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कौन हैं नेफ़्टाली बेनेट, कितना प्रभावित करेंगे इज़रायल, फ़लस्तीन को?

दो साल तक बिन्यामिन नेतन्याहू के सहयोगी रह चुके और बाद में वैचारिक मतभेद होने के कारण उनका हाथ और लिकुड पार्टी का साथ छोड़ने वाले नेफ़्टाली बेनेट ने उस समय यह बिल्कुल नहीं सोचा होगा कि वे एक दिन नेतन्याहू को हटा कर उनकी जगह ले लेंगे। 

पश्चिमी तट पर यहूदियों की बस्तियाँ बनाने वाले और उसका विरोध करने पर ताबड़तोड़ मिसाइल हमले कर हमास ही नहीं, कई शांतिप्रिय फ़लस्तीनियों को मौत के मुँह में धकेलने वाले बिन्यामिन की जगह  जो व्यक्ति आ रहे है, वह उनसे भी अधिक कट्टर और राष्ट्रवादी हैं।

खुद नेफ़्टाली बेनेट ने इसकी पुष्टि की है। उन्होंने कहा है,

मैं बीबी से अधिक दक्षिणपंथी हूँ, पर मै उनकी तरह अपनी राजनीति चमकाने के लिए नफ़रत और ध्रुवीकरण का इस्तेमाल नहीं करता।


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दो साल तक रहेंगे प्रधानमंत्री

बता दें कि बिन्यामिन नेतन्याहू को लोग प्रेम से 'बीबी' कहते हैं।

आठ विरोधी दलों के बीच हुए समझौते के अनुसार, यामिन पार्टी के बेनेट अभी प्रधानमंत्री बनेंगे और दो साल बाद येर लापिड उनकी जगह लेंगे। बेनेट धुर दक्षिणपंथी हैं तो लापिड को केंद्रीय यानी सेंट्रिस्ट माना जाता है। 

इसराइल के नए प्रधानमंत्री नेफ़्टाली बेनेट ने कहा है कि वह ध्रुवीकरण की शासन शैली को समाप्त करना चाहते हैं, जो नेतन्याहू के शासन की पहचान थी।

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इस नई गठबंधन सरकार में नेफ़्टाली बेनेट की अपनी पार्टी (यामिना पार्टी) के महज़ छह सांसद हैं, लेकिन गठबंधन ने उन्हें अपना नेता चुना है।

फ़लस्तीनियों पर क्या असर होगा

बिन्यामिन नेतन्याहू ने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के विरोध के बावजूद पश्चिमी तट पर यहूदी बस्तियाँ बनानी शुरू कर दीं, जो तकनीकी रूप से अवैध है क्योंकि वह इलाक़ा इज़रायल का नहीं है। 

neftali bennet to imapct israel, palestine - Satya Hindi

फ़लस्तीन को खारिज करते हैं बेनेट

नेफ़्टाली इससे दो कदम आगे हैं, उन्होंने खुले आम कहा कि इज़रायल सरकार को पश्चिमी तट का अधिग्रहण कर लेना चाहिए। 

नेफ़्टाली बेनेट के लिए यह कोई नहीं बात नहीं है, वे यही बात 2013 से ही कह रहे हैं।

लेकिन बेनेट इससे भी दो कदम आगे हैं। वे खुले आम दो-राष्ट्र के सिद्धांत को खारिज करते हैं। वे बिन्यामिन नेतन्याहू से इस मामले में बहुत अधिक कट्टर हैं।

नेतन्याहू दो राष्ट्र के सिद्धान्त यानी यहूदियों के लिए इज़रायल और मुसलिमों के लिए फ़लस्तीन अलग-अलग देश को स्वीकार करते हैं। वे इस दिशा में आगे नहीं बढ़ रहे हैं, बल्कि इसकी राह में कई तरह के रोड़े अटकाते हैं। पर वे इस सिद्धान्त को खारिज नहीं करते।

नेफ़्टाली बेनेट अरब मुसलमानों के अलग राज्य फ़लस्तीन को ही नहीं मानते और कहते हैं कि एक ही देश हो और वह हो इज़रायल।

क्या करेगा हमास?

इसलिए बिन्यामिन नेतन्याहू के पद से हटना फलस्तीनियों या उनके समर्थकों के लिए अच्छी खबर नहीं है।

बेनेट इसके अलावा पूर्वी यरूशलम और  गोलान की पहाड़ियों पर भी दावे करते हैं और ज़ोर देकर कहते हैं कि ये सारे इलाक़े यहूदियों के हैं और इज़रायल को उन पर कब्जा कर लेना चाहिए।

गोलान की पहाड़ियाँ सीरिया का हिस्सा थीं, जिसे 1967 के युद्ध में इज़रायल ने उससे छीन लिया था। 

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बेनेट बाहर से आकर बसे हुए यहूदियों के राजनीतिक दल येशा कौंसिल के अध्यक्ष रह चुके हैं, वे यहूदियों के धार्मिक धरहरों और इतिहास का हवाला देते हैं। 

वे फ़लस्तीनियों को किसी तरह की रियायत देने के पक्ष में नहीं हैं। वे हर हाल में फ़स्तीन राज्य का विरोध करते हैं। 

यह अजीब संयोग है कि नेफ़्टाली बेनेट जैसा कट्टर व्यक्ति जिस समय इज़रायल का प्रधानमंत्री बना है, उसके कुछ समय पहले ही अरब के तीन मुसलिम देशों ने इज़रायल को मान्यता दी है और उसके साथ रिश्ते कायम करने पर राजी हुए हैं। 

यह भी संयोग है कि जिस समय हमास और इज़रायल दोनों ने एक-दूसरे पर मिसाइल हमले किए, जिसमें दोनों ही पक्षों के लोग मारे गए और बड़े पैमाने पर सामान्य नागरिकों की मौत हुई, उसके बाद इज़रालय की बाग़डोर एक ऐसे आदमी के हाथों गई जो इन सब कामों को अंजाम देने वालों से अधिक कट्टर है। 

हमास जिस बिन्यामिन नेतन्याहू को ही अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है, उसे अब नेतन्याहू से भी अधिक कट्टर व्यक्ति से लोहा लेना होगा। 

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