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अमेरिकी सैनिकों को मध्य-पूर्व भेजे जाने से चौपट होगी भारत की अर्थव्यवस्था?

इराक़ युद्ध के बाद से अब तक मध्य-पूर्व में वैसा राजनीतिक और कूटनीतिक संकट नहीं आया था, जैसा सोमवार को आया। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने 1 हज़ार अतिरिक्त सैनिक और युद्ध के साजो-सामान उस इलाक़े में भेजने का ऐलान कर ख़तरे की घंटी बजा दी। तेहरान ने भी उसी दिन यह घोषणा कर अपने अड़ियल रवैए का संकेत दे दिया कि परमाणु संधि के तहत कम संवर्द्धित यूरेनियम के भंडारण की जो सीमा तय की गई थी, उसने उतना हासिल कर लिया है, अब वह आगे की सोच रहा है।
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इसी दिन साइबर विशेषज्ञों ने भी कहा कि ईरान अमेरिका और उसके सहयोगियों पर साइबर हमला करने की क्षमता रखता है। उन्होंने यह संकेत भी दे दिया कि सऊदी अरब-अमेरिका की साझा तेल कंपनी अरैमको पर साइबर हमला जल्द होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है।
एक ही दिन हुई तीन घटनाओं ने यह सवाल उठा दिया है कि क्या वाकई अमेरिका और ईरान युद्ध की कगार पर हैं या सिर्फ़ युद्धोन्माद खड़ा करना ही मक़सद है। ट्रंप ने युद्ध का नगाड़ा बजा दिया है या फ़िलहाल बंदरघुड़की से ही काम चलाना चाहते हैं।

ट्रंप की दरियादिली?

यह अहम इसलिए भी है कि इसके पहले अमेरिकी ड्रोन के ईरानी सरज़मीन पर गिराए जाने के बाद राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पहले तो यह कहा था कि वह इसके जवाब में ईरानी ठिकानों पर हमले के आदेश देंगे। पर बाद में यह कह पीछे हट गए कि ऐसा करने से कम से कम 150 लोग मारे जाते और वह नहीं चाहते क्योंकि ड्रोन के गिराए जाने से किसी की मौत नहीं हुई थी। क्या ट्रंप वाकई ऐसे दरियादिल हैं या उन्हें लगा कि ऐसा करने से युद्ध छिड़ ही जाएगा जो वह नहीं चाहते?
यूरोपीय संघ के विदेश मामलों की प्रमुख फ़ेडरिक मोरेगेनी ने ट्रंप की घोषणा के तुरन्त बाद संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंटोनियो गुटरिस से फ़ोन पर बात की और उनसे मध्य-पूर्व में तनाव कम करने के लिए पूरी कोशिश करने की गुजारिश की।
उन्होंने कहा, ‘यह सबसे अधिक संयम बरतने और बुद्धिमत्ता दिखाने का समय है।’

घरेलू विरोध

इसके अलावा ट्रंप को ख़ुद अपने देश में पूरा समर्थन नहीं मिल रहा है, विरोध के स्वर सुनाई पड़ने लगे हैं। हाउस ऑफ रीप्रेजेन्टेटिव्स की स्पीकर और पूर्व माइनॉरिटी लीडर यानी विपक्ष की नेता नैन्सी पलोसी ने कह दिया कि राष्ट्रपति को पूरी बात सदन के सामने रखनी चाहिए और कोई कदम उठाने के पहले सदन को विश्वास में लेना चाहिए। उन्होंने ईरान पर भरोसा नहीं करने की बात कही, मौजूदा ईरानी सरकार को ख़तरनाक क़रार दिया, पर लड़ाई छेड़े जाने का समर्थन नहीं किया।  
हाउस ऑफ़ रीप्रेजेन्टेटिव्स की स्पीकर नैन्सी पलोसी ने संकेत दे दिया कि सदन इस मुद्दे पर ट्रंप प्रशासन के साथ नहीं है। इसके पहले ही अमेरिका में ईरान के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं और लोगों ने माँग की है कि देश को युद्ध में न झोंका जाए।

उन्माद की क़ीमत

युद्ध हो या न हो, युद्धोन्माद खड़ा किया जा चुका है। मध्य-पूर्व में और सैनिक भेजे जाने की घोषणा और अरैमको पर साइबर हमले की आशंका के मद्देनज़र अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ना तय है। ट्रंप ने 40 मिनट की मुलाक़ात के बाद भले कह दिया हो कि वह और नरेंद्र मोदी ‘बहुत अच्छे दोस्त बन चुके हैं’, भारत को इस युद्धोन्माद की क़ीमत चुकानी पड़ेगी। 

ट्रंप के एलान का असर कच्चे तेल के बाज़ार के व्यवहार से समझा जा सकता है। उनके ऐलान के तुरन्त बाद ब्रेन्ट तेल की क़ीमत 60 रुपये प्रति बैरल से उछल कर 66 प्रति डॉलर पर जा पहुँची, दिन के अंत में यह 64.87 प्रति बैरल पर थी। भारत में मंगलवार की सुबह यह ख़बर लिखी जाते समय ब्रेन्ट की क़ीमत 64.81 डॉलर प्रति बैरल थी। यानी एक दिन में इसकी क़ीमत में तकरीबन 8-9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। 

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तेल बाज़ार में लगेगी आग?

मामला इतना ही नहीं है। तेल संकट बढ़ना तय है। कच्चा तेल निर्यात करने वाले देशों के संगठन पेट्रोलियम निर्यातक देश संगठन यानी ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज़ या ओपेक ने उत्पादन में कटौती करने के संकेत दे दिए हैं। ईरान और ओमान को जोड़ने वाली ओमान की खाड़ी और उसके बगल के स्ट्रेट ऑफ़ होरमुज़ तेल टैंकरों का वह रास्ता है, जिससे लगभग 30 प्रतिशत तेल के जहाज गुजरते हैं। 
होरमुज़ स्ट्रेट और और ओमान की खाड़ी
ईरान पर आरोप है कि उसने स्ट्रेट ऑफ़ होरमुज़ में दो टैंकरों में विस्फोटक लगा दिए। तेहरान ने इससे इनकार किया है। सोमवार को अमेरिकी रक्षा विभाग ने कुछ तसवीरें जारी कर दावा किया है कि इन तसवीरों में ईरानी नावें टैंकरों में विस्फोटक लगाती दिख रही हैं। बीमा कंपनियों ने कह दिया है कि वे इस रास्ते जाने वाले टैंकरों पर प्रीमियम बढ़ाने जा रही हैं। 
अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से वेनेज़ुएला का तेल बाज़ार पहले ही बंद है, नॉर्वे का तेल यूरोप में खप जाता है, अमेरिका के पास भले ही बड़ा भंडार हो, वह ख़ुद सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है। मध्य-पूर्व को छोड़ तेल कहाँ से आएगा?
और इस पर अरैमको या किसी दूसरी सऊदी तेल कंपनी पर वाक़ई साइबर हमला हो गया तो तेल बाज़ार में जो आग लगेगी, वह कल्पना से परे है। साइबर हमले की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। यदि अमेरिकी सैनिकों ने किसी तरह का कोई मामूली हमला भी ईरान के किसी ठिकाने पर भूल से भी कर दिया या अमेरिकी ड्रोन ने किसी ईरानी लक्ष्य को निशाना बना लिया तो ईरान के पास साइबर हमले का कोई विकल्प नहीं होगा। यह उसके लिए सस्ता भी होगा और आसान भी, इसका असर भी अमेरिकी व्यावसायिक हितों पर होगा। पर इसका ख़ामियाज़ा दुनिया भुगतेगी, भारत इससे अछूता नहीं रहेगा। 

क़ीमत चुकाएगा भारत?

एक मोटे अनुमान के मुताबिक़, यदि ईरान संकट ज़्यादा गहराया और यदि ओपेक ने तेल उत्पादन में कटौती कर दी तो अंतरराष्ट्रीय तेल बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत 100 डॉलर प्रति बैरल तक आसानी से चली जाएगी। इसके ऊपर बढ़े हुए प्रीमियम का ख़र्च अलग है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत 1 डॉलर बढ़ने से भारत को सालाना 10,700 करोड़ रुपये अतिरिक्त ख़र्च करना होता है। इस हिसाब से यदि तेल 90 डॉलर भी पहुँचा तो भारत को लगभग 3,21,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त ख़र्च साल भर में करना पड़ेगा।
भारत के पड़ोसी देश और अमेरिका के सबसे बड़े बिज़नेस पार्टनर चीन ने अमेरिकी प्रतिबंधों को धता बताते हुए ईरान से तेल ख़रीदना जारी रखा है। संकट में फँसा तेहरान इस कम्युनिस्ट देश को बाज़ार से कम क़ीमत पर भी तेल दे सकता है। चीन की मिलीभगत से ईरान थोड़ा-बहुत तेल तस्करी के ज़रिए आसपास के छोटे-मोटे देशों को भी दे सकता है। वे सब फ़ायदे में रहेंगे। पर भारत का क्या होगा? 

भारत का आयात बिल बढ़ेगा, रुपये का अवमूल्यन होगा, चालू खाते का घाटा बढ़ेगा, बजट में वित्तीय घाटा बढेगा और सकल घरेलू उत्पाद पर इसका असर पड़ना लाज़िमी है। यह सब उस वक़्त होगा जब भारत पहले से ही आर्थिक बदहाली से जूझ रहा है। नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है, बैंकिग व्यवस्था फटेहाल है, ख़पत और उत्पादन गिर चुके हैं, बेरोज़गारी चरम पर है, लेकिन सरकार और उससे जुड़े हुए लोगों का कहना है कि अच्छे दिन आ चुके हैं। बस, तेल देखिए और तेल की धार देखिए। 

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