पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले धर्म ध्वजा फहराने की कवायद तेज हो गयी है। आरएसएस के सौ साल पूरा होने के अवसर पर राज्य भर में होने वाले पर हिंदू सम्मेलन को बीजेपी हिंदू मतदाताओं को एक जुट करने के विशेष अवसर और चुनाव अभियान की तरह इस्तेमाल कर रही है। दूसरी तरफ़ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हिंदुत्व के मोर्चा को बीजेपी के लिए खुला नहीं छोड़ा है। पिछले दिसंबर में कोलकाता के न्यू टाउन में विशाल ‘दुर्गा आंगन’ का शिलान्यास करके उन्होंने हिंदू मतदाताओं को बीजेपी के खेमे में खिसकने से रोकने की जो बड़ी पहल शुरू की थी उसे बंगाली अस्मिता से जोड़ने के अभियान पर लगातार आगे बढ़ा रही हैं।
तृणमूल कांग्रेस के पूर्व नेता हुमायूँ कबीर ने मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ का शिलान्यास करके ममता के सामने एक नयी चुनौती ज़रूर खड़ी कर दी है और बीजेपी इसे भी भुनाने की कोशिश में जुट गयी है। बंगाल की राजनीति में इस समय कई सवाल गूंज रहे हैं। क्या हिंदू सम्मेलन और हुमायूं कबीर के बहाने बीजेपी राज्य के 70 प्रतिशत हिंदू मतदाताओं को ममता के ख़िलाफ़ खड़ा कर पाएगी? क्या हुमायूं कबीर और अन्य मुस्लिम पार्टियाँ मुस्लिम मतदाताओं को बाँटने में सफल हो पाएंगी? या फिर अल्पसंख्यकों की रक्षा और दुर्गा आंगन का मशाल लेकर ममता एक बार फिर से जीत का झंडा फहराने में सफल होंगी?
ममता को चुनौती
ममता इस समय कई मोर्चों पर जूझ रही हैं। एसआईआर यानी विशेष मतदाता सूची सर्वेक्षण में मुसलमानों और अत्यंत ग़रीब लोगों का नाम कटने के मुद्दे पर उनके कार्यकर्ता बूथ स्तर पर लड़ रहे हैं और वो ख़ुद सुप्रीम कोर्ट तक हाजिरी लगा चुकी हैं। बिहार, जहां एसआईआर की शुरुआत हुई या फिर अन्य राज्य जहां यह प्रक्रिया अभी चल रही है वहां बंगाल जैसी जुझारू लड़ाई दिखाई नहीं दे रही है।
बीजेपी का अभियान चार मुद्दों पर केंद्रित है। ‘बंगाल में हिंदू ख़तरे में है’, बीजेपी का मुख्य अभियान इसी नारे पर केंद्रित है। बंगाली हिंदुओं को बताया जा रहा है कि मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है। बांग्लादेश की सीमा से लगे कुछ जिलों, जहां मुस्लिम आबादी 50 फ़ीसदी या ज़्यादा है, का उदाहरण देकर बताया जा रहा है कि बंगाली हिंदू जल्दी ही राज्य में अल्पसंख्यक हो जायेंगे। बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ का शोर मचाकर हिंदुओं की चिंता बढ़ाने की कोशिश हो रही है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज में एक डॉक्टर से बलात्कार का उदाहरण देकर बताया जा रहा है कि बंगाल में महिलाएं असुरक्षित हैं। चौथा मुद्दा भ्रष्टाचार का है। शिक्षक भर्ती घोटाला जैसे मामले भ्रष्टाचार के उदाहरण के रूप में पेश किए जा रहे हैं। ममता सीबीआई और ईडी जैसी केंद्र सरकार की एजेंसियों से सीधे टक्कर ले रही हैं।
क्या मुस्लिम वोट बँटेगा?
चुनाव में हिंदू-मुस्लिम मुद्दा बन जाये तो बीजेपी फ़ायदे में रह सकती है। लेकिन ममता आसानी से ऐसा होने देने के मूड में नहीं हैं। लेकिन उनके सामने मुस्लिम वोटों का बँटवारा एक बड़ी चुनौती है। मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने की पहल से मुस्लिम मतदाताओं के बीच हुमायूं कबीर की लोकप्रियता बढ़ी है। वैसे, हुमायूं मुसलमानों के कोई प्रतिष्ठित नेता नहीं रहे हैं। पिछला विधानसभा चुनाव उन्होंने तृणमूल के टिकट पर जीता था। 2019 में वो बीजेपी के टिकट पर लोक सभा चुनाव लड़ कर तीसरे नंबर पर रहे थे। टीएमसी से निकाले जाने के बाद उन्होंने अलग जनता उन्नयन पार्टी (जेयूपी) बना ली है और 182 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रहे हैं। एक अन्य मुस्लिम नेता नौशाद सिद्दीकी अपनी पार्टी इंडियन सेक्युलर फ़्रंट (आईएसएफ) को वाम दलों से समझौता करके चुनाव मैदान में उतारने की कोशिश में हैं।
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम इस बार सौ से ज़्यादा सीटों पर दांव खेलने की तैयारी में हैं। इसके अलावे भी पाँच-छह मुस्लिम नेता छोटी छोटी पार्टियां बनाकर चुनाव मैदान में उतरने के लिए तैयार हैं। राज्य में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 30 प्रतिशत है। पिछले चुनावों में ममता को मुस्लिम मतदाताओं का एकतरफा समर्थन मिला था। इसके बूते पर ही वो विधानसभा की कुल 294 में से 223 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। बीजेपी की 65 सीटों पर जीत भी एक बड़ी बात थी क्योंकि बंगाल में बीजेपी कभी भी मज़बूत पार्टी नहीं थी। 2021 में सीपीएम और कांग्रेस का खाता भी नहीं खुल पाया था। पश्चिम बंगाल से और ख़बरें
बीजेपी को 2014 के लोकसभा चुनाव में 2, 2019 में 18 और 2024 में 12 सीटें मिली थीं। 2021 के विधानसभा चुनाव में टी एम सी को करीब 48% और बीजेपी को 38% वोट मिला था। जाहिर है कि मुस्लिम वोटों का बंटवारा होने पर टीएमसी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसलिए ममता अपना हिंदू कार्ड बहुत सावधानी से खेल रही हैं।
विकास पीछे छूटा
कोलकाता की सांस्कृतिक पहचान, चौरंगी से वीआईपी रोड होकर एयर पोर्ट की तरफ़ जाने वाले रास्ते में कई जगहों पर मेट्रो रेल का अधूरा काम दिखाई देता है। यह प्रोजेक्ट कई वर्षों से घिसट घिसट कर चल रहा है। काम थोड़ा आगे बढ़ता है फिर महीनों तक रुक जाता है। बंगाल में अधूरे विकास की कहानी लग भाग हर जिले में दिखाई देती है। टाटा के नैनो कार प्रोजेक्ट को राज्य से बाहर खदेड़ कर 2011 में सत्ता में आयी ममता बनर्जी 15 सालों में राज्य के विकास को पटरी पर नहीं ला पाई हैं। रोजगार के लिए पलायन करने वाले राज्यों में बंगाल शीर्ष पर है। कई राज्यों में उन्हें बांग्लादेशी बताकर लगातार अपमानित और उत्पीड़ित किया जाता है।
राज्य में रोजगार बढ़ नहीं रहा है, क्योंकि विकास के लिए राज्य के पास पैसा नहीं है। ममता इसके लिए भी केंद्र को दोषी ठहराती हैं। उनका आरोप है कि केंद्र उन्हें विकास के लिए पर्याप्त पैसा नहीं दे रहा है। पिछले साल 15 सालों में बंगाल की राजनीति में बहुत कुछ बदल गया है। करीब तीस वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद सीपीएम और वामपंथी दल इस तरह हाशिए पर पहुँचे कि 2021 के चुनावों में उनका खाता भी नहीं खुला।
वाम दलों से पहले क़रीब 25 सालों तक सत्ता संभालने वाली कांग्रेस भी सिर्फ़ नाम के लिए बची है। बीजेपी का उदय ममता के सत्ता में आने के बाद ही हुआ और सीपीएम और कांग्रेस को पीछे धकेल कर राज्य में दूसरी बड़ी पार्टी बन गयी। बीजेपी इस बार बंगाल में राम का नाम नहीं ले रही है। 2021 के चुनाव में ममता ने राम के मुक़ाबले में दुर्गा शक्ति को खड़ा कर दिया था। इस बार बीजेपी का मुद्दा है बांग्लादेशी घुसपैठिया और हिंदू के अल्पसंख्यक हो जाने का ख़तरा। ममता, दुर्गा का मशाल थाम कर भी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, बंगाली अस्मिता और स्वाभिमान के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश में हैं।