किसी भी चुनाव में हर राजनीतिक पार्टी में टिकट नहीं मिलने पर कुछ लोग नाराज़ ज़रूर होते हैं। लेकिन कुछ दलों में यह नाराजगी जल्दी ही दब या दबा दी जाती है और कुछ में यह सड़कों पर उतर जाती है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के टिकटों के बंटवारे के मुद्दे पर इस समय नाराजगी के सड़कों पर उतरने वाली यही तस्वीर भाजपा में नजर आ रही है।
वैसे, वर्ष 2021 के चुनाव से पहले भी भारी पैमाने पर बगावत और विरोध हुआ था। तब आरोप लगे थे कि बड़े नेताओं ने टिकटों के बंटवारे में दलबदलुओं को तरजीह दी है। इस बार भी हालात अलग नहीं हैं। प्रदेश अध्यक्ष के करीबी समझे जाने वाले उपाध्यक्ष अमिताभ राय को भी टिकट नहीं मिला है। उन्होंने इस पर भारी नाराजगी जताई है। वो पार्टी के पुराने नेता रहे हैं। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष की पत्नी रिंकू मजूमदार भी टिकट नहीं मिलने पर सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जता चुकी हैं। पार्टी के केंद्रीय नेता सुनील बंसल पर भी वादाखिलाफी के आरोप लग रहे हैं।
उम्मीदवारों की सूची की घोषणा के बाद से ही नाराज कार्यकर्ताओं के राज्य में जगह-जगह विरोध प्रदर्शन और पार्टी के दफ्तरों में तोड़-फोड़ की ख़बरें सामने आ रही हैं।

दिलीप घोष की पत्नी नाराज़

दिलीप घोष को पार्टी ने इस बार उनकी पारंपरिक सीट खड़गपुर सदर से मैदान में उतारा है। उनकी पत्नी रिंकू मजूमदार इस बार कोलकाता से सटी राजारहाट-न्यू टाउन सीट पर चुनाव लड़ना चाहती थी और इसके लिए उन्होंने बाकायदा केंद्रीय नेतृत्व को बायोडाटा समेत आवेदन भी भेजा था। लेकिन उनका नाम न तो पहली सूची में था और न ही दूसरी सूची में। उस सीट पर पार्टी ने पीयूष कानोड़िया को टिकट दिया है। इसके बाद रिंकू ने सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जताई है।

पार्टी नेतृत्व ने रिंकू सिंह को टिकट नहीं देने पर दलील दी है कि एक परिवार से एक ही व्यक्ति को टिकट मिलना था। इस पर रिंकू ने सवाल किया है कि अगर ऐसा है तो शुभेंदु अधिकारी और अर्जुन सिंह के मामले में इस नियम का पालन क्यों नही किया गया?

दरअसल, विपक्ष के नेता शुभेंदु के भाई और बैरकपुर के सांसद रहे अर्जुन सिंह के पुत्र को भी टिकट मिला है। रिंकू का कहना है कि उनको टिकट नहीं देकर केंद्रीय नेतृत्व ने अच्छा नहीं किया। वो दिलीप घोष के पहले से पार्टी से जुड़ी हैं।

कई जगह प्रदर्शन

भाजपा की पहली सूची के प्रकाशन के साथ ही राज्य में कई जगह बगावत और विरोध प्रदर्शन की ख़बरें आने लगी थीं। दूसरी सूची के प्रकाशन के बाद यह सिलसिला और तेज हुआ है। शनिवार को खड़गपुर की नारायणगढ़ सीट पर बीजेपी उम्मीदवार बदलने की मांग में जमकर हंगामा हुआ। वहां प्रदर्शनकारियों ने पार्टी के जिला कार्यालय में जमकर तोड़फोड़ की।
इस बीच, पार्टी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय पर्यवेक्षक सुनील बंसल पर भी वादाखिलाफी के आरोप लग रहे हैं।

बीजेपी ने वादा तोड़ा?

बीजेपी नेताओं का कहना है कि उन्होंने चुनाव के छह महीने पहले से ही एक सात सदस्यीय समिति की मदद से बूथ सशक्तिकरण अभियान के ज़रिए संगठन को मज़बूत करने का काम कराया था। तब उन्होंने समिति के कम से कम तीन सदस्यों को टिकट देने का वादा किया था। लेकिन दोनों सूची में इनमें से किसी का भी नाम नहीं है। जिन सीटों के लिए उनके नाम पर विचार हो रहा था, वहां दूसरे उम्मीदवार उतार दिए गए हैं। शनिवार को कई अन्य जिलों से भी ऐसे ही प्रदर्शन और तोड़फोड़ की ख़बरें सामने आईं।

हावड़ा के बाली में तो टिकटों के मुद्दे पर पार्टी में टूट शुरू हो चुकी है। किसी ‘भूमिपुत्र’ यानी स्थानीय व्यक्ति को उम्मीदवार बनाने की मांग में पार्टी के सौ से ज्यादा कार्यकर्ता और समर्थक तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं।

इसी तरह नदिया जिले के कृष्णनगर में सैकड़ों कार्यकर्ता कांसे और पीतल की घंटी बजाते हुए जिला कार्यालय के बाहर पहुंच कर नारेबाजी और प्रदर्शन करने लगे। उन्होंने रानाघाट की दोनों सीटों पर उम्मीदवार बदलने की मांग उठाई है। कुछ देर प्रदर्शन के बाद कार्यकर्ताओं ने दफ्तर में तोड़फोड़ भी की।
रानाघाट को भाजपा का गढ़ माना जाता है। लेकिन अपने मजबूत गढ़ में पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों की बगावत के कारण जिला नेतृत्व की परेशानी बढ़ गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हर बार चुनाव से पहले ऐसा माहौल बन जाता है कि जिससे कार्यकर्ताओं को लगता है कि इस बार उसका सत्ता में आना तय है। इसीलिए टिकटों की मारामारी मच जाती है। लेकिन चुनाव के समय पूरे पांच साल तक जमीनी स्तर पर काम करने वाले स्थानीय कार्यकर्ताओं की जगह शीर्ष नेतृत्व किसी दूसरे व्यक्ति या बाहरी नेताओं को टिकट थमा देता है। इससे असंतोष स्वाभाविक है। हालाँकि पार्टी के प्रदेश नेताओं ने अब इस असंतोष को दूर करने की कवायद शुरू की है। लेकिन यह लगातार बढ़ता ही जा रहा है।