पश्चिम बंगाल में गुरुवार को पहले चरण के चुनाव में जबरदस्त मतदान हुआ। पीएम मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह मतदान वाले जिलों के बगल में ताबड़तोड़ रैलियां करते नज़र आए। एक से एक शब्द टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी के लिए बोले जा रहे थे। पहले चरण में 92.88% मतदान दर्ज किया गया। यह 1947 के बाद राज्य का अब तक का सबसे अधिक मतदान प्रतिशत है। इस ऐतिहासिक आंकड़े ने न केवल चुनावी विशेषज्ञों को चौंकाया है, बल्कि इसके पीछे छिपे कारणों और राजनीतिक संकेतों को लेकर भी बहस तेज हो गई है।
इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव में, जो कोविड-19 महामारी और टीएमसी-बिजेपी के बीच तीखी राजनीतिक टक्कर के बीच हुए थे, कुल मतदान 82.30% रहा था। उस चुनाव में 7.34 करोड़ रजिस्टर्ड मतदाताओं में से लगभग 5.99 करोड़ लोगों ने मतदान किया था और तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 213 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी थी। 
टीएमसी का बयान: "91 लाख नाम हटाने के बावजूद रिकॉर्ड मतदान हुआ क्योंकि लोग एनआरसी और डेलिमिटेशन के खतरे को समझते हैं। यह BJP की साजिश को कुचलने का मौका है।" ममता बनर्जी ने बार-बार एनआरसी के मुद्दे को उठाया।
इस बार पहले चरण में ही 3.6 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से 92.88% लोगों ने वोट डाले, जो पिछले चुनाव की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय भागीदारी को दर्शाता है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इसे ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में यह सबसे अधिक मतदान प्रतिशत है और चुनाव आयोग हर मतदाता को सलाम करता है।
इस रिकॉर्ड मतदान के पीछे चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को एक अहम कारण माना जा रहा है। इस प्रक्रिया के तहत राज्य की मतदाता सूची से करीब 91 लाख नाम हटा दिए गए। इनमें लगभग 63 लाख नाम पहले से हटाए गए थे, जबकि करीब 27 लाख मतदाताओं को न्यायिक प्रक्रिया के बाद अयोग्य घोषित किया गया। इसके अलावा, हाल ही में लगभग 7 लाख नए मतदाताओं को भी सूची में जोड़ा गया है, जिनमें से 3.22 लाख ने पहले चरण में मतदान किया।
मुर्शिदाबाद, नॉर्थ 24 परगना, मालदा, नादिया और साउथ 24 परगना जैसे जिलों में सबसे ज्यादा नाम हटाए गए। वहीं कोलकाता में ही करीब 7 लाख मतदाताओं को सूची से बाहर कर दिया गया, जिससे शहर के कई इलाकों में मतदाता आधार में भारी गिरावट आई।
इस प्रक्रिया के बाद राज्य का कुल मतदाता आधार 7.6 करोड़ से घटकर 6.8 करोड़ रह गया।

क्या ज्यादा मतदान का मतलब किसी एक पार्टी को फायदाः पहले चरण में 294 में से 152 सीटों पर मतदान हुआ। साउथ दिनाजपुर (95.36%) और कूचबिहार (95.5%) में सबसे अधिक वोटिंग दर्ज की गई। भारी मतदान को लेकर राजनीतिक दल अपने-अपने दावे कर रहे हैं। टीएमसी नेता कुणाल घोष ने दावा किया कि भारी मतदान जनता का उनकी पार्टी के पक्ष में समर्थन है और उनकी पार्टी 152 में से कम से कम 125 सीटें जीत सकती है। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि अधिक मतदान का सीधा संबंध किसी एक पार्टी की जीत से नहीं जोड़ा जा सकता। वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई का कहना है कि पारंपरिक धारणा यह रही है कि ज्यादा मतदान सरकार के खिलाफ होता है, लेकिन पिछले एक दशक में कई राज्यों में सत्ताधारी दलों को भी इसका फायदा मिला है।

विश्लेषकों के अनुसार, भारी मतदान का सीधा संबंध SIR से है, जैसा बिहार (2025) में देखा गया जहां डिलीशन के बाद टर्नआउट बढ़ा। हालांकि, उच्च टर्नआउट हमेशा सत्ताधारी के खिलाफ नहीं होता; 2011 में टीएमसी की जीत के समय भी 84.33% मतदान हुआ था।

भारी मतदान के पीछे के प्रमुख कारण

पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड मतदान के पीछे कई कारण सामने आए हैं:
मतदाता सूची से नाम हटने का डर:
SIR प्रक्रिया के चलते लोगों में अपने वोटिंग अधिकार और नागरिकता खोने का भय बढ़ा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए आरोप लगाया कि केंद्र और भाजपा लोगों के अधिकार छीनने की कोशिश कर रहे हैं।
बाहरी राज्यों से मतदाताओं की वापसी:
दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और सूरत जैसे शहरों से बड़ी संख्या में लोग वोट डालने के लिए बंगाल लौटे।
सुरक्षा व्यवस्था में सुधार:
इस बार करीब 2.4 लाख केंद्रीय अर्धसैनिक बल (CAPF) तैनात किए गए, जिससे मतदाताओं को सुरक्षित माहौल मिला और मतदान प्रतिशत बढ़ा।
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी:
हाल के चुनावों में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर या उससे अधिक रही है, जिसने भी मतदान प्रतिशत को बढ़ाया।
पश्चिम बंगाल में 92.88% का रिकॉर्ड मतदान लोकतंत्र में जनता की सक्रिय भागीदारी का मजबूत संकेत है। यह दर्शाता है कि एक ओर जहां मतदाता अपने अधिकारों को लेकर सजग हैं, वहीं दूसरी ओर सुरक्षित माहौल मिलने पर वे बढ़-चढ़कर मतदान करते हैं। हालांकि, यह भारी मतदान किस पार्टी के पक्ष में जाएगा, इसका स्पष्ट जवाब 4 मई को आने वाले चुनाव नतीजे ही देंगे।