सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर प्रक्रिया में वोटरों की 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' वाली लिस्ट की जाँच रोकने से इनकार कर दिया। लेकिन कोर्ट ने चुनाव आयोग को सख्त निर्देश दिए कि यह जांच पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए और आम लोगों को परेशानी नहीं होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' वाले क़रीब सवा करोड़ लोगों के नाम और अन्य जानकारी ग्राम पंचायत भवन, ब्लॉक ऑफिस और शहरों में वार्ड ऑफिस में लगाने को कहा है। रिपोर्ट है कि कुल डेढ़ करोड़ से ज़्यादा लोगों के नाम कटने का ख़तरा है।

यह फ़ैसला टीएमसी सांसद डोला सेन और अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया। चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि कुछ सुधार जरूरी हैं, लेकिन सब कुछ साफ-सुथरा और आसान तरीके से होना चाहिए।
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कोर्ट ने क्या कहा?

चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने कहा, 'कुछ सुधार की जरूरत है। लेकिन यह पारदर्शी होना चाहिए, लोगों को भरपूर मौका मिले और वोटरों को कोई असुविधा न हो।' कोर्ट ने चुनाव आयोग को ये मुख्य निर्देश दिए-
  • 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' वाले क़रीब 1.25 करोड़ लोगों के नाम ग्राम पंचायत भवन, ब्लॉक ऑफिस और शहरों में वार्ड ऑफिस में लगाए जाएं।
  • प्रभावित लोग अपने दस्तावेज या आपत्ति बूथ लेवल एजेंट यानी बीएलए जैसे अपने अधिकृत प्रतिनिधि के जरिए जमा करें। प्रतिनिधि के लिए हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान वाला एक पत्र लगाना होगा।
  • ये दस्तावेज पंचायत भवन या ब्लॉक ऑफिस में जमा होंगे।
  • नाम प्रकाशित होने के 10 दिनों के अंदर अतिरिक्त दस्तावेज या आपत्ति जमा करने का मौका दिया जाए।
  • पश्चिम बंगाल सरकार ईसीआई और राज्य चुनाव आयोग को पर्याप्त कर्मचारी और सुरक्षा मुहैया कराए।
  • जिला कलेक्टर और एसपी इन निर्देशों का सख्ती से पालन करें। डीजीपी सुनिश्चित करें कि कानून-व्यवस्था की कोई समस्या न आए।

कक्षा 10 के एडमिट कार्ड पर बड़ा फैसला

कोर्ट ने कहा कि पश्चिम बंगाल में कक्षा 10 का एडमिट कार्ड भी उम्र के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाए। जस्टिस बागची ने कहा, 'एडमिट कार्ड में जन्मतिथि होती है और बोर्ड द्वारा जारी होने पर इसे मान्यता मिलती है।' जस्टिस दत्ता ने जोड़ा कि पास सर्टिफिकेट में जन्मतिथि नहीं होती, इसलिए एडमिट कार्ड जरूरी है।

एसआईआर पर विवाद क्यों?

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग वोटर लिस्ट का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन कर रहा है। इसमें वोटरों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है- मैप्ड, अनमैप्ड और लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी। 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' में नाम की स्पेलिंग में अंतर, माता-पिता की उम्र में गड़बड़ी या अन्य तार्किक गड़बड़ियाँ पाई गई हैं।
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तीनों श्रेणियों में डेढ़ करोड़ से ज़्यादा लोगों के नाम हैं, जिनमें से 1.25 करोड़ 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' वाले हैं। टीएमसी ने आरोप लगाया है कि यह प्रक्रिया मनमानी है और लाखों असली वोटरों के नाम कट सकते हैं। टीएमसी सांसद डोला सेन ने याचिका दायर की है।

कोर्ट ने जाँच रोकने से मना किया, लेकिन पारदर्शिता पर जोर दिया। चुनाव आयोग को जल्द इन निर्देशों का पालन करना होगा। यह फ़ैसला राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले अहम है।