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उपराष्ट्रपति चुनाव में ममता की टीएमसी का वोटिंग से दूर रहने का फ़ैसला क्यों?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने विपक्षी एकता को तब एक और झटका दिया जब इसने कहा कि वह उपराष्ट्रपति चुनाव में मतदान से दूर रहेगी। उपराष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के उम्मीदवार बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ हैं। उपराष्ट्रपति का चुनाव 6 अगस्त को होगा। जगदीप धनखड़ के विपक्षी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की दिग्गज नेता मार्गरेट अल्वा हैं।

तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव और ममता बनर्जी के भतीजे अभिजीत बनर्जी ने कहा कि पार्टी ने सर्वसम्मति से धनखड़ या मार्गरेट अल्वा का समर्थन नहीं करने का फ़ैसला किया है। उन्होंने साफ़ तौर पर आरोप मढ़ा कि विपक्षी उम्मीदवार तय करने को लेकर परामर्श नहीं लिया गया था। तो सवाल है कि क्या विपक्षी एकता खटाई में पड़ती दिख रही है? तो फिर ममता विपक्ष को साथ आने की बात क्यों करती रही हैं?

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यह सवाल इसलिए कि आज ही टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने कहा है कि विपक्षी दलों की एकता पर जोर दिया है। ममता बनर्जी ने पार्टी की शहीद दिवस रैली को संबोधित करते हुए कहा कि 2024 का चुनाव बीजेपी के विभाजन को खारिज करने वाला होगा। ममता ने जोर देकर कहा कि 2024 में जब बीजेपी नाकाम होगी तो विपक्षी दलों को अगली सरकार बनाने के लिए साथ आना होगा। ममता बनर्जी आज से दो साल बाद जिस विपक्षी एकता का संकेत दे रही हैं और जिसमें वह भरोसा जता रही हैं क्या वह सच में साथ आएगा? क्या ममता बनर्जी ने अब तक विपक्षी एकता के लिए कुछ ऐसा किया है या फिर उन्होंने उस विपक्षी एकता में खलल ही डाली है?

ममता बनर्जी ने विपक्षी नेताओं से एकजुट होने की अपील तो कई बार की है और प्रयास भी किया है, लेकिन क्या विपक्षी नेता एकजुट होंगे?

ममता बनर्जी खुद यूपीए से इतर विपक्षी दलों का एक मोर्चा बनाने की कोशिश में जुटी हुई दिखी हैं। पिछले साल दिसंबर महीने में ममता ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के अस्तित्व को ही नकार दिया था। ममता ने कहा था कि 'ये यूपीए क्या है, कोई यूपीए नहीं है'। 

दिसंबर महीने में दिल्ली में सोनिया गांधी से मुलाक़ात को लेकर एक सवाल के जवाब में ममता ने कहा था, 'हमें हर बार सोनिया से क्यों मिलना चाहिए? क्या यह संवैधानिक बाध्यता है?' ममता बनर्जी के इस बयान में बेहद तल्खी थी।

इस बयान को उस संदर्भ में आसानी से समझा जा सकता है जिसमें ममता अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का पूरे देश में विस्तार करने में जुटी थीं और उसमें कई नेता कांग्रेस छोड़कर शामिल हो चुके थे। गोवा में चुनाव से पहले कांग्रेस के कई नेताओं को तोड़कर ममता की टीएमसी ने अपनी पार्टी में शामिल कर लिया था। 

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बहरहाल, यह सवाल भी अहम है कि आख़िर टीएमसी धनखड़ का विरोध नहीं कर रही है तो समर्थन क्यों नहीं कर रही है? जुलाई 2019 में राज्यपाल के रूप में पदभार संभालने के बाद से धनखड़ के रिश्ते बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के साथ खटास वाले रहे हैं। उनके बीच में विवाद लगातार सुर्खियाँ बनता रहा है। राज्यपाल धनखड़ ने एक समय राज्य सरकार पर 'अत्यधिक तुष्टिकरण करने, सांप्रदायिक संरक्षण देने और माफिया सिंडिकेट जबरन वसूली करने का आरोप लगाया था। ममता बनर्जी सरकार भी लगातार धनखड़ पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाती रही है।

मार्च महीने में पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में हिंसा में 8 लोगों के मारे जाने पर राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने कहा था कि राज्य में मानवाधिकारों का खात्मा हो गया है और कानून का शासन ढीला हो गया है। राज्यपाल ने कहा था कि राज्य हिंसक संस्कृति और अराजकता की चपेट में है। 

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मई महीने में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने न्यायपालिका को लेकर की गई टिप्पणी के मामले में तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को कहा था। लेकिन यही अभिषेक बनर्जी की पार्टी अब धनखड़ के खुले विरोध में नहीं आ रही है।

अभिषेक बनर्जी ने कहा, 'एनडीए के उम्मीदवार को समर्थन देने का सवाल ही नहीं उठता। जिस तरह से विपक्षी उम्मीदवार का फ़ैसला बिना उचित परामर्श और विचार-विमर्श के किया गया, हमने सर्वसम्मति से मतदान प्रक्रिया से दूर रहने का फ़ैसला किया है।'

टीएमसी ने ऐसा फ़ैसला क्यों लिया? क्या तृणमूल को विपक्षी एकता से ज़्यादा लाभ धनखड़ के उप राष्ट्रपति बनने पर बंगाल के बाहर होगा? 

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क़मर वहीद नक़वी
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