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कश्मीर : इस बार भी संयुक्त राष्ट्र में मुँह की खाएगा पाक?

क्या पाकिस्तान एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपनी फ़जीहत कराना चाहता है? वह अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से समर्थन नहीं मिलने के बावजूद यह मुद्दा सुरक्षा परिषद क्यों ले जा रहा है? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद की इमर्जेंसी बैठक बुलाने की माँग औपचारिक रूप से कर दी है। उसने कहा है कि कश्मीर में भारत के कदम से क्षेत्र में शांति को ख़तरा है और इसलिए इस मुद्दे पर इमर्जेंसी बैठक बुलाई जाए। 
इसलामाबाद ने मंगलवार को इसका नोटिस दे दिया है। विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने एक चिट्ठी सुरक्षा परिषद को लिखी है। सुरक्षा परिषद ने इस नोटिस पर अब तक औपचारिक रूप से कुछ नहीं कहा है। लेकिन इसके दो दिन पहले जब पाकिस्तानी प्रतिनिधि ने सुरक्षा परिषद के मौजूदा अध्यक्ष से मुलाक़ात की थी तो उन्होंने साफ़ कह दिया था कि यह द्विपक्षीय मामला है। सुरक्षा परिषद में 5 स्थायी और 10 अस्थायी सदस्य होते हैं। मौजूदा अध्यक्ष पोलैंड है। 
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चीन का समर्थन

इसके पहले पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी इस मुद्दे पर समर्थन हासिल करने के लिए चीन गए थे। चीनी विदेश मंत्री यांग ली ने यह तो कहा था कि कश्मीर से जुड़ा भारत का हालिया कदम ग़लत है और इस मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के मुताबिक निपटाया जाना चाहिए, पर उन्होंने इसके साथ यह भी कहा था कि इस मसले पर शिमला समझौते को ध्यान में रखना चाहिए। एक तरह से उन्होंने पाकिस्तान का समर्थन तो किया, पर भारत की संवेदना का भी ख्याल रखा था।
पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने पाकिस्तान टेलीविज़न को एक इंटरव्यू में कहा था, 'सुरक्षा परिषद में कोई माला लिए पाकिस्तान के स्वागत में खड़ा नहीं है। इस मामले में हमें व्यावहारिक होना चाहिए।'
वह अपने हमवतन नेताओं से कहना चाहते थे कि इस मुद्दे पर कम से कम इस समय पाकिस्तान के समर्थन में कोई नहीं है। 

क्या करेगा चीन?

अब सवाल यह है कि यदि सुरक्षा परिषद ने बैठक बुला ही ली तो क्या होगा। पहला सवाल यह है कि क्या चीन इस बार पाकिस्तान का समर्थन करेगा? इसकी संभावना कम इसलिए है कि कु़रैशी की इस बैठक के एक दिन बाद ही भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर बीजिंग में थे। उनकी यह यात्रा महीने भर पहले ही तय हुई थी। इस यात्रा के दौरान यह तय हुआ कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग दिसबंर में भारत की यात्रा पर आएंगे। यह फ़ैसला क़ुरैशी के बीजिंग से लौटन के बाद हुआ। यानी, क़ुरैशी के जाने के बाद यह तय हुआ कि चीनी राष्ट्रपति दिल्ली का दौरा करेंगे। 
बीजिंग अपने राष्ट्रपति की दिल्ली यात्रा के पहले भला क्यों माहौल बिगाड़ेगा और भारत के साथ रिश्ते कटु क्यों करेगा और वह भी ऐसे मुद्दे पर जिससे उसे कोई फ़ायदा नहीं होने को है?

व्यावसायिक हित

चीन इसलिए भी दिल्ली को नाराज़ नहीं करना चाहेगा कि भारत में जल्द ही 5-जी दूरसंचार प्रणाली शुरू होना है। चीन अपनी सरकारी कंपनी ह्वाबे को किसी तरह यह ठेका दिलवाना चाहता है। इस दौड़ में अमेरिकी कंपनियाँ भी हैं। भारत ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं, पर यदि चीन ने बीच में बखेड़ा किया तो यह ठेका उसके हाथ से निकल जाएगा। चीन ऐसा नहीं चाहेगा। 
चीन के दूसरे व्यावसायिक हित भी हैं। वह भारत में अपना उत्पादन केंद्र बनाना चाहता है ताकि यहाँ के सस्ते श्रम का इस्तेमाल कर वह सस्ते उत्पाद बनाए और यूरोप व अफ्रीका तक उन्हें बेचे। इसमें फ़ायदा भारत को भी है। पर इसके लिए यह भी ज़रूरी है कि वह भारत की संवेदना को समझे। जयशंकर ने चीनी विदेश मंत्री के साथ बातचीत के बाद इसी ओर संकेत करते हुए कहा था कि दोनों देश एक दूसरे की संवेदनाओं को समझें, यह बेहतर रिश्ते के लिए ज़रूरी है। 

अमेरिका देगा पाकिस्तान का साथ?

फिर कौन पाकिस्तान का समर्थन करेगा? अमेरिका के साथ दिक़्क़त यह है कि उसके अपने व्यावसायिक हित भी भारत के ही साथ हैं। भारत के बड़े बाज़ार पर उसकी नज़रें हैं। भारत को होने वाले अमेरिकी निर्यात में कमी आई है, उसे इसे भी दुरुस्त करना है। कुछ दिन पहले ही अमेरिका ने भारत को जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रीफरेंसेंज से बाहर कर दिया था। यानी, भारत को मिल रही रियायतें ख़त्म कर दी थीं। भारत ने इसके बदले में अमेरिका आयात पर शुल्क बढ़ा दिया था। अमेरिका इसे ठीक करना चाहता है, वह नए झमेले में नहीं पड़ना चाहेगा। 
पाकिस्तान इस बात को समझता है। शाह महमूद क़ुरैशी ने इसी लिए ही कहा था, 'कोई भी देश पाकिस्तानी प्रस्ताव को वीटो कर सकता है।' तो क्या इसलामाबाद को डर है कि अमेरिका उसके प्रस्ताव को वीटो कर सकता है। इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। 
इसके बावजूद पाकिस्तान सुरक्षा परिषद जा रहा है तो इसलिए कि उस पर घरेलू दबाव है। वहाँ विपक्ष ने उस पर दबाव बना रखा है और आरोप लगाया है कि वह भारत के ख़िलाफ़ पर्याप्त कदम नहीं उठा रहा है। इसे इससे भी समझा जा सकता है कि विपक्षी दल पाकिस्तान मुसलिम नवाज़ की नेता मरियम नावज़ ने इमरान ख़ान पर हमला करते हुए कहा था कि कश्मीर पर भारत ने इतना बड़ा फ़ैसला ले लिया और पाकिस्तान को भनक तक नहीं लगी। उसके बाद से इमरान सरकार पर दबाल लगातार बढ़ रहा है। सरकार को यह साबित करना है कि वह इस मुद्दे पर भारत के साथ सख़्ती से निपट रही है और वह सब कुछ कर रही है जो वह कर सकती है। 
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