तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागियों ने लोकसभा स्पीकर को 19 नामों की एक प्रति औपचारिक रूप से सौंप दी है। वो 19 नाम मीडिया में भी शुक्रवार सुबह से ही जोरशोर से चल रहे हैं। इसी के साथ इनमें से कुछ के बयान भी सामने आए हैं। यानी टीएमसी के 19 लोकसभा सांसदों ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ स्पष्ट रूप से मोर्चा खोल दिया है। इसमें पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान से लेकर लोकगायिका सयोनी घोष तक के नाम हैं।

पार्टी के चुनाव चिह्न पर बागी सांसदों ने दावा किया

  • संसदीय दल में विभाजन की मांग: 19 बागी लोकसभा सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को लिखे पत्र में एक अलग संसदीय गुट (separate parliamentary faction) के रूप में मान्यता देने की मांग की है।
  • पार्टी के चुनाव चिह्न पर दावा: इन बागी सांसदों ने दावा किया है कि वे ही "असली" तृणमूल कांग्रेस हैं और उन्होंने पार्टी के आधिकारिक चुनाव चिह्न पर भी अपना दावा ठोंक दिया है।
  • ममता बनर्जी का संकट: लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसद हैं, जिनमें से 19 सांसदों के बागी खेमे में जाने के बाद अब ममता बनर्जी के प्रति वफादार केवल 9 सांसद ही बचे हैं।

बागी गुट में शामिल 19 सांसदों के नाम कौन कौन हैं

लोकसभा अध्यक्ष को सौंपे गए पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले 19 सांसदों की सूची इस प्रकार है:
काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय, बापी हलदार, डॉ. शर्मिला सरकार, प्रसून बंद्योपाध्याय, जगदीश बर्मा बसुनिया, असित कुमार माल,
अरूप चक्रवर्ती, रचना बनर्जी, सायोनी घोष, खलीलुर रहमान, अबू ताहिर खान, यूसुफ पठान, मिताली बाग, माला रॉय, कालीपद सोरेन, दीपक अधिकारी ( देव), जून मालिया और पार्थ भौमिक।
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बाग़ी गुटों की रणनीति क्या है

  • स्वतंत्र रूप से काम करने का फैसला: सूत्रों के अनुसार, बागी सांसदों ने साफ किया है कि उनका इरादा भारतीय जनता पार्टी (BJP) या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में शामिल होने का नहीं है। वे संसद में स्वतंत्र रूप से काम करेंगे और पश्चिम बंगाल के हितों की लड़ाई लड़ेंगे।
  • केंद्र के बड़े विधेयकों पर नजर: यह गुट संसद में केंद्र सरकार द्वारा लाए जाने वाले महिला आरक्षण विधेयक (Women's Reservation Bill) और परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) पर भी करीब से नजर रख रहा है।

टीएमसी बग़ावत के तकनीकी पहलू और तारीखों का महत्व क्यों है

इस बगावत में तारीखों का खेल बेहद महत्वपूर्ण मोड़ ले सकता है:
पत्र की तारीख: सांसदों द्वारा स्पीकर को भेजे गए इस पत्र पर 18 मई की तारीख दर्ज है।
चीफ व्हिप की नियुक्ति: यह तारीख इसलिए अहम है क्योंकि इसके अगले दिन यानी 19 मई को वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी को लोकसभा में पार्टी का मुख्य सचेतक (Chief Whip) नियुक्त किया गया था। अब लोकसभा अध्यक्ष को तकनीकी और प्रक्रियात्मक आधार पर यह तय करना होगा कि क्या इस विद्रोही समूह को अलग गुट के रूप में मान्यता दी जा सकती है।
चुनाव आयोग और कोर्ट का रुख: बागी गुट पार्टी सिंबल के लिए चुनाव आयोग (EC) का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। इस विवाद के अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने की पूरी संभावना है।

महुआ मोइत्रा ने भी बताया तकनीकी पहलू

TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने पार्टी के बागी सांसदों पर तीखा हमला करते हुए कहा कि दलबदल विरोधी कानून के तहत उनकी संख्या का कोई कानूनी महत्व नहीं है। X पर एक पोस्ट में मोइत्रा ने कहा, "TMC के बागी सांसदों को कानून की जानकारी नहीं है। संविधान के 91वें संशोधन (2003) में पार्टी के बंटवारे या अलग गुट बनाने का प्रावधान खत्म कर दिया गया था। सांसदों की संख्या मायने नहीं रखती - मूल राजनीतिक पार्टी के 2/3 हिस्से को किसी दूसरी पार्टी में विलय करना होता है। सभी 19 बागियों को इस्तीफा देकर BJP के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहिए।"

ममता बनर्जी के साथ कौन कौन सांसद

इस बड़े संकट के बीच कुछ वरिष्ठ नेताओं ने ममता बनर्जी के प्रति अपनी वफादारी दोहराई है। वरिष्ठ सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने सार्वजनिक रूप से इस पत्र पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया और कहा कि वे ममता बनर्जी के साथ हैं।
ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के खेमे में बचे मुख्य सांसदों की सूची इस प्रकार है: अभिषेक बनर्जी, सौगत राय, महुआ मोइत्रा, कल्याण बनर्जी, कीर्ति आजाद, प्रतिमा मंडल, साजदा अहमद, सुदीप बंदोपाध्याय और शत्रुघ्न सिन्हा।

अभिषेक बनर्जी के पक्ष में उतरे सौगत रॉय

अभिषेक बनर्जी की कल्याण बनर्जी द्वारा की गई तीखी आलोचना के बीच, टीएमसी के सीनियर सांसद सौगत रॉय पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के बचाव में उतरे। उन्होंने कहा कि पार्टी की मुश्किलों के लिए सिर्फ़ उन्हें ज़िम्मेदार ठहराना गलत है। यह मानते हुए कि TMC "खराब स्थिति" में है, रॉय ने कहा कि जो लोग अब अभिषेक पर निशाना साध रहे हैं, वे कुछ समय पहले तक उनकी तारीफ़ करते थे। रॉय ने कहा, "हालांकि, हर चीज़ के लिए अभिषेक को दोष देना गलत है। आख़िरकार, जो लोग ये बातें कह रहे हैं, वे ही 4 मई से पहले अभिषेक की तारीफ़ करते थे। उन्होंने पहले कभी ऐसी शिकायतें नहीं कीं। मैं वफ़ादारी बदलने के इस रवैये को मौके का फ़ायदा उठाने की कोशिश मानता हूं।"

टीएमसी में आंतरिक लोकतंत्र किसने खत्म किया

बागी सांसद जगदीश बर्मा बसुनिया ने आरोप लगाया कि पार्टी नेताओं को खुलकर बोलने की इजाज़त नहीं है और चिंता ज़ाहिर करने पर उन्हें नतीजे भुगतने पड़ते हैं। यह दावा करते हुए कि 2019 से पार्टी के अंदर उठाई गई आपत्तियों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है, बसुनिया ने कहा, "अगर कोई ज़्यादा बोलता है, तो उसे किनारे कर दिया जाता है; उन्हें उनके पद से हटा दिया जाता है। बोलने की आज़ादी नहीं है... एक सांसद के तौर पर, मेरे पास कोई आज़ादी नहीं है; मुझे मौका नहीं मिलता।" 

असंतुष्ट सांसद टीएमसी को फिर से खड़ा करना चाहते हैं

बागी सांसद अरूप चक्रवर्ती ने दावा किया है कि लगभग 20 सांसद बागी गुट का समर्थन कर रहे हैं और पार्टी के भविष्य की दिशा को नए सिरे से तय करना चाहते हैं। चक्रवर्ती, जो संसद में बैठने की अलग व्यवस्था की मांग करने वाले सांसदों में शामिल हैं, ने कहा, "हमें 20 सांसदों का समर्थन हासिल है।" उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यह गुट "TMC को नए रूप में फिर से खड़ा करना" चाहता है और राज्य व केंद्र के बीच सहयोग की वकालत की, जिसे उन्होंने "जॉइंट-इंजन सरकार" का नाम दिया।
टीएमसी के सांसदों में काफी समय से असंतोष पनप रहा था। कई नेता पार्टी के कामकाज के तरीके और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव से नाखुश थे। संसद में इस बगावत से ठीक पहले पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी विधायकों के एक बड़े वर्ग ने पार्टी से नाता तोड़ लिया था, जिसके बाद अब यह संकट दिल्ली तक पहुंच गया है।