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आतंकवाद के ख़िलाफ़ क़दम उठाने पर मजबूर पाक, हाफ़िज़ पर की कार्रवाई

क्या पाकिस्तान वास्तव में आतंकवाद के ख़िलाफ़ सख़्त एक्शन लेना चाहता है या अंतरराष्ट्रीय दबाव में मजबूर होकर उसे ऐसा करना पड़ रहा है। यह सवाल इसलिए पूछा जा रहा है क्योंकि उसने आतंकवादी संगठन जमात-उद-दावा के मुखिया हाफ़िज़ सईद और कई अन्य आतंकवादी संगठनों के लोगों के ख़िलाफ़ 23 मुक़दमे दर्ज किए हैं। इनके ख़िलाफ़ आतंकवादी गतिविधियों के लिए धन उपलब्ध कराने (टेरर फ़ंडिंग) के आरोपों के चलते यह कार्रवाई की गई है। पाकिस्तान की ओर से उठाए गए इस क़दम पर अभी तक भारत की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
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बता दें कि टेरर फ़ंडिंग रोकने के लिए गठित फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफ़एटीएफ़) ने हाल ही में बेहद सख़्त शब्दों में पाकिस्तान से कहा था कि वह सितंबर 2019 से पहले आतंकवादी समूहों की फ़ंडिंग को रोकने के लिए अपनी कार्य योजना को लागू करे। एफ़एटीएफ़ कह चुका है कि पाकिस्तान आतंकवाद को मिलने वाले आर्थिक समर्थन को रोकने में नाकाम रहा है। इसके बाद भारत ने भी कहा था कि पड़ोसी देश को आतंकवाद से संबंधित वैश्विक चिंताओं को दूर करने के लिए विश्वसनीय और ठोस क़दम उठाने चाहिए।
पाकिस्तानी मीडिया के मुताबिक़, पंजाब आतंकवाद निरोधक विभाग ने जमात-उद-दावा, लश्कर-ए-तैयबा, फ़लाह-ए-इंसानियत फ़ाउंडेशन के ख़िलाफ़ यह कार्रवाई की है। बताया गया है कि इन संगठनों को दावातुल इरशाद ट्रस्ट, मोएज बिन जबाल ट्रस्ट, अल-अनफ़ाल ट्रस्ट, अल हमाद ट्रस्ट और अल मदीना फाउंडेशन ट्रस्ट से पैसा मिलता था। विभाग ने कहा है कि यह मुक़दमे लाहौर, गुजरांवाला और मुल्तान में दर्ज किए गए हैं।
इन मामलों में जमात-उद-दावा और लश्कर-ए-तैयबा के जिन लोगों को नामजद किया गया है, उनमें हाफ़िज़ सईद, उसके सहयोगी अब्दुल रहमान मक्की, अमीर हमजा, मुहम्मद याहया अज़ीज़, मुहम्मद नईम, मोहसिन बिलाल, अब्दुल रक़ीब, मुहम्मद अयूब आदि लोग शामिल हैं। 
प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की जनवरी में हुई बैठक में जमात-उद-दावा और फ़लाह-ए-इंसानियत फ़ाउंडेशन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश पहले ही दिया जा चुका है। 
आतंकवाद निरोधक विभाग ने कहा है, ‘जमात-उद-दावा, लश्कर और फ़लाह-ए-इंसानियत फ़ाउंडेशन के ख़िलाफ़ आतंकवाद के लिए धन जुटाने के लिए ट्रस्टों का उपयोग करने को लेकर बड़े पैमाने पर जाँच शुरू की गई है। इन संगठनों ने इन संपत्तियों को आतंकवाद के लिए मिलने वाले धन से बनाया है और इन्हें और अधिक धन जुटाने के लिए इस्तेमाल किया। इसलिए, उन्होंने आतंकवाद विरोधी अधिनियम 1997 के तहत आतंकवाद के वित्तपोषण और धन शोधन के तहत कई अपराध किए हैं। इन अपराधों के तहत एटीसी (आतंकवाद विरोधी अदालत) में मुक़दमा चलाया जाएगा। इन संपत्तियों को संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के अनुपालन में सरकार द्वारा पहले ही अपने कब्जे में ले लिया गया है।’
21 जून को औरलैंडो में हुई एफ़एटीएफ़ की बैठक में पाकिस्तान इस संगठन के तीन सदस्य देशों का साथ पाकर ब्लैक लिस्ट होने से बच गया था लेकिन अगर वह वास्तव में ब्लैक लिस्ट नहीं होना चाहता है तो उसे आतंकवाद के ख़िलाफ़ लगातार सख़्त क़दम उठाने होंगे।
हालाँकि पाकिस्तान कोशिश कर रहा है कि वह एफ़एटीएफ़ की ब्लैक लिस्ट में आने से बच जाए। इसलिए मार्च में उसने प्रतिबंधित संगठनों के 44 सदस्यों को जाँच के लिए हिरासत में ले लिया था। इसमें आतंकवादी संगठन मसूद अज़हर के भाई मुफ़्ती अब्दुल रऊफ़ और हमाद अज़हर का नाम भी शामिल है।
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फ़रवरी में जम्मू-कश्मीर में हुए पुलवामा हमले के बाद भी भारत ने पाकिस्तान से बेहद सख़्त शब्दों में कहा था कि वह आतंकवाद के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करे। पुलवामा हमले के जवाब में भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में सर्जिकल स्ट्राइक की थी। तब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भरोसा दिलाया था कि पाकिस्तान अपनी ज़मीन का एक इंच भी आतंकवाद के लिए इस्तेमाल नहीं होने देगा। 

2008 में हुए मुंबई हमले में हाफ़िज़ सईद का हाथ था। 2001 में भारतीय संसद पर हुए हमले में भी हाफ़िज़ के संगठन का नाम आया था। भारत सहित अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, रूस और ऑस्ट्रेलिया ने जमात-उद-दावा को प्रतिबंधित कर रखा है। 

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