पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से ठीक पहले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत चुनाव आयोग ने राज्य की मतदाता सूची से करीब 91 लाख नाम हटा दिए। इसमें से लगभग 27 लाख नाम उन मतदाताओं के हैं जिन्हें “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” (तार्किक विसंगति) के आधार पर हटाया गया। ये वे मामले थे जो न्यायिक अधिकारियों के पास थे और अंतिम रूप से अपीलीय ट्रिब्यूनल्स में गए। लेकिन खबर यह नहीं है।

अब आंकड़ों को गौर से देखें: 27 लाख मतदाताओं ने हटाए जाने के खिलाफ अपील दायर की। पहले चरण के मतदान (23 अप्रैल 2026) से पहले ट्रिब्यूनल्स ने कुल 138 मामलों का ही फैसला किया। इनमें से 136 अपीलें मंजूर हो गईं और मात्र 2 खारिज हुईं। यानी स्वीकृति दर 98.5 प्रतिशत रही।
इसका मतलब साफ है- जिन 138 लोगों को ट्रिब्यूनल तक पहुंचने का मौका मिला, उनमें से लगभग सभी (136) को वैध माना गया और मतदाता सूची में वापस शामिल कर लिया गया।
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बहुत कम मामलों में सुनवाई हुई

27 लाख अपीलों में से सिर्फ 138 का निपटारा पहले चरण से पहले हुआ। यानी 99.999% से भी ज्यादा अपीलें लंबित रह गईं। लाखों-करोड़ों मतदाताओं को वोट डालने का मौका ही नहीं मिल सका क्योंकि उनके मामले पर सुनवाई नहीं हो पाई।

जिन मामलों की सुनवाई हुई, उनमें 98.5% को सही पाया गया। यह आंकड़ा इस संभावना को मजबूत करता है कि बहुत बड़ी संख्या में हटाए गए मतदाता वास्तव में वैध थे। अगर ट्रिब्यूनल्स ने जितने भी मामले सुने, उनमें से लगभग सभी को बहाल कर दिया, तो बाकी बचे लाखों मामलों में भी ज्यादातर लोग असली मतदाता हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया कि केवल वे अपीलें मानी जाएंगी जो 21 अप्रैल तक (पहले चरण के लिए) तय हो जाएं। ट्रिब्यूनल्स की संख्या सीमित थी (19 अपीलीय ट्रिब्यूनल्स), प्रक्रिया जटिल थी और समय बेहद कम था। नतीजा यह हुआ कि लाखों लोगों की अपीलें “समय पर” नहीं सुनी जा सकीं।
मतदान का अधिकार मौलिक अधिकार है। अगर सैकड़ों-हजारों वैध मतदाताओं के नाम बिना पूरी सुनवाई के हट जाते हैं और अपील की प्रक्रिया इतनी धीमी और अपर्याप्त साबित होती है कि ज्यादातर लोग वोट नहीं डाल पाते, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।
ज्यादातर हटाए गए मतदाता असली हैं, लेकिन उन्हें समय पर न्याय नहीं मिल सका। उच्च स्वीकृति दर (98.5%) इस बात का संकेत है कि SIR प्रक्रिया में गलतियों की संभावना काफी थी, खासकर “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” जैसे नए और अस्पष्ट मानदंड के इस्तेमाल से। चुनाव आयोग का कहना है कि यह शुद्धिकरण की प्रक्रिया थी, लेकिन आंकड़े दिखाते हैं कि अपील यानी ट्रिब्यूनल प्रणाली इतनी प्रभावी नहीं बनी कि बड़े पैमाने पर हटाए गए लोगों को राहत मिल सके। नतीजतन, पहले चरण में हजारों-लाखों संभावित वैध मतदाता वोट से वंचित रह गए। यह बहुत बड़ी चुनावी धांधली है।
यह स्थिति न केवल प्रभावित मतदाताओं के लिए निराशाजनक है, बल्कि पूरे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर भी सवाल उठाती है। दूसरे चरण के लिए 27 अप्रैल तक और अपीलें तय हो सकती हैं, लेकिन कुल लंबित मामलों (34 लाख) के मुकाबले यह संख्या भी बहुत कम रहने वाली है।
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बहरहाल, 27 लाख में से सिर्फ 138 को सुनवाई का मौका मिला और 136 को बहाल कर दिया गया। यह आंकड़ा स्पष्ट रूप से इशारा करता है कि प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर असली मतदाताओं के नाम अनजाने में या अपर्याप्त जांच के कारण कट गए, और समय की कमी के कारण उनमें से अधिकांश को अपना वोट डालने का अधिकार नहीं मिल सका। इसने लोकतंत्र में मतदाता सूची शुद्धिकरण और मताधिकार के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती को उजागर कर दिया है। इससे भारत के चुनाव आयोग की विश्वसनीयता (ईसीआई) पर सवाल खड़े कर दिए हैं।