शुभेंदु अधिकारी के सीएमओ में बड़ा फेरबदल किया गया है। सुब्रत गुप्ता के अलावा शांतनु बाला निजी सचिव बनाए गए हैं। सुब्रत गुप्ता के नाम पर इसलिए विवाद हो रहा है क्योंकि उन्हें SIR में चुनाव आयोग द्वारा विशेष रोल पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था।
शुभेंदु अधिकारी और सुब्रत गुप्ता
बंगाल SIR में चुनाव आयोग के स्पेशन रोल ऑब्जर्वर यानी एसआरओ सुब्रत गुप्ता को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का सलाहकार बनाया गया है। शनिवार को शपथ लेने के कुछ घंटों बाद ही पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस नियुक्ति की घोषणा कर दी। इस नियुक्ति पर अब बड़े सवाल उठ रहे हैं। चुनाव आयोग ने बंगाल में विशेष मतदाता सूची संशोधन यानी SIR के लिए डॉ. सुब्रत गुप्ता को विशेष रोल ऑब्जर्वर यानी एसआरओ नियुक्त था। उनको मुख्यमंत्री का सलाहकार बनाने का फ़ैसला राज्य सचिवालय नबन्ना में लिया गया। मीडिया रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि विधानसभा चुनाव कराने वाले मुख्य निर्वाचन अधिकारी यानी सीईओ मनोज अग्रवाल को भी राज्य का नया मुख्य सचिव बनाए जाने की संभावना है। हालाँकि, इसकी पुष्टि अभी नहीं हुई है।
क्यों उठ रहे हैं सवाल?
सुब्रत गुप्ता चुनाव आयोग के अधिकारी थे और चुनाव से पहले मतदाता सूची की जांच का काम देख रहे थे। अब उन्हें सीधे नए मुख्यमंत्री का सलाहकार बना दिया गया है। कई लोग पूछ रहे हैं कि क्या चुनाव ड्यूटी पर तैनात अधिकारी को इतनी जल्दी सरकार में बड़ी जिम्मेदारी देना सही है? हालाँकि, सरकार का कहना है कि उनका लंबा अनुभव अब नई सरकार को अच्छे प्रशासन में मदद करेगा।सुब्रत गुप्ता कौन हैं?
सुब्रत गुप्ता 1990 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। वह आईआईटी खड़गपुर के पूर्व छात्र हैं। ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम से मैनेजमेंट की पढ़ाई की। केंद्र सरकार में फूड प्रोसेसिंग मंत्रालय में सचिव रह चुके हैं। पहले ममता बनर्जी सरकार में उन्हें कम महत्व का विभाग दिया गया था। चुनाव आयोग ने उन्हें SIR का विशेष ऑब्जर्वर बनाया था।
मनोज अग्रवाल बन सकते हैं मुख्य सचिव
मनोज अग्रवाल भी 1990 बैच के IAS अधिकारी हैं और IIT कानपुर के छात्र रहे हैं। वे बंगाल के अनुभवी अधिकारी माने जाते हैं। इस बार विधानसभा चुनाव शांतिपूर्ण कराने का श्रेय इन दोनों अधिकारियों और केंद्रीय बलों को दिया जा रहा है।
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार मनोज अग्रवाल को मुख्य सचिव बनाया जा सकता है।
CMO में और बदलाव
नई बीजेपी सरकार ने मुख्यमंत्री कार्यालय यानी सीएमओ को नया रूप देने शुरू कर दिया है और इसकी तहत कई बदलाव किए हैं।गुप्ता के अलावा 2017 बैच के आईएएस शांतनु बाला को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का प्राइवेट सेक्रेटरी बनाया गया है। दोनों अधिकारियों को तुरंत चार्ज संभालने को कहा गया है।
SIR क्या था और क्यों बना सबसे बड़ा मुद्दा?
चुनाव आयोग ने चुनाव से पहले वोटर लिस्ट का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR किया। इसमें करीब 91 लाख नाम काट दिए गए, जो कुल वोटरों का लगभग 12% है। SIR शुरू होने से पहले राज्य में कुल 7.66 करोड़ वोटर थे। दिसंबर में ड्राफ्ट लिस्ट में क़रीब 60 लाख नाम हटाए गए। बाद में लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के 60 लाख से ज्यादा मामलों को अदालती जांच के लिए भेजा गया। इनमें 27 लाख से ज्यादा को 'एक्सक्लूडेबल' माना गया। इस तरह कुल मिलाकर 91 लाख मतदाता हटा दिए गए।
विपक्ष कह रहा है कि SIR एक तरफा था और उनके वोटरों को निशाना बनाया गया। बीजेपी इसे चुनावी लिस्ट साफ करने का जरूरी कदम बता रही है। चाहे कोई इसे वोटरों की छंटनी कहे या चुनावी सफाई, SIR 2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव का सबसे बड़ा और सबसे विवादित मुद्दा रहा।
पश्चिम बंगाल से और ख़बरें
SIR से किसे नुकसान हुआ?
चुनावी आंकड़े बताते हैं कि जिन 169 विधानसभा सीटों पर 25000 से ज्यादा नाम कटे, वहां 2021 में टीएमसी ने 128 सीटें जीती थीं और बीजेपी सिर्फ 41 सीटें जीत पाई। लेकिन 2026 में हालात उलट गए। टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार अब बीजेपी की सीटें 104 हो गईं जबकि टीएमसी घटकर 63 रह गई। कांग्रेस को 2 सीटें मिलीं। जिन 124 सीटों पर नाम 25000 से कम कटे वहां भी बीजेपी ने 2021 में 36 जीती थीं, लेकिन अब 100 से ज़्यादा सीटें जीत लीं। यानी तीन गुना बढ़ोतरी गुई।
जिन 38 सीटों पर 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी'के आधार पर सबसे ज्यादा नाम कटे, 2021 में TMC ने 34 सीटें जीती थीं। इस बार सिर्फ 22 रह गईं। दिलचस्प बात यह कि सबसे ज्यादा नाम कटने वाली 6 सीटों पर टीएमसी ने 4 सीटें बचाईं, लेकिन बीजेपी ने जोरासांको और हावड़ा नॉर्थ पर कब्जा कर लिया।
187 सीटों पर 5000 से ज्यादा नाम कटे, जिनमें बीजेपी ने 119 जीतीं। कई जगहों पर कटे नामों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी।
मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में क्या हुआ?
सबसे ज्यादा काटे जाने लायक मामले मुर्शिदाबाद जिले में थे। यहां 4.55 लाख से ज्यादा नाम काटे गए। 2021 में तृणमूल ने इस जिले की 22 सीटों में से 20 जीती थीं, लेकिन इस बार सिर्फ 9 सीटें रह गईं। मुसलमान वोटों में बंटवारा हुआ और हिंदू वोट बीजेपी की तरफ मजबूती से गए। उत्तर 24 परगना जिले में 3.25 लाख से ज्यादा नाम कटे। यहां 33 सीटों में से 2021 में तृणमूल ने 28 जीती थीं, इस बार सिर्फ 8 सीटें बचीं। मालदा जिले में 2.39 लाख नाम कटे। 12 सीटों में से तृणमूल की संख्या 8 से घटकर 6 रह गई। बाकी सीटें बीजेपी ने जीतीं।
बीजेपी ने मनिकतला, श्यामपुकुर, कोसिपोर-बेलगाछिया, राशबिहारी, बेहाला ईस्ट, बिधाननगर, बारानगर, दमदम, राजारहाट-गोपालपुर जैसी कई सीटें जीतीं। ये सभी सीटें पहले टीएमसी के पास थीं और इनमें 25000 से ज्यादा नाम कटे थे।