पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 में मतुआ समुदाय की नाराजगी बड़ा फैक्टर बन सकती है। क्या इससे बीजेपी को नुकसान होगा? सीधे बंगाल से प्रभाकर मणि तिवारी का विश्लेषण।
मतुआ समुदाय को रिझाने में लगे हैं पीएम मोदी और सीएम ममता।
पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण में जिन सीटों पर मतदान होना है उनमें मतुआ बहुल इलाक़े भी शामिल हैं। लेकिन एसआईआर के दौरान लाखों की तादाद में नाम कटने से इस समुदाय में भारी नाराज़गी है। इससे सवाल उठ रहा है कि क्या यह नाराज़गी बीजेपी को भारी पड़ेगी? इसकी वजह यह है कि बीजेपी को चुनावों में इस समुदाय का अच्छा-खासा समर्थन मिलता रहा है।
SIR में बड़े पैमाने पर नाम कटे
मतुआ समुदाय का घर कहे जाने वाले उत्तर 24-परगना जिले के ठाकुरनगर में रहने वाले प्रणब मंडल बताते हैं कि उनका परिवार अस्सी के दशक में बांग्लादेश से यहां आया था। इलाके में ऐसे हजारों परिवार रहते हैं। नागरिकता से संबंधित तमाम दस्तावेज होने के बावजूद हमारे नाम मतदाता सूची से कट गए हैं।
इसी इलाके के राधाकांत हालदार का परिवार देश के विभाजन के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से आकर गायघाटा इलाके में बसा था। अब एसआईआर के दौरान उनकी पत्नी और बच्चों के नाम तो मतदाता सूची में शामिल हो गए हैं। लेकिन राधाकांत का नाम कट गया है। वजह- उनके पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं है।
उत्तर 24-परगना जिले में समुदाय के क़रीब सवा तीन लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से कट गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर गृह मंत्री अमित शाह तक इस समुदाय को भरोसा देते रहे हैं कि नागरिकता क़ानून के तहत नागरिकता मिलने के बाद उनके नाम सूची में बने रहेंगे।
कितने लोगों को नागरिकता मिली?
लेकिन वर्ष 2019 में नागरिकता क़ानून पारित होने के बाद चार हजार की आबादी वाले गायघाटा में अब तक महज सौ लोगों को ही इस कानून के तहत नागरिकता प्रमाणपत्र मिल सका है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि यह प्रक्रिया काफी धीमी है। मार्च, 2024 से अब तक मिले करीब 1.12 लाख आवेदनों में से महज 15 हजार लोगों को ही नागरिकता मिल सकी है। आवेदन करने वालों में उत्तर 24-परगना के अलावा नदिया जिले के लोग शामिल हैं।राज्य में हाल के कुछ चुनावों में मतुआ बहुल इलाक़ों में बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा रहा है। बीजेपी को पहले से ही आशंका थी कि जरूरी दस्तावेज नहीं होने के कारण एसआईआर के दौरान इस समुदाय के लोगों को दिक्कत हो सकती है। इसलिए उसने मतुआ आबादी वाले इलाकों में नागरिकता कानून के तहत आवेदन के लिए सहायता शिविरों का आयोजन किया था। बड़ी तादाद में मतुआ वोटरों के नाम कटने की आशंका के कारण बीजेपी ने उनको इससे बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। लेकिन उससे खास फायदा नहीं हुआ।
मतुआ समुदाय के नेताओं का दावा है कि लगभग 70 प्रतिशत मतुआ परिवार इस एसआईआर प्रक्रिया से प्रभावित हुए हैं।
कम से कम 55 विधानसभा क्षेत्रों में फैले 1.3 करोड़ से अधिक मतदाताओं के साथ यह समुदाय लंबे समय से बंगाल के सबसे अहम वोट बैंक में शामिल रहा है। बीजेपी नेताओं के मुताबिक, 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की 77 सीटों की कुल संख्या में से आधी से अधिक सीटें मतुआ और अन्य शरणार्थी बहुल इलाकों से आई थीं और यह समर्थन 2024 के लोकसभा चुनावों में भी काफी हद तक बरकरार रहा था।
इस समुदाय के ज्यादातर लोग उत्तर 24-परगना जिले के बनगांव के अलावा आसपास के इलाकों और नदिया जिले में रहते हैं। यह राज्य में अनुसूचित जाति का दूसरा बड़ा समूह है। विधानसभा की करीब 55 सीटों पर यह तबका निर्णायक स्थिति में है।
पश्चिम बंगाल से और ख़बरें
मतुआ समुदाय की शुरुआत वर्ष 1860 में अविभाजित बंगाल में समाज सुधारक हरिचंद ठाकुर ने की थी। समुदाय के लोग उन्हें भगवान विष्णु का अवतार मानते हैं और श्री श्री हरिचंद ठाकुर कहते हैं। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के बाद हरिचंद ठाकुर के परिवार वाले सीमा पार कर पश्चिम बंगाल में बस गए। यहाँ मतुआ समुदाय का ज़िम्मा हरिचंद ठाकुर के परपोते प्रथम रंजन ठाकुर ने संभाला और उनकी पत्नी वीणापाणि देवी को ही मतुआ माता या बड़ो मां यानी बड़ी मां कहा जाने लगा। बड़ो मां ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश से आने वाले इस समुदाय के शरणार्थियों के लिए बांग्लादेश सीमा पर ठाकुरनगर नाम से एक बस्ती बसाई।
ममता ने भी जीता था समर्थन
हरिचंद ठाकुर के परपोते प्रथम रंजन ठाकुर के दौर से ही परिवार का राजनीतिक रसूख और दखल रहा है। वह 1962 में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा का चुनाव भी जीते थे। बड़ो मां मतुआ समुदाय के लोगों के लिए बहुत ही सम्मानित थीं। वह खुद तो राजनीति से दूर रहीं। लेकिन 2010 में उनकी ममता बनर्जी से नजदीकियां बढ़ीं और उन्होंने उसी साल दीदी को मतुआ समुदाय का संरक्षक घोषित कर दिया। 2011 के चुनावों में ममता बनर्जी को इसका जबरदस्त फायदा मिला और मतुआ वोटों पर तृणमूल कांग्रेस की पकड़ मजबूत हो गई। वर्ष 2014 में पार्टी ने मतुआ माता के बेटे कपिल कृष्ण ठाकुर को टिकट दिया और वो जीत कर लोकसभा पहुंच गए। उनकी मौत के बाद उपचुनाव में टीएमसी ने उनकी पत्नी ममता बाला ठाकुर को टिकट दिया और उन्होंने जीत हासिल की। लेकिन बाद में बीजेपी ने इस वोट बैंक में सेंध लगाई और इसी परिवार के शांतनु ठाकुर को टिकट दिया था और वो वर्ष 2019 में जीत कर संसद पहुंचे थे।