शुभेंदु अधिकारी को पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बने हुए 12 दिन हो चुके हैं। इन 12 दिनों में उन्होंने 12 फैसले लिए हैं। अधिकांश फैसले मुसलमानों के मद्देनज़र लिए गए हैं। ताजा फैसला मदरसों में वंदे मातरम गाना अनिवार्य करना है। सबसे पहले इसे स्कूलों में अनिवार्य किया गया और अब मदरसों में भी अनिवार्य कर दिया गया है। 
पश्चिम बंगाल सरकार ने गुरुवार 21 मई को वंदे मातरम के अपने आदेश का विस्तार करते हुए राज्य भर के मदरसों में इसे अनिवार्य कर दिया है। मदरसा निदेशालय द्वारा जारी एक आदेश के अनुसार, अब सभी मान्यता प्राप्त, सरकारी सहायता प्राप्त और गैर-सरकारी मदरसों में क्लास शुरू होने से पहले राष्ट्रगान गाना अनिवार्य है। यह आदेश राज्य सरकार के अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग के अधीन संचालित संस्थानों पर लागू किया गया है।
हाल के महीनों में, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में शपथ ग्रहण समारोहों के दौरान वंदे मातरम राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है।तमिलनाडु में, चेन्नई में एक आधिकारिक समारोह के दौरान राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम का पूरा संस्करण बजाए जाने पर डीएमके ने मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की आलोचना की। केरल में, शपथ ग्रहण समारोह के दौरान वंदे मातरम का पूरा संस्करण बजाए जाने पर वामपंथी दलों ने सरकार की आलोचना की। सत्ताधारी गठबंधन ने बाद में स्पष्ट किया कि कार्यक्रम का क्रम राजभवन द्वारा तय किया गया था।
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मुस्लिमों के मद्देनज़र शुभेंदु अधिकारी के अन्य फैसले

शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने मुस्लिमों से जुड़े कई फैसले लिए हैं। जिन पर काफी चर्चा हो रही है। कुछ फैसले इस तरह हैंः
  • सड़कों पर नमाज़ प्रतिबंधित: सड़कें या सार्वजनिक स्थानों को नमाज़ के लिए बंद करने पर सख्त निर्देश। नमाज़ अब केवल मस्जिदों में ही पढ़ी जाएगी।
  • कई वेलफेयर स्कीम का अंत: इमाम-मुअज्जिनों को दिए जाने वाले मानदेय और अन्य धर्म-विशेष सहायता समाप्त। मदरसा विभाग और अल्पसंख्यक सांस्कृतिक मामलों से जुड़ी कई योजनाओं की समीक्षा या वापसी। राज्य की "धर्म-निरपेक्ष" भावना का अंत।
  • ओबीसी आरक्षण में बदलाव: ओबीसी कोटे में कटौती और कई मुस्लिम समुदायों (70 से अधिक) को सूची से हटाने या समीक्षा की प्रक्रिया। कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेशों का पालन बताकर इसे जायज ठहराया गया।
  • बांग्लादेशियों के खिलाफ अभियानः शुभेंदु ने राज्य में कथित घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई की नई नीति "पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो" घोषित की है। भारत-बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बाड़बंदी कार्य और सीमा चौकियों के निर्माण के लिए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) को दो सप्ताह के भीतर 27 किलोमीटर जमीन सौंपने की भी घोषणा की। कथित घुसपैठियों पर नई नीति के अंतर्गत पुलिस द्वारा पकड़े गए घुसपैठियों को सीधे बीएसएफ को निर्वासित करने के लिए सौंप दिया जाएगा। बीएसएफ उन्हें बांग्लादेश में भेज देगी।
  • बुलडोज़र राजः राज्य में मुस्लिम बस्तियों में अवैध कब्जा हटाने के नाम पर बुलडोज़र कार्रवाई की जा रही है। कई मुस्लिम बहुल बस्तियों को उजाड़ दिया गया है।
  • अन्य संबंधित कदम: गौ-हत्या पर नोटिस (कानून लागू करना), सीएए लागू करना, 2021 के बाद के हिंसा मामलों को फिर से खोलना आदि। गौ हत्या मामले में बंगाल का पशुओं से जुड़ा कारोबार प्रभावित हो रहा है। पशु बाज़ार सूने पड़े हैं। मुस्लिम इन बाज़ारों में पशु खरीदने नहीं जा रहा है। पशु बाज़ार पर नियंत्रण गैर मुस्लिमों का है।

शुभेंदु अधिकारी के फैसले कितने तर्कसंगत

निशाना साधने की धारणा: फैसले कागज पर धर्म-निरपेक्ष दिखते हैं, लेकिन समुदाय विशेष को फोकस करके लागू करना उसे विवादित बना देता है। मदरसों में वंदे मातरम, इमामों का वेतन खत्म करने, मुस्लिम ओबीसी को सूची से बाहर करने, सड़कों पर नमाज पर रोक आदि फैसले मुस्लिमों से जड़े हुए हैं। शुभेंदु अधिकारी के बयान मुसलमानों में अलगाव की भावना बढ़ा रहे हैं। बंगाल में लगभग 27-30% मुस्लिम आबादी है।
लागू करने में जोखिम: मदरसों में वंदे मातरम अनिवार्य करने से प्रतिरोध, अनुपस्थिति या नाराजगी हो सकती है। ओबीसी सूची से हटाए गए समुदायों पर अचानक असर पड़ सकता है।
धर्मनिरपेक्षता पर सवाल: गरीब मुस्लिम तबके पर असर अधिक पड़ सकता है। आलोचक इसे "हिंदू-फर्स्ट" रणनीति मानते हैं।
ध्रुवीकरण: सांप्रदायिक तनाव बढ़ने का खतरा है, खासकर पश्चिम बंगाल के इतिहास को देखते हुए। विकास के बजाय सांप्रदायिक एजेंडे ज्यादा जोर पकड़ सकता है।

वंदे मातरम पर विवाद क्यों

गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को एक आदेश जारी किया। इस आदेश में कहा गया है कि सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और अन्य जगहों पर वंदे मातरम के सभी छह छंदों को गाना ज़रूरी होगा। जब राष्ट्रगान जन गण मन और राष्ट्रगीत वंदे मातरम दोनों साथ-साथ बजाए या गाए जाते हैं तो पहले वंदे मातरम गाया जाएगा। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड यानी AIMPLB और जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने केंद्र सरकार के इस आदेश की निंदा की है। एआईएमपीएलबी ने वंदे मातरम के पूरे छंद को अनिवार्य करने को असंवैधानिक क़रार दिया है और कहा है कि यह अस्वीकार्य है। एआईएमपीएलबी का कहना है कि यह फ़ैसला संविधान के ख़िलाफ़, धर्म की आज़ादी और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों के ख़िलाफ़ है। इसके साथ ही यह सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसलों से भी टकराता है और मुस्लिमों की धार्मिक मान्यताओं के सीधे विरोध में है। इसलिए मुस्लिम समुदाय के लिए यह फ़ैसला बिल्कुल अस्वीकार्य है।

रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह और संविधान सभा की चर्चाओं के बाद तय किया गया था कि वंदे मातरम के सिर्फ पहले दो छंद ही इस्तेमाल होंगे। एक धर्मनिरपेक्ष सरकार किसी एक धर्म की मान्यताओं या पूजा को दूसरे धर्म के लोगों पर जबरदस्ती नहीं थोप सकती। यह गीत बंगाल के संदर्भ में लिखा गया था और इसमें दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की पूजा का ज़िक्र है। यह फ़ैसला राजनीतिक कारणों से लिया गया है, लेकिन मुस्लिम इसे स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि यह उनकी आस्था से टकराता है। इस्लाम में सिर्फ़ एक अल्लाह की इबादत होती है। किसी और को भगवान मानना या पूजना इस्लाम में मना है।

एआईएमपीएलबी का कहना है कि भारतीय अदालतों ने भी माना है कि गीत के बाक़ी छंद धर्मनिरपेक्ष मूल्यों से मेल नहीं खाते, इसलिए उनकी अनिवार्यता सीमित की गई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी का कहना है कि यह फ़ैसला एकतरफा और जबरदस्ती वाला है। मुस्लिमों को कोई रोक-टोक नहीं है कि कोई वंदे मातरम गाए या बजाए, लेकिन गीत के कुछ छंद ऐसे हैं जो देश को देवी के रूप में दिखाते हैं। यह एकेश्वरवाद वाली धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है। मौलाना अरशद मदनी ने कहा, 'मुस्लिम सिर्फ एक अल्लाह की इबादत करते हैं। उन्हें यह गीत गाने के लिए मजबूर करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 का साफ उल्लंघन है, जो धर्म की आजादी की गारंटी देता है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में भी यह बात साफ है।'
मौलान मदनी ने कहा- सरकार का आदेश देशभक्ति नहीं दिखाता, बल्कि चुनावी राजनीति, सांप्रदायिक एजेंडा और लोगों का ध्यान असली मुद्दों से हटाने की कोशिश है। असली देशभक्ति नारे नहीं, बल्कि चरित्र और कुर्बानी से दिखती है। मुस्लिमों और जमीयत ने आज़ादी की लड़ाई में बड़ी भूमिका निभाई है। ऐसे फ़ैसले देश की शांति, एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करते हैं। मौलाना मदनी ने इसे संविधान, धर्म की आज़ादी और लोकतंत्र पर हमला बताया। उन्होंने कहा कि यह अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों पर सीधा अतिक्रमण है।
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ये शुरुआती फैसले भाजपा की क्लासिक "तुष्टीकरण-विरोधी" और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद वाली राजनीति को बता रहे हैं। ये भाजपा समर्थकों में लोकप्रिय हो सकते हैं लेकिन इसके खतरे भी हैं। अगर इन्हें प्रतिशोधपूर्ण तरीके से लागू किया गया तो मुस्लिम समुदाय में गहरी नाराजगी, कानूनी चुनौतियां और सामाजिक तनाव पैदा हो सकता है। सफलता इन फैसलों के संवेदनशील क्रियान्वयन, तमाम कल्याण योजनाओं और आर्थिक विकास पर निर्भर करेगी।
पश्चिम बंगाल की विविधता को देखते हुए किसी भी सरकार के लिए बहुसंख्यक भावनाओं और अल्पसंख्यक विश्वास-निर्माण के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है।। लेकिन बंगाल में अभी जो दिख रहा है, उसमें शुभेंदु अधिकारी सिर्फ मुस्लिमों को टारगेट कर रहे हैं।