने लिए स्थायीत्व का इंतज़ाम कर रही है। इस जनतांत्रिक सावधानी के कारण ही विपक्ष डटा रहा और सरकार के किसी झाँसे में आने से उसने इनकार कर दिया।
संसद में हार के बाद अब सरकार सड़क पर उतर आई है। उसने विपक्ष पर धावा बोल दिया है।संसद में संविधान संशोधन विधेयक की निर्णायक पराजय के बाद अपनी शर्म छिपाने के लिए उसने आजमाया हुआ पुराना रास्ता अपनाया है। लेकिन इससे यह बात और भी फैल रही है कि ख़ुद को अजेय प्रदर्शित करनेवाले नरेंद्र मोदी को हराया जा सकता है। लोग यह भी पूछ रहे हैं कि अगर यह विधेयक इतना ज़रूरी था तो क्यों इसे बिना पर्याप्त सूचना के, यकायक, राज्यों के चुनावों के बीच पेश किया गया? क्या इतना महत्त्वपूर्ण यह ख़याल अचानक सपने में आया? 
प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय टी वी चैनल, दूरदर्शन, पर राष्ट्र के नाम संबोधन जैसे पवित्र अवसर का उपयोग करके इस विधेयक के परास्त होने के लिए विपक्ष पर हमला किया।मोदी ने ख़ासकर कांग्रेस पार्टी, तृणमूल और डी एम के पर आक्रमण किया है।निम्न स्तरीय और अनैतिक राजनीति के लिए मोदी को जाना जाता है लेकिन यह संबोधन जनतांत्रिक व्यवहार के लिहाज़ से अस्वीकार्य है। क़ायदे से अब तक प्रधानमंत्री को चुनाव आयोग की नोटिस नील जानी चाहिए थी और उनके चुनाव प्रचार पर रोक लग जानी चाहिए थी। लेकिन हम जानते हैं कि चुनाव आयोग अब भाजपा का एक प्रभाग मात्र है जिसका काम भाजपा की चुनावी हार को जीत में बदलने का रह गया है। 
यह देखना दिलचस्प होगा कि कितने अख़बार प्रधानमंत्री के इस अनैतिक कृत्य की आलोचना करते हैं। इससे यह फिर पता चलेगा कि कितनों को इस देश में जनतंत्र के ज़िंदा रहने की फ़िक्र है।
किसी को हो न हो, जनता को यह चिंता होनी चाहिए। जिस तरह नोएडा, पानीपत के मज़दूर या ओड़िशा के आदिवासी अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं, हम सबको अपने जनतांत्रिक अधिकारों की हिफाजत के लिए विपक्ष के साथ एकजुट हो जाना चाहिए। यह एक लम्हा जनतंत्र की वापसी का हो सकता है या अपनी गफ़लत में हम इसे गँवा भी सकते हैं। चुनाव हमें करना है।