बंगाल सीएम शुभेंदु अधिकारी ने नये नियम इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट 2025 का हवाला दिया है। यह अप्रैल 2025 में पास हुआ नया कानून है। केंद्र सरकार ने 14 मई 2025 को बंगाल सरकार को अवैध घुसपैठियों को पहचानकर बीएसएफ़ को सौंपने का निर्देश दिया था।
पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कथित अवैध बांग्लादेशियों को लेकर एक और विवादित फ़ैसला लिया है। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने आदेश दिया है कि अब अवैध बांग्लादेशियों को कोर्ट में पेश नहीं किया जाएगा, बल्कि सीधे बॉर्डर सुरक्षा बल यानी BSF को सौंप दिया जाएगा ताकि उन्हें वापस बांग्लादेश भेजा जा सके। यह आदेश 20 मई 2026 से लागू हो गया है। राज्य पुलिस और रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स आरपीएफ़ को इसकी साफ़ सूचना दे दी गई है। अब तक नियम रहा है कि अवैध विदेशियों को पहले कोर्ट में पेश किया जाता रहा और अदालती आदेश के अनुसार कार्रवाई की जाती रही थी।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार आदेश में कहा गया है कि जो लोग अवैध रूप से भारत आए हैं और सीएए यानी नागरिकता संशोधन कानून के तहत नागरिकता के हकदार नहीं हैं, उन्हें सीधे बीएसएफ़ के हवाले किया जाएगा। यह कदम उस 'पता लगाओ, हटाओ और वापस भेजो' रणनीति का हिस्सा है, जिसे शुभेंदु अधिकारी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की 'बांग्लादेशी घुसपैठियों' से निपटने की रणनीति बताया है।
हुगली के हावड़ा स्टेशन पर पकड़े गए ऐसे लोगों को पहले अच्छा खाना खिलाया जाएगा और फिर उन्हें बोंगांव के पेट्रापोल या उत्तर 24 परगना के बसीरहाट के बीएसएफ़ चौकियों पर ले जाकर सौंपा जाएगा। हर हफ्ते ऐसे पकड़े गए लोगों की रिपोर्ट मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजनी होगी।
क्यों लिया गया यह फैसला?
बीजेपी सरकार का कहना है कि बांग्लादेशी घुसपैठिए देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं। पहले ममता बनर्जी सरकार पर आरोप लगता था कि वह वोट बैंक की राजनीति के लिए इन को नज़र अंदाज़ करती थी। बीजेपी ने 2026 के चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाया था और सत्ता में आने के बाद अब सख्ती शुरू कर दी है।
कानूनी सवाल बेहद अहम
यह आदेश काफी महत्वपूर्ण लेकिन विवादास्पद भी है। कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी निजी तौर पर कह रहे हैं कि क्या पुलिस खुद किसी को 'अवैध घुसपैठिया' घोषित करके कोर्ट के बिना बीएसएफ़ को सौंप सकती है? आमतौर पर विदेशी कानून 1946 की धारा 14(A) के तहत ऐसे लोगों को कोर्ट में पेश किया जाता है। कोर्ट ही तय करता है कि व्यक्ति अवैध है या नहीं।
मुख्यमंत्री ने इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट 2025 का हवाला दिया है। यह अप्रैल 2025 में पास हुआ नया कानून है। केंद्र सरकार ने 14 मई 2025 को बंगाल सरकार को अवैध घुसपैठियों को पहचानकर बीएसएफ़ को सौंपने का निर्देश दिया था।
क्या बिना कोर्ट में पेशी के BSF को सौंप सकती है?
कुछ लोग कह रहे हैं कि यह कदम घुसपैठ पर लगाम लगाने में मदद करेगा, लेकिन कानूनी प्रक्रिया का पालन न करने से कोर्ट में चुनौतियां आ सकती हैं। 'द टेलीग्राफ' के अनुसार, कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने निजी तौर पर इस बात पर संदेह जताया है कि क्या कानून लागू करने वाली एजेंसियां खुद से यह तय कर सकती हैं कि कोई व्यक्ति अवैध प्रवासी है और बिना किसी न्यायिक जांच के उसे सीधे BSF को सौंप सकती हैं। पश्चिम बंगाल पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कोलकाता स्थित इस अखबार को बताया, "अगर किसी बांग्लादेशी नागरिक को बिना वैध दस्तावेजों के भारत में प्रवेश करने या तय समय से ज़्यादा रुकने के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है, तो आमतौर पर उस पर 'विदेशी अधिनियम, 1946' की धारा 14(A) के तहत मामला दर्ज किया जाता है और उसे कोर्ट में पेश किया जाता है।" अधिकारी ने आगे कहा, "यह कौन तय करेगा कि कोई बांग्लादेशी नागरिक अवैध रूप से भारत में घुसा है या अपने परमिट की अवधि खत्म होने के बाद भी भारत में रुका हुआ है? कोर्ट। यह फैसला कानून लागू करने वाले अधिकारियों के अपने विवेक पर नहीं छोड़ा जा सकता।" पश्चिम बंगाल से और ख़बरें
असम में भी इसी तरह की कार्रवाई पर कोर्ट में याचिकाएं दायर हुई हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भी इसी तरह की नीति चला रहे हैं। वहां विदेशी घोषित लोगों को डिटेंशन सेंटर में रखने की बजाय सीधे वापस धकेलने की रणनीति अपनाई जा रही है। दोनों भाजपा मुख्यमंत्रियों के बीच इस मुद्दे पर अच्छी तालमेल दिख रहा है।
नई बीजेपी सरकार के और भी कई सख्त कदम
- बीएसएफ़ को दीवार बनाने के लिए जमीन सौंपी
- राज्यभर में अतिक्रमण हटाने की मुहिम
- ईद से पहले कुरबानी के सख्त नियम
- सभी स्कूलों-मदरसों में वंदे मातरम गाना अनिवार्य
बहरहाल, पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी सरकार ने अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को सीधे बीएसएफ़ को सौंपने का नया सिस्टम शुरू कर दिया है। यह फैसला भाजपा की सख्त सीमा नीति का हिस्सा है, लेकिन कानूनी सवाल अभी भी बाकी हैं। सरकार का लक्ष्य है कि ऐसे मामले सालों तक कोर्ट में न उलझें। लेकिन सवाल है कि क्या सरकार, प्रशासन या बीएसएफ़ न्यायालय जैसा फ़ैसला कर सकता है? क्या यह न्याय होगा?