बांग्लादेश में 12 फरवरी, 2026 को एकसाथ राष्ट्रीय चुनाव और जनमत संग्रह होने जा रहे हैं, जो उसके राजनीतिक इतिहास में पहली बार है। लेकिन तमाम कानूनी, राजनीतिक और वैधता संबंधी सवाल बने हुए हैं। अवामी लीग के बिना यह कैसा चुनावः
बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को मतदान है
बांग्लादेश का भविष्य कल यानी 12 फरवरी को तय होने वाला है, जब देश में पहली बार संसदीय चुनाव के साथ-साथ एक संवैधानिक जनमत संग्रह (रेफरेंडम) होने जा रहा है। यह ऐतिहासिक वोट 'जुलाई नेशनल चार्टर' को अपनाने पर 'हां' या 'ना' पर भी होगा। लेकिन बांग्लादेश के तमाम मतदाता इसके बारे में कुछ भी नहीं जानते।
पिछले साल छात्र-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों ने शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंका था और नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार सत्ता में आई। अब यह अंतरिम सरकार 'जुलाई नेशनल चार्टर' के माध्यम से संविधान में बड़े बदलाव लाना चाहती है, जिसमें 84 सुधार प्रस्ताव शामिल हैं। जिनमें से 47 संवैधानिक संशोधन और बाकी कानून या कार्यकारी आदेश हैं।
बांग्लादेश में अगर "हां" जीता तो क्या होगा
जनमत संग्रह में यदि 'हां' वोट जीतता है, तो देश के राजनीतिक ढांचे में मौलिक परिवर्तन आएगा। इसमें प्रधानमंत्री की शक्तियों को सीमित करना (अधिकतम दो कार्यकाल या 10 साल), राष्ट्रपति की भूमिका मजबूत करना, दो सदन वाले संसद की स्थापना (100 सदस्यों वाली ऊपरी सदन- यानी भारत के लोकसभा-राज्यसभा जैसा), महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें 50 से बढ़ाकर 100 करना, इंटरनेट की पहुंच को मौलिक अधिकार बनाना, व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा, और 'बंगाली' की जगह 'बांग्लादेशी' पहचान पर जोर जैसे प्रमुख बदलाव शामिल हैं। संवैधानिक सिद्धांतों को भी बदला जाएगा। राष्ट्रीयता, लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की जगह समानता, मानव गरिमा, सामाजिक न्याय, धार्मिक स्वतंत्रता और सद्भाव पर फोकस होगा।
मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस ने अपने वरिष्ठ सचिवों से कहा, "अगर 'हां' वोट जीतता है, तो बांग्लादेश का भविष्य अधिक पॉजिटिव तरीके से बनेगा... मौलिक परिवर्तन आएगा और कुप्रशासन वापस नहीं आएगा।" उन्होंने इसे "अभूतपूर्व बदलाव" बताया। बीएनपी के अध्यक्ष तारिक रहमान और अन्य दल जैसे एनसीपी, जमात-ए-इस्लामी भी 'हां' का समर्थन कर रहे हैं।
लोगों को जनमत संग्रह नहीं समझ आ रहा
लेकिन सड़कों पर हकीकत अलग है। ढाका के गुलशन, करवां बाजार और अन्य इलाकों में कई मतदाताओं को रेफरेंडम की जानकारी ही नहीं है। एक 23 वर्षीय चाय विक्रेता मोहम्मद इमरान खान ने कहा, "मुझे रेफरेंडम समझ नहीं आता। मैंने पढ़ा नहीं, लेकिन फेसबुक रील्स देखकर लगता है देश के लिए अच्छा है।"
एक कॉफी शॉप कर्मचारी लिंकन स्टीफन सराओ ने बताया, "मैंने सभी सुधार पढ़े, लेकिन कहा गया कि सबके लिए एक 'हां' वोट डालना है।" करवां बाजार के एक दुकानदार अहमद अली ने पूछा, "मुझे 'हां' डालना है पता है, लेकिन क्या है यह? वोट तो पार्टियों के बीच होना चाहिए न?"
बांग्लादेश के संवैधानिक विशेषज्ञ रज़ाउर रहमान लेनिन ने चिंता जताई कि अंतरिम सरकार को संविधान बदलने का अधिकार नहीं है, क्योंकि उन्होंने मौजूदा संविधान के तहत शपथ ली थी। उन्होंने कहा, "लोग एक सुधार चाह सकते हैं, दूसरे का विरोध... बंडल्ड वोट से चुनिंदा समर्थन नहीं हो सकता।" एक वकील नूरझट ने कहा, "कोई समझाता ही नहीं कि रेफरेंडम किसके फायदे का है।"
यह जनमत संग्रह 1991 के बाद पहला है। इतिहास में 1977 और 1985 में सैन्य शासकों ने रेफरेंडम से अपनी सत्ता वैध कराई थी। अब विपक्षी दलों जैसे अवामी लीग को बाहर रखा गया है, जिससे वैधता पर सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रपति की शक्ति बढ़ने से सैन्य हस्तक्षेप का खतरा बढ़ सकता है, जबकि प्रधानमंत्री कमजोर होने से अस्थिरता आ सकती है।
अवामी लीग के बिना यह चुनाव कितना वैध और सार्थक
यह चुनाव अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाने के बाद हो रहा है। अंतरिम सरकार ने मई 2025 में एंटी-टेररिज्म एक्ट के तहत अवामी लीग की सभी राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसके बाद चुनाव आयोग ने पार्टी का पंजीकरण निलंबित कर दिया। यह प्रतिबंध 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा की गई दमनकारी कार्रवाई और 1,400 से अधिक मौतों के आरोपों के कारण लगाया गया। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल ने अनुपस्थिति में मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए मौत की सजा सुनाई है, तख्तापलट के बाद भारत में निर्वासित हैं और वहां से पार्टी के समर्थकों को संबोधित करती रहती हैं। अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में यह फैसला लिया गया कि "फ्यूजिटिव्स" या प्रतिबंधित पार्टियां चुनाव में भाग नहीं ले सकतीं।
ऐसे में एक प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी को बाहर रखकर होने वाला यह चुनाव कई मतदाताओं और विश्लेषकों के बीच वैधता पर सवाल खड़े कर रहा है। अवामी लीग के समर्थकों ने इसे "अवैध" बताते हुए चुनाव का बहिष्कार करने की अपील की है, जबकि पार्टी के वरिष्ठ नेता सज्जीब वाजेद (जॉय) ने कहा है कि परिणाम "हमेशा संदिग्ध" रहेगा और इससे राजनीतिक अस्थिरता बनी रहेगी। आलोचकों का तर्क है कि बांग्लादेश की सबसे पुरानी और बड़े पैमाने पर समर्थन वाली पार्टी की अनुपस्थिति लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को कमजोर करती है, खासकर जब जुलाई नेशनल चार्टर रेफरेंडम जैसे बड़े संवैधानिक बदलावों पर वोट हो रहा है। हालांकि, अंतरिम सरकार और समर्थक दल जैसे बीएनपी इसे "ऐतिहासिक" और "मुक्त एवं निष्पक्ष" चुनाव मानते हैं, क्योंकि यह 17 वर्षों में पहला ऐसा मौका है जहां अवामी लीग का एकाधिकार नहीं है। कई मतदाताओं ने सड़कों पर और सोशल मीडिया पर यह सवाल उठाया है कि बिना प्रमुख विपक्षी दल के चुनाव कितना प्रतिनिधित्वपूर्ण होगा।
12 फरवरी को 12 करोड़ से ज्यादा मतदाता दो मतपत्र डालेंगे। एक सफेद (संसदीय चुनाव) और एक गुलाबी (रेफरेंडम)। यह वोट न सिर्फ अगली सरकार तय करेगा, बल्कि बांग्लादेश के संवैधानिक ढांचे को भी नया रूप देगा। लेकिन कम जागरूकता और भ्रम के बीच कई लोग कह रहे हैं- 'डोंट नो'। क्या यह 'हां' बदलाव लाएगा या अनिश्चितता बढ़ाएगा, यह 12 फरवरी का नतीजा बताएगा।