पश्चिम बंगाल की राजनीति में कबीर और असदुद्दीन ओवैसी का गठजोड़ क्या ममता बनर्जी के लिए बड़ा ख़तरा है? क्या टीएमसी को इससे बड़ा नुक़सान हो सकता है? पढ़ें कोलकाता से प्रभाकर मणि तिवारी का विश्लेषण।
असदुद्दीन ओवैसी हुमायूँ कबीर।
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के गहन विशेष पुनरीक्षण यानी एसआईआर की कड़ी चुनौती से जूझ रही सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के लिए बागी विधायक हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी का गठजोड़ नया ख़तरा बन सकता है। मुर्शिदाबाद जिले से रहे तृणमूल कांग्रेस विधायक ने बीते साल के आख़िर में जिले में बाबरी मस्जिद बनाने का एलान किया था। उसके बाद पार्टी ने उनको निलंबित कर दिया था।
कुछ महीने बाद उन्होंने आम जनता उन्नयन पार्टी नामक एक राजनीतिक दल बना कर मैदान में उतरने का एलान किया था। अब उन्होंने ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी एआईएमआईएम से गठजोड़ कर तृणमूल के लिए ख़तरे की घंटी बजा दी है। राज्य की क़रीब 30 फीसदी मुस्लिम आबादी को तृणमूल का सबसे मज़बूत वोट बैंक माना जाता है। लेकिन अब नया गठजोड़ उनके इसी वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश करेगा।
वैसे, ओवैसी की पार्टी ने वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में भी सात सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन तब उनमें से किसी को भी साढ़े तीन हजार से ज़्यादा वोट नहीं मिल सके थे। इसलिए उन्होंने इस बार हुमायूं कबीर के साथ हाथ मिलाया है।
हालाँकि तृणमूल कांग्रेस ने कहा है कि इस गठजोड़ का उसके वोट बैंक पर कोई असर नहीं होगा। पार्टी का आरोप है कि बीजेपी परोक्ष रूप से इस गठजोड़ की मदद कर रही है। बीते चुनाव में भी पार्टी ने ओवैसी पर बीजेपी की बी टीम होने का आरोप लगाया था।
लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस गठजोड़ से इलाक़े में अल्पसंख्यक वोट बैंक का समीकरण गड़बड़ा सकता है। यह गठजोड़ मुख्य रूप से अल्पसंख्यक बहुल मालदा, मुर्शिदाबाद और बीरभूम जिले की कुछ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगा। इनमें से ओवैसी की पार्टी के आठ सीटों पर मैदान में उतरने की योजना है।
अल्पसंख्यक बहुल मुर्शिदाबाद में 22 सीटें
यह गठजोड़ जिन इलाक़ों में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है वो तृणमूल के लिए काफी अहम हैं। देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक बहुल जिले मुर्शिदाबाद में कुल 22 सीटें हैं। पिछली बार तृणमूल ने इनमें से 20 सीटों पर जीत हासिल की थी। बाकी दो सीटें भाजपा को मिली थीं। इसी तरह मालदा की 12 में से आठ सीटें तृणमूल और चार भाजपा की झोली में गई थीं।
विश्लेषकों का कहना है कि एसआईआर या वोटों में सेंधमारी के कारण मतदान में एक-दो फीसदी के बदलाव से भी नतीजे काफी बदल सकते हैं।
अल्पसंख्यक वोट बैंक पर नज़र
कबीर और ओवैसी गठजोड़ की निगाहें भी अल्पसंख्यक वोट बैंक पर ही हैं। जाहिर है उनके मजबूती से लड़ने की स्थिति में ममता बनर्जी की पार्टी को ही नुक़सान होगा। लेकिन तृणमूल कांग्रेस नेताओं को उम्मीद है कि संगठन कमजोर होने और ओवैसी का कोई जनाधार नहीं होने के कारण इस गठजोड़ को कोई खास कामयाबी नहीं मिलेगी। लेकिन नेताओं के एक गुट को यह ख़तरा सता रहा है कि अल्पसंख्यक वोटों के विभाजन का फ़ायदा कहीं भाजपा को न मिल जाए।
182 सीटों पर लड़ेंगे चुनाव
हुमायूं कबीर ने कोलकाता में पत्रकारों से कहा कि ओवैसी के साथ हाथ मिला कर वो कम से कम 182 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। उनका दावा था कि यह गठजोड़ अगली सरकार के गठन में किंगमेकर के तौर पर उभरेगा।पश्चिम बंगाल से और ख़बरें
ओवैसी ने यहां पत्रकारों से बातचीत में बंगाल में भाजपा के उत्थान के लिए ममता बनर्जी को जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना था कि कबीर के साथ गठजोड़ का मकसद राज्य में समाज के गरीब और पिछड़े तबकों का शोषण रोक कर उनको सशक्त बनाना है।
कबीर और ओवैसी राज्य में कम से कम 20 साझा रैलियाँ करेंगे। इनकी शुरुआत पहली अप्रैल से मुर्शिदाबाद जिला मुख्यालय बहरमपुर से होगी। कबीर की पार्टी ने नंदीग्राम और भबानीपुर में भी अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं। उनकी पार्टी ने 149 सीटों के लिए उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। खुद हुमायूं मुर्शिदाबाद जिले के रेजिनगर और नौदा से लड़ेंगे।
कबीर के मुताबिक़, सीटों पर तालमेल के बाद इसी सप्ताह बाक़ी सीटों के लिए उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी जाएगी।
विश्लेषकों की राय में अकेले ओवैसी के मैदान में उतरने से तृणमूल कांग्रेस को खास नुक़सान होने की आशंका नहीं थी। लेकिन कबीर के साथ गठजोड़ ने ममता बनर्जी के लिए ख़तरे की घंटी तो बजा ही दी है।