पश्चिम बंगाल में इस बार रिकॉर्डतोड़ सुरक्षा बलों की तैनाती की गई। इसके बावजूद जनता ने बीजेपी प्रत्याशियों को दौड़ा कर पीटा। हालांकि इन्हें टीएमसी कार्यकर्ता कहा गया लेकिन वीडियो कुछ और भी तथ्य बता रहे हैं। अभी पहले चरण में ये हाल हुआ है। दूसरा चरण बाकी है।
कुमारगंज में बीजेपी प्रत्याशी को पिटाई से बचाता जवान। वीडियो ज़रूर देखें।
पश्चिम बंगाल में पहले चरण के मतदान के दौरान 23 अप्रैल 2026 को बीजेपी नेताओं को दौड़ाकर पीटने के वीडियो वायरल हुए। इनमें कुमारगंज (दक्षिण दिनाजपुर जिला) से बीजेपी उम्मीदवार सुवेंदु सरकार का वीडियो सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में है। हालांकि सुवेंदु सरकार को पीट रहे लगे लोगों को टीएमसी कार्यकर्ता बताया गया। लेकिन वीडियो गौर से देखने पर पता चलता है कि पीटने वाले लोग स्थानीय हैं। हालांकि पुलिस ने पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया है। वे गांव के लोग हैं। चुनाव आयोग ने इन गिरफ्तारियों की पुष्टि की है। लेकिन इतनी भारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद इस तरह की घटनाएं हुईं। आसनसोल (साउथ) से बीजेपी प्रत्याशी अग्निमित्रा पॉल की गाड़ी पर पथराव हुआ। उनका कहना है कि ये घटना मुस्लिम बहुल इलाके में हुई। हुमायूं कबीर के साथ नौदा में मारपीट की गई। सुरक्षा बल ने मुश्किल से उन्हें भीड़ से निकाला। हुमायूं कबीर का खुद का आरोप है कि पीटने वाले उन्हें बीजेपी एजेंट कह रहे थे।
सुवेंदु सरकार के साथ क्या हुआ था
सुवेंदु सरकार बीजेपी के उम्मीदवार हैं। वे कुमारगंज टीएमसी के वर्तमान विधायक तोराफ हुसैन मंडल के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। 2021 में तोराफ हुसैन ने बड़ी जीत दर्ज की थी। सुवेंदु सरकार को कुमारगंज के 8-10 बूथों पर मतदाताओं को रोकने की कथित शिकायत मिली। वे बीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ बूथ पर पहुंचे। सीधे अंदर चले गए। ऐसा दो-तीन बूथों पर आसानी से हो गया लेकिन बूथ नंबर 24 (बन्यारी हाई स्कूल) पर स्थानीय लोगों ने उनके साथ बीजेपी कार्यकर्ताओं के जाने पर आपत्ति की। वहां उन पर हमला हो गया। सुवेंदु सरकार और बीजेपी के अनुसार, टीएमसी कार्यकर्ताओं की भीड़ ने उन्हें और उनके टीम (सुरक्षा गार्ड सहित) को घेर लिया, खेतों में दौड़ाया, पीटा और उनकी कार तोड़ दी। वीडियो में दिख रहा है कि सुवेंदु सरकार खेतों में भाग रहे हैं। पुलिस वाला साथ है। फिर भी भीड़ उन्हें पकड़कर मारपीट करती है। बाद में सुरक्षा बलों ने उन्हें सुरक्षित निकाला। हालांकि इससे पहले सुवेंदु सरकार का एक वीडियो और वायरल हुआ था जिसमें वे उन लोगों का पीछा कर रहे थे जिन पर उन्होंने बीजेपी समर्थकों को वोट डालने से रोकने का आरोप लगाया था।
अग्निमित्रा पॉल के साथ क्या हुआ
आसनसोल दक्षिण विधानसभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार अग्निमित्रा पॉल ने कहा, "मेरी गाड़ी पर हमला किया गया और तोड़फोड़ की गई। मैं रहमत नगर अल्पसंख्यक क्षेत्र में गई थी, तभी मेरी गाड़ी पर एक बड़ा पत्थर फेंका गया। गाड़ी का पूरा पिछला हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया और शीशे पूरी तरह चकनाचूर हो गए। भगवान की कृपा से न तो मेरे सुरक्षाकर्मियों को और न ही मुझे चोट आई। हालांकि, पीछे बैठी मेरी सचिव को मामूली चोट आई है। इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं। आप आसानी से समझ सकते हैं कि इसके पीछे कौन है और अल्पसंख्यकों के साथ किसके अच्छे संबंध हैं...।" टीएमसी का आरोप है कि अग्निमित्रा ने इस घटना को फर्जी ढंग से तैयार किया है। उनके पास कोई सबूत नहीं है।
इतनी अभूतपूर्व सुरक्षा के बावजूद बीजेपी प्रत्याशी/नेता असुरक्षित कैसे
2024 के लोकसभा चुनाव सात चरणों में हुए थे। देशव्यापी तैनाती के मुकाबले पश्चिम बंगाल को सबसे अधिक सुरक्षा बल मिले थे। लगभग 3.4 लाख CAPF जवानों में से करीब 920 CAPF कंपनियाँ (यानी लगभग 92,000 जवान) अकेले इसी राज्य में तैनात किए गए, जो पिछले चुनावों की तुलना में काफी अधिक थे।
2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव आठ चरणों में हुए थे। करीब 725 CAPF कंपनियाँ तैनात की गई थीं। इस बार 2026 में हुई वृद्धि राज्य में चुनावी हिंसा के इतिहास को देखते हुए सबसे बड़ी तैनाती है। तैनाती का यह पैमाना अन्य संवेदनशील क्षेत्रों से भी तुलना करने लायक है। जम्मू-कश्मीर में दस वर्ष बाद कराए गए 2024 के विधानसभा चुनावों के दौरान लगभग 900 CAPF कंपनियाँ तैनात की गई थीं। 2024 के लोकसभा चुनावों में केंद्र शासित प्रदेश में करीब 635 CAPF कंपनियाँ तैनात की गईं। लेकिन बंगाल ने इस बार रिकार्ड तोड़ दिया है।
देशव्यापी स्तर पर 2024 के लोकसभा चुनावों में लगभग 3.4 लाख CAPF कर्मी तैनात किए गए थे। इसी वजह से एक ही राज्य में केंद्रित इतने बड़े पैमाने की तैनाती पश्चिम बंगाल में उल्लेखनीय है। लोकसभा चुनावों के दौरान अन्य राज्यों में भी केंद्रीय बलों की महत्वपूर्ण तैनाती हुई, जिसमें छत्तीसगढ़ (360 कंपनियाँ), बिहार (295), उत्तर प्रदेश (252) और आंध्र प्रदेश, झारखंड तथा पंजाब में लगभग 250-250 कंपनियाँ शामिल हैं।
CAPF तैनाती को लेकर पहले TMC सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्रीय बलों के दुरुपयोग का आरोप लगाया था। एक सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने कहा था, "केंद्रीय बलों का खुला दुरुपयोग बिना रुके जारी है। हमने बार-बार यह मुद्दा उठाया despite, चुनाव आयोग चुप्पी साधे बैठा है जबकि वर्दीधारी जवानों का कई जगहों पर TMC मतदाताओं को खुलेआम धमकाने और एक पार्टी के पक्ष में वोट डलवाने के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है।"
चुनाव आयोग के इरादे पर सवाल
पश्चिम बंगाल में इतने बड़े पैमाने पर CAPF की तैनाती चुनाव आयोग के निर्देश पर की गई। आयोग ने बंगाल चुनाव को लेकर कुछ ज्यादा ही उत्साह दिखाया। सबसे पहले उसने राज्य के डीजीपी सहित कई पुलिस अधिकारियों को हटा दिया। यहां तक पुलिस थानों और पुलिस चौकी तक में पुलिसकर्मियों की तैनाती में उसने हस्तक्षेप किया।
ताज़ा मामला 21 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी के ऑफिस से जारी एक मेमो से जुड़ा है। इसमें क़रीब 800 लोगों की लिस्ट थी और उन्हें 'परेशान करने वाले' यानी ट्रबल मेकर बताया गया था। मेमो में कहा गया था कि ये लोग मतदाताओं को डराते-धमकाते हैं और चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी करते हैं। इस लिस्ट में स्थानीय पार्षद, पंचायत सदस्य, विधायक और सांसद जैसे चुने हुए प्रतिनिधि भी शामिल थे। मेमो में पुलिस को इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था।
चीफ जस्टिस सुजॉय पॉल और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की डिवीजन बेंच ने इस मेमो पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा, 'हमारी प्रथम दृष्टया राय है कि मुख्य चुनाव अधिकारी के ऑफिस में तैनात पुलिस ऑब्जर्वर ने गलती की है। वे किसी भी नागरिक को आँख बंद करके 'परेशान करने वाला' घोषित नहीं कर सकते।' कोर्ट ने आदेश दिया कि 21 अप्रैल वाला मेमो जून 2026 के आखिरी दिन तक या कोर्ट के अगले आदेश तक प्रभावी नहीं रहेगा।
वरिष्ठ वकील कल्याण बंदोपाध्याय ने कोर्ट में कहा कि चुनाव आयोग के पास किसी को 'trouble-maker' कहकर सामान्य आदेश जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। यह शब्द किसी भी कानून में मान्य नहीं है। पश्चिम बंगाल के एडवोकेट जनरल किशोर दत्ता ने भी याचिका का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि 'trouble-maker' कोई कानूनी श्रेणी नहीं है। किसी की स्वतंत्रता पर रोक लगाने के लिए सख्त कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।