कलकता हाई कोर्ट ने एक आदेश पर चुनाव आयोग को बड़ा झटका दिया है तो क्या अब इसकी 'मनमानी' पर अंकुश लगेगा? चुनाव आयोग ने आख़िर आँख बंदकर 800 लोगों को ‘परेशान करने वाला’ किस आधार पर बता दिया था?
पश्चिम बंगाल में पहले चरण के चुनाव से पहले चुनाव आयोग की 'मनमानी' को कलकता हाई कोर्ट ने बड़ा झटका दिया है। इसने 'परेशान करने वाला' यानी trouble-maker बताने वाले चुनाव आयोग के एक विवादित आदेश पर रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग किसी भी व्यक्ति को सिर्फ ट्रबल मेकर कहकर आम आदेश नहीं जारी कर सकता। यह क़ानून के ख़िलाफ़ है। वैसे, अदालत का फ़ैसला तो सिर्फ़ एक मामले में आया है, लेकिन टीएमसी चुनाव आयोग के अधिकतर फ़ैसलों पर आपत्ति जताती रही है। ऐसी रिपोर्टें भी लगातार आ रही हैं कि चुनाव आयोग ने राज्य में पहली बार ऐसी अनपेक्षित चीजें की हैं जो चौंकाने वाली हैं।
बहरहाल, ताज़ा मामला 21 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी के ऑफिस से जारी एक मेमो से जुड़ा है। इसमें क़रीब 800 लोगों की लिस्ट थी और उन्हें 'परेशान करने वाले' यानी ट्रबल मेकर बताया गया था। मेमो में कहा गया था कि ये लोग मतदाताओं को डराते-धमकाते हैं और चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी करते हैं। इस लिस्ट में स्थानीय पार्षद, पंचायत सदस्य, विधायक और सांसद जैसे चुने हुए प्रतिनिधि भी शामिल थे। मेमो में पुलिस को इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था।
हाईकोर्ट का फ़ैसला
मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल और न्यायाधीश पार्थ सारथी सेन की डिवीजन बेंच ने इस मेमो पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा, 'हमारी प्रथम दृष्टया राय है कि मुख्य चुनाव अधिकारी के ऑफिस में तैनात पुलिस ऑब्जर्वर ने गलती की है। वे किसी भी नागरिक को आँख बंद करके 'परेशान करने वाला' घोषित नहीं कर सकते।' कोर्ट ने आदेश दिया कि 21 अप्रैल वाला मेमो जून 2026 के आखिरी दिन तक या कोर्ट के अगले आदेश तक प्रभावी नहीं रहेगा।याचिकाकर्ता का तर्क
वरिष्ठ वकील कल्याण बंदोपाध्याय ने कोर्ट में कहा कि चुनाव आयोग के पास किसी को 'trouble-maker' कहकर सामान्य आदेश जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। यह शब्द किसी भी कानून में मान्य नहीं है।
चुनाव से जुड़े अपराध पहले से ही भारतीय न्याय संहिता यानी बीएनएस, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में लिखे हैं। इन कानूनों के तहत सक्षम अधिकारी ही अपने विवेक से कार्रवाई कर सकते हैं। चुनाव आयोग आम आदेश देकर पुलिस को निर्देश नहीं दे सकता।पश्चिम बंगाल के एडवोकेट जनरल किशोर दत्ता ने भी याचिका का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि 'trouble-maker' कोई कानूनी श्रेणी नहीं है। किसी की स्वतंत्रता पर रोक लगाने के लिए सख्त कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
बचाव में चुनाव आयोग की दलील
चुनाव आयोग की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील ने कहा कि मेमो का मकसद सिर्फ निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करना था। उन्होंने दावा किया कि मेमो में कानून के खिलाफ कोई निर्देश नहीं दिया गया था। उन्होंने कहा कि अन्य राज्यों में भी इसी तरह के निर्देश जारी किए जाते हैं।पश्चिम बंगाल से और ख़बरें
कोर्ट ने क्या कहा
कोर्ट ने कहा कि यह एक बड़ा संवैधानिक सवाल है, 'क्या अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग चुनाव अपराधों के लिए बने कानून के बावजूद आम निर्देश जारी कर सकता है?' कोर्ट ने कहा कि अगर कानून में कोई काम किसी खास तरीके से करने को कहा गया है, तो उसे उसी तरीके से करना होगा। अन्य तरीके नहीं अपनाए जा सकते।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सत्येंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई मामले का हवाला दिया और कहा कि गिरफ्तारी कोई रूटीन काम नहीं है। यह कानूनी विवेक पर निर्भर करती है। कोर्ट ने साफ़ किया कि अनुच्छेद 21 और 22 के तहत किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता केवल क़ानून द्वारा तय प्रक्रिया से ही रोकी जा सकती है।
कोर्ट का आश्वासन
हाईकोर्ट ने साफ़ कहा कि यह अंतरिम आदेश किसी भी व्यक्ति के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई नहीं रोकता है। अगर लिस्ट में नाम वाले व्यक्ति कोई अपराध करते हैं तो पुलिस या प्रशासन अपने विवेक से कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि कोई भी निवारक हिरासत केवल संबंधित कानून के अनुसार ही की जा सकती है। चुनाव आयोग को चार हफ्ते में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है। मामले की अगली सुनवाई पांच हफ्ते बाद होगी।हाई कोर्ट के आदेश का क्या है मतलब?
कलकत्ता हाईकोर्ट ने साफ़ संदेश दिया है कि चुनाव आयोग को भी कानून के दायरे में रहकर काम करना होगा। वह किसी को बिना सबूत के 'परेशान करने वाला' घोषित करके आम आदेश नहीं दे सकता। पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में चुनाव होने हैं। इस फैसले से चुनावी प्रक्रिया में कानूनी प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने की उम्मीद बढ़ गई है।