पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद आंतरिक कलह से जूझ रही तृणमूल कांग्रेस (TMC) को अब कानूनी मोर्चे पर भी करारा झटका लगा है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष रथेंद्र बोस (Rathindra Bose) के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है, जिसके तहत उन्होंने टीएमसी से निष्कासित और बागी विधायक रितब्रत बनर्जी को सदन में नेता प्रतिपक्ष (LoP) के रूप में मान्यता दी थी।
जज कृष्णा राव (Justice Krishna Rao) की पीठ ने ममता बनर्जी के करीबी और वरिष्ठ टीएमसी नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय (Sobhandeb Chattopadhyay) की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के पक्ष में अंतरिम आदेश देने का कोई मजबूत प्रथम दृष्ट्या (prima facie) आधार नहीं दिखता है। अदालत ने विपक्षी दलों/प्रतिवादियों को तीन सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है और मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई तय की है।

क्या है पूरा विवाद?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे 4 मई को घोषित होने के बाद, 6 मई को टीएमसी विधायकों की एक आधिकारिक बैठक हुई थी। इस बैठक में वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष (LoP) के लिए नामित किया गया और इसकी जानकारी विधानसभा अध्यक्ष के कार्यालय को दी गई।
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हालांकि, विधानसभा अध्यक्ष ने पार्टी से बैठक का आधिकारिक प्रस्ताव (resolution) और मिनट्स मांगे। इसके बाद टीएमसी ने 19 मई को दोबारा बैठक बुलाई और प्रस्ताव व विधायकों की उपस्थिति पत्रक (attendance sheet) अध्यक्ष को सौंप दी।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि विधानसभा अध्यक्ष ने टीएमसी के इन आधिकारिक पत्रों और सूचनाओं को दरकिनार कर दिया। इसके बजाय, उन्होंने टीएमसी के ही एक बागी गुट के विधायकों के समर्थन के आधार पर निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी। अध्यक्ष के इसी फैसले को शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

कोर्ट ने इससे पहले क्या कहा था

इससे पहले 17 जून को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि ऐसा प्रतीत होता है कि विधानसभा अध्यक्ष, पार्टी के आधिकारिक चयन को नजरअंदाज कर बागी गुट के फैसले को स्वीकार करने के लिए काफी "उत्सुक" थे।
अदालत ने ऋतब्रत बनर्जी के वकीलों की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि पार्टी से निष्कासन एक आंतरिक मामला है और इसका इस फैसले पर कोई असर नहीं पड़ता। कोर्ट ने बुधवार को फैसला सुरक्षित रखने से पहले कहा था, "आप यह नहीं कह सकते कि इसका कोई परिणाम नहीं होगा, जब एक पार्टी यह कह रही है कि वह निष्कासित सदस्य है और इसकी सूचना अध्यक्ष को दी जा चुकी है, और फिर भी अध्यक्ष उसी व्यक्ति को नियुक्त कर रहे हैं।" हालांकि, विस्तृत सुनवाई की जरूरत को देखते हुए कोर्ट ने फिलहाल इस पर तुरंत अंतरिम रोक लगाने से मना कर दिया है।

मामले से जुड़े प्रमुख चेहरे

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंदोपाध्याय ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय का पक्ष रखा। राज्यपाल की ओर से: अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) बिल्वदल भट्टाचार्य पेश हुए। बागी विधायकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप कर ने ऋतब्रत बनर्जी और अखरुज्जमां का पक्ष लिया। विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के भीतर जारी खींचतान इस अदालती फैसले के बाद और तेज होने की आशंका है।