पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची का विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) विवादित हो गया है। एक ही श्रेणी में नोटिस प्राप्त करने वाले मतदाताओं की संख्या में एक तरफ तेरह लाख तो दूसरी तरफ 50.89 लाख नाम हैं। चुनाव आयोग ने 18 जनवरी को दोनों तरह के आंकड़े दिए। एक आंकड़ा केंद्रीय चुनाव आयोग का है तो दूसरी तरफ राज्य चुनाव आयोग का। यह कैसे हो सकता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दिल्ली में ऐसे मतदाताओं से मुलाकात की जो आंदोलन कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में बंगाल एसआईआर मामले की सुनवाई के दौरान बुधवार 4 फरवरी को ममता यही मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में उठाने जा रही हैं।


पश्चिम बंगाल में एसआईआर के पहले चरण के बाद 1.16 करोड़ से अधिक मतदाताओं के दस्तावेजों में "तार्किक विसंगतियों" (लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी) के कारण उनकी पहचान की गई थी। उन्हें मतदाता के रूप में अपनी पात्रता साबित करने के लिए सुनवाई में उपस्थित होने के लिए कहा गया था। बंगाल में सुनवाई जारी है, जिसमें एक विसंगति यह भी है कि छह या अधिक मतदाताओं ने एक ही व्यक्ति को अभिभावक के रूप में नामित किया है।
चुनाव आयोग (EC) के सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय के आंकड़ों में इस श्रेणी के तहत नोटिस प्राप्त करने वालों की संख्या में लगभग चार गुना का फर्क है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, EC के हलफनामे में "6 या इससे अधिक संतान" (6 progeny or more) वाली श्रेणी में लगभग 13 लाख (करीब 13.26 लाख) मतदाताओं को नोटिस जारी करने का उल्लेख है। वहीं, पश्चिम बंगाल CEO कार्यालय के आंकड़ों में इसी श्रेणी में 50.89 लाख मतदाताओं की पहचान की गई है।



राज्य में कुल 1.16 करोड़ से अधिक मतदाताओं को लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के आधार पर नोटिस भेजे गए और सुनवाई जारी है। SIR प्रक्रिया अक्टूबर 2025 से चल रही है, जिसमें 2002 के बाद पहली बार मतदाता सूची को पूरी तरह नए सिरे से तैयार किया जा रहा है। सॉफ्टवेयर के जरिए दस्तावेजों में विसंगतियां चिह्नित की जा रही हैं, जैसे एक ही व्यक्ति को छह या अधिक लोगों द्वारा माता-पिता बताना।

EC के हलफनामे में यह श्रेणी इस प्रकार है:
  • 2.06 लाख मतदाता ऐसे जिन्हें छह से अधिक संतानों से जोड़ा गया।
  • 8,682 को 10 से अधिक संतानों से लिंक किया गया।
  • कुछ मामलों में 20, 30, 40, 50, 100 और यहां तक कि 200 से अधिक संतानों का दावा पाया गया।
  • चुनाव आयोग ने कहा कि ऐसे मामले "वैज्ञानिक रूप से असंभव" हैं और माता-पिता-संतान संबंध की पुष्टि के लिए जांच जरूरी है। 
  • EC का तर्क है कि कई मामलों में असंबंधित व्यक्तियों को माता-पिता दिखाकर पुरानी सूची से लिंक किया गया था।

CEO कार्यालय के आंकड़े जिला-वार ब्रेकडाउन देते हैं और अन्य श्रेणियों जैसे पिता के नाम में mismatch, माता-पिता से उम्र का 50 साल से अधिक अंतर, या दादा-दादी से 40 साल से कम अंतर आदि को भी शामिल करते हैं। दिसंबर 2025 में यह संख्या 23.64 लाख थी, जो अब दोगुनी से अधिक हो गई है। CEO कार्यालय ने इस पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और कहा कि नोटिस EC द्वारा जारी किए गए हैं। EC ने भी संख्या में बदलाव या वर्तमान स्थिति पर कोई जवाब नहीं दिया।



यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रही याचिकाओं से जुड़ा है, जहां SIR की संवैधानिकता पर सवाल उठाए गए हैं। अंतिम मतदाता सूची 14 फरवरी 2026 को प्रकाशित होने वाली है। TMC और अन्य विपक्षी दल इसे राजनीतिक पूर्वाग्रह बता रहे हैं, जबकि EC इसे पारदर्शी और आवश्यक प्रक्रिया मान रहा है।

ममता बनर्जी की चुनौती

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज (4 फरवरी 2026) सुप्रीम कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होने वाली हैं। यह मामला राज्य में चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के खिलाफ है, जिसमें मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम काटे गए हैं। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष यह सुनवाई होनी है। ममता बनर्जी ने खुद अपनी व्यक्तिगत क्षमता में चुनाव आयोग के खिलाफ याचिका दायर की है। वे फिलहाल दिल्ली में हैं और सुप्रीम कोर्ट में प्रवेश के लिए उनका गेट पास जारी किया गया है। वे अपने वकीलों के साथ कोर्ट रूम में मौजूद रहेंगी।




पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि "लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी" के कारण मतदाता सूची से हटाए गए व्यक्तियों की सूची सार्वजनिक कार्यालयों में प्रकाशित और प्रदर्शित की जाए।

SIR प्रक्रिया के तहत पश्चिम बंगाल की ड्राफ्ट मतदाता सूची 16 दिसंबर 2025 को जारी की गई थी, जिसमें 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए। इसमें कई विसंगतियां सामने आई हैं, जैसे युवाओं की असामान्य रूप से अधिक मौतें दिखाना, लिंग आधारित भेदभाव और कुछ खास समुदायों के नामों को ज्यादा काटना।

ममता बनर्जी ने SIR को राजनीतिक पूर्वाग्रह से प्रेरित और जल्दबाजी में किया गया बताया है, जिससे लोकतांत्रिक भागीदारी पर असर पड़ रहा है। उन्होंने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस मुद्दे पर अपनी बात रखी और प्रभावित परिवारों पर दबाव का आरोप लगाया।

यह सुनवाई राज्य में आगामी चुनावों से पहले महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहां मतदाता सूची का मुद्दा गरमा गया है।