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श्रीलंका, नेपाल के बाद म्यांमार पर भी चीन की पकड़, चौतरफ़ा घिरा भारत?

अब म्यांमार में चीन के पक्ष में एक बार फिर हवा बहने लगी है क्योंकि म्यांमार के शासक रोहिंग्या मसले पर चीन का अंतरराष्ट्रीय समर्थन पाकर काफ़ी राहत महसूस कर रहे हैं। इसी तरह चीन ने श्रीलंका में भी नई सरकार के साथ अपने रिश्ते पहले की तरह बहाल कर लिये हैं। भारत के इर्दगिर्द सभी पड़ोसी देशों को ढाँचागत विकास के मायाजाल में फाँसने की रणनीति लागू कर रहा है। भारत के लिए यह चिंता की बात है।
रंजीत कुमार

म्यांमार में चीन ने फिर अपनी पैठ बना ली है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का 17 व 18 जनवरी को म्यांमार का कामयाब दौरा यही संकेत देता है। इस दौरे में राष्ट्रपति शी चिनपिंग ने म्यांमार और चीन के बीच रिश्तों में नये युग की शुरुआत का एलान किया है। इस दौरान चीन ने वहाँ अपनी ‘चेकबुक’ कूटनीति फिर चलाई और अरबों डॉलर के नये ढाँचागत विकास प्रोजेक्टों के समझौते किए।

2016 में म्यांमार में जनतांत्रिक नेता आंग सान सू की द्वारा स्टेट काउंसलर का सरकारी दायित्व संभालने के बाद यह उम्मीद की जाने लगी थी कि वह जनतांत्रिक भारत के साथ म्यांमार के पारम्परिक रिश्ते बहाल करेंगी और उस चीन के साथ किनारा करेंगी जिसने म्यांमार के सैनिक शासन के दौरान वहाँ के सैनिक जनरलों को सत्ता में बने रहने में मदद दी और बदले में म्यांमार के आर्थिक संसाधनों का नाजायज दोहन करने के इरादे से कई दीर्घकालीन समझौते किए। आंग सान सू की जब सत्ता में आईं तब इस आशय के संकेत मिले कि चीन ने म्यांमार में ढाँचागत परियोजनाओं में निवेश करने के जो समझौते किये हैं उन्हें रद्द किया जा सकता है।

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आँग सान सू की के सत्ता संभालने के बाद म्यांमार में आंशिक जनतंत्र लौटा और नये शासन की स्थापना के बाद यह उम्मीद की जाने लगी थी कि वहाँ की नई सरकार का भारत के प्रति झुकाव बढ़ेगा। लेकिन रोहिंग्या मसले पर अंतरराष्ट्रीय निंदा की शिकार हुई आंग सान सू की को चीन की शरण में इसलिए जाना पड़ा कि चीन ने उन्हें विश्व मंचों पर शर्मिंदगी झेलने से बचाया। 1991 में मानवाधिकारों और जनतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ने के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित 73 साल की आंग सान सू की अब अपनी सत्ता बचाने के लिए न केवल म्यांमार के सैनिक शासकों बल्कि पड़ोसी महारथी चीन के साथ भी समझौते कर चुकी हैं।

चीनी राष्ट्रपति शी चिनपिंग के ताज़ा म्यांमार दौरे में दूरगामी सामरिक महत्व का एक समझौता किया गया जिसे चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारा (सीएमईसी) कहा गया है और इसके तहत म्यांमार के क्योकफ्यू डीप-सीपोर्ट के निर्माण के लिए 1.3 अरब डॉलर का क़रार किया गया है। इस बंदरगाह के ज़रिए चीन अब अपने पूर्वी इलाक़े से सीधे बंगाल की खाड़ी तक सड़क सम्पर्क बना लेगा। ठीक उसी तरह जैसे चीन के शिन्च्यांग प्रदेश से पाकिस्तान के कराची तक जाने वाले चीन-पाक आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) बनाने में चीन इन दिनों जुटा है। चीन इस तरह पश्चिम में कराची के रास्ते मुम्बई से 300 किलोमीटर दूर अरब सागर में अपना प्रवेश मार्ग बना चुका है और दूसरी ओर वह म्यांमार के क्योकफ्यू बंदरगाह के रास्ते बंगाल की खाड़ी में उतरने का ज़मीनी रास्ता बना लेगा।

चीन ने म्यांमार में यह प्रोजेक्ट भी अपने विवादास्पद बेल्ट एंड रोड इनीशियेटिव यानी बीआरआई के तहत वैसे ही बनाने का क़रार किया है जैसे कि वह पाकिस्तान में बीआरआई के तहत सीपीईसी का निर्माण कर चुका है।

साफ़ है कि पाकिस्तान के कराची बंदरगाह तक अपने पाँव पसारने के बाद चीन अब म्यांमार के रास्ते बंगाल की खाड़ी तक अपनी सीधी पहुँच बनाने की योजना को अंजाम देने में जुट गया है। म्यांमार में बीआरआई के तहत चीन अपने युननान प्रांत को कई रेलवे लाइनों से जोड़ने की महत्वाकांक्षी योजना को भी अंजाम देने वाला है।

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म्यांमार में चीन की दिलचस्पी क्यों?

युननान प्रांत को पूर्वी चीन का बड़ा औद्योगिक इलाक़ा बनाने के साथ इसकी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी करने के लिए चीन ने म्यांमार में ही गैस और तेल का दोहन कर वहाँ से युननान प्रांत तक पाइपलाइनें बिछा दी हैं। इनके ज़रिए अरबों घन मीटर गैस और करोड़ों बैरल खनिज तेल चीन को सालाना सप्लाई होने लगे हैं। इनकी बदौलत म्यांमार को अपनी आर्थिक बदहाली दूर करने में मदद मिली है। हालाँकि चीनी ढाँचागत परियोजनाओं की वजह से म्यामांर चीन के कर्ज के बोझ में डूबने लगा है। म्यांमार के कुल विदेशी क़र्ज़ का 40 प्रतिशत यानी चार अरब डॉलर चीन का हिस्सा ही है लेकिन म्यांमार ने इसके बावजूद चीन को अपने यहाँ बेल्ट एंड रोड इनीशियेटिव को लागू करने की अपनी पुरानी हिचक छोड़ दी है।

ग़ौरतलब है कि कुछ महीनों पहले ही चीनी राष्ट्रपति ने नेपाल का दौरा किया था और वहाँ भी चीन और नेपाल को जोड़ने वाली रेलवे लाइन और सड़क मार्ग बनाने का एलान किया था। हालाँकि नेपाल और म्यांमार दोनों में चीन की इस ढाँचागत परियोजना को स्वीकार करने को लेकर बहस चल रही है लेकिन चीन की यह पेशकश इतनी लुभावनी है कि दोनों देशों की सरकारों ने अपनी जनता के समक्ष इसे अपने उज्ज्वल भविष्य के प्रतीक के तौर पर पेश किया है।

चीनी राष्ट्रपति ने वैसे तो म्यांमार और चीन के बीच राजनयिक रिश्तों की स्थापना की 70वीं सालगिरह के बहाने म्यांमार की राजधानी नेपीताव का दौरा किया है लेकिन उनका म्यांमार जैसे छोटे देश के लिए इतना वक़्त निकालना चीन की नज़र में म्यांमार की सामरिक अहमियत ही दर्शाता है।

रोचक बात यह है कि म्यांमार के सत्तारुढ़ नेताओं का भरोसा जीतने के बाद राष्ट्रपति शी ने म्यांमार का दौरा किया है। रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जिस तरह म्यांमार की फजीहत हुई है उससे उबारने में चीन ने काफ़ी मदद दी है।

दो साल पहले रोहिंग्या मसले पर चीन ने चतुर रणनीति के तहत अपने को म्यांमार के हितचिंतक के तौर पर पेश करने में कामयाबी पाई थी हालाँकि वह बांग्लादेश का भी क़रीबी दोस्त माना जाता है। इसके पहले म्यांमार और चीन के रिश्तों में खटास आ गई थी क्योंकि  म्यांमार में जनतांत्रिक चुनावों के बाद अधिनायकवादी चीन के ख़िलाफ़ हवा बनने लगी थी और वहाँ चीनी ढाँचागत परियोजनाओं का विरोध किया जाने लगा था।

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भारत के पड़ोस में चीन का जाल

लेकिन चीन ने अपनी ओर से रिश्तों पर कोई आँच नहीं आने दी क्योंकि उसकी नज़र म्यांमार के शासकों की मदद से अपने दीर्घकालिक सामरिक हितों को आगे बढ़ाने पर थी। अब म्यांमार में चीन के पक्ष में एक बार फिर हवा बहने लगी है क्योंकि म्यांमार के शासक रोहिंग्या मसले पर चीन का अंतरराष्ट्रीय समर्थन पाकर काफ़ी राहत महसूस कर रहे हैं। इसी तरह चीन ने श्रीलंका में भी नई सरकार के साथ अपने रिश्ते पहले की तरह बहाल कर लिये हैं और वहाँ महत्वाकांक्षी ढाँचागत परियोजनाओं को वह पहले ही अंजाम दे चुका है। भारत के इर्दगिर्द सभी पड़ोसी देशों को ढाँचागत विकास के मायाजाल में फाँसने की रणनीति लागू कर रहा है।

भारत के लिए यह चिंता की बात है कि कैसे इससे प्रभावी तौर पर निपटने के लिए पड़ोसी देशों के साथ परस्पर विश्वास और भरोसा का रिश्ता बनाए। भारत के रणनीतिकारों को सोचना होगा कि किस तरह घरेलू राजनीति की आँच आए बिना अपनी पड़ोसी कूटनीति को अंजाम दे। हाल में हमने देखा है कि घरेलू राजनीति की वजह से पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों पर आँच आई है। यह भारत के सामरिक हितों के संवर्द्धन के नज़रिये से ठीक नहीं होगा कि एक- एक कर भारत के सभी पड़ोसी चीन की गोद में बैठते जाएँ।

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