इटली ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने से इनकार कर दिया है। इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने एएनएसए न्यूज एजेंसी को बताया कि उनके देश का संविधान इस बोर्ड में शामिल होने की इजाजत नहीं देता। यह ट्रंप के इस नए अंतरराष्ट्रीय शांति संगठन के लिए एक और बड़ा झटका है।

ट्रंप ने जनवरी में स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच पर इस बोर्ड की शुरुआत की थी। शुरू में यह ग़ज़ा पट्टी में युद्ध के बाद शांति और पुनर्निर्माण के लिए बनाया गया था। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी इसे मंजूरी दी थी। लेकिन अब इसका चार्टर बहुत बड़ा हो गया है। इसमें ग़ज़ा का ज़िक्र तक नहीं है और यह दुनिया भर में संघर्ष सुलझाने का दावा करता है। ट्रंप खुद इसके चेयरमैन हैं और उनके पास वीटो पावर है, यानी बोर्ड के फ़ैसलों पर भी अंतिम फैसला लेने का अधिकार ट्रंप के पास है।

इटली क्यों नहीं जुड़ रही?

विदेश मंत्री ताजानी ने कहा कि इटली के संविधान के आर्टिकल 11 में साफ़ लिखा है कि इटली किसी ऐसे अंतरराष्ट्रीय संगठन में शामिल नहीं हो सकती जहां सभी देशों के साथ बराबरी न हो। बोर्ड ऑफ पीस के चार्टर में ट्रंप को चेयरमैन बनाया गया है और वे ही सब कुछ तय करते हैं। इससे इटली को बराबरी नहीं मिलती। ताजानी ने इसे क़ानूनी रूप से असंभव बताया है। उन्होंने कहा कि इटली हमेशा शांति की पहल में बात करने को तैयार है, लेकिन इस बोर्ड में शामिल नहीं हो सकती।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ट्रंप की अच्छी दोस्त हैं। फिर भी इटली यह कदम नहीं उठा पाई। पिछले महीने भी मेलोनी ने संवैधानिक समस्या बताई थी।

यूरोप के अन्य देशों का रुख

फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे कई यूरोपीय देश भी इस बोर्ड में नहीं जुड़े हैं। वे चिंतित हैं कि यह संयुक्त राष्ट्र की जगह ले सकता है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी ट्रंप की योजना की आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की जिम्मेदारी संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद की है।

बोर्ड की सदस्यता और मीटिंग

ट्रंप ने क़रीब 60 देशों को शामिल होने का न्योता दिया था। अभी तक इसकी वेबसाइट पर कतर, मिस्र, हंगरी, सऊदी अरब जैसे 26 देश जुड़े हैं। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि स्थायी सदस्य बनने के लिए 1 अरब डॉलर देने पड़ सकते हैं, जिसकी वजह से इसे 'पे टू प्ले' वाला यूएन कहा जा रहा है।

बोर्ड की पहली मीटिंग 19 फरवरी को वॉशिंगटन डीसी में होने वाली है। इसके एक दिन पहले ट्रंप की इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मुलाकात भी तय है। हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान, जो ट्रंप के क़रीबी हैं, भी इस मीटिंग में जाने की बात कह चुके हैं।
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इटली की योजना क्या?

ताजानी ने कहा कि इटली ग़ज़ा में पुलिस ट्रेनिंग देकर अपना हिस्सा निभाने को तैयार है। उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से मिलकर इसे बेहद सकारात्मक बताया।

यह फैसला दिखाता है कि भले ही कुछ देश ट्रंप के साथ अच्छे संबंध रखते हों, लेकिन संवैधानिक और कानूनी वजहों से वे उनके नए संगठन में शामिल नहीं हो पा रहे। दुनिया भर में इस बोर्ड को लेकर बहस जारी है कि यह सच में शांति लाएगा या संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को कमजोर करेगा।