यदि ईरान में सत्ता परिवर्तन हुआ तो क्या यह भारत के लिए बड़ा झटका होगा? आख़िर पाकिस्तान और चीन को किस तरह से फायदा होगा?
ईरान का मौजूदा नेतृत्व आर्थिक और राजनीतिक उथल-पुथल से उपजे बड़े विरोध प्रदर्शनों को रोकने में संघर्ष कर रहा है। देश में बड़े पैमाने पर हिंसा हो रही है और इस बीच लगातार डोनाल्ड ट्रंप के बयान भी आ रहे हैं। इस बीच कयास तो यहाँ तक लगाए जा रहे हैं कि ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिश हो रही है। यदि ऐसा हुआ तो यह भारत के लिए कितना बुरा होगा? कहीं सत्ता परिवर्तन से पाकिस्तान और चीन फ़ायदे में तो नहीं रहेंगे और भारत के लिए मुश्किलें तो नहीं बढ़ेंगी?
यह सवाल भारत की विदेश नीति के गलियारे में लगातार कौंध रहा है। ऐसे में भारत हालात पर नजर रखे हुए है। भारत और ईरान के बीच सदियों पुराने गहरे संबंध रहे हैं। पाकिस्तान भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया जाने के लिए जमीन के रास्ते रोकता है, इसलिए ईरान भारत के लिए पश्चिमी दिशा का एकमात्र भरोसेमंद रास्ता रहा है। ईरान की शिया सरकार ने हमेशा पाकिस्तान के प्रभाव को संतुलित किया है, जिससे भारत की पश्चिम एशिया नीति मजबूत बनी रही।
अब यदि ईरान में कमजोर या गिरने वाली सरकार आती है तो भारत का क्षेत्रीय रणनीतिक स्थान सिकुड़ सकता है। बांग्लादेश में सत्ता का बदलाव, पाकिस्तान से आतंक की चुनौतियां, चीन का बढ़ता विस्तार और अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां पहले से ही दुनिया को संकट में डाल रही हैं। अस्थिर ईरान से कूटनीति, व्यापार मार्ग और सुरक्षा की स्थिति पूरी तरह बदल सकती है।
ईरान भारत के लिए क्यों अहम है?
पाकिस्तान भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया का जमीन रास्ता नहीं देता, इसलिए ईरान का चाबहार पोर्ट भारत के लिए बहुत खास है। यह पोर्ट भारत को ईरान के तट से सीधे जोड़ता है और फिर जमीन व रेल से मध्य एशिया तक पहुंचाता है, बिना किसी पाकिस्तानी मार्ग के ही।चाबहार जैसे कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स में राजनीतिक स्थिरता, सुरक्षा और लंबी योजना ज़रूरी है। अगर तेहरान में सत्ता बदलाव हुआ तो चाबहार अस्थिरता का शिकार बन सकता है।
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राजन कुमार ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा, 'खामेनेई के बाद सत्ता की लड़ाई में चाबहार अस्थिरता का शिकार हो सकता है।'
पाकिस्तान को फायदा कैसे?
ईरान मुस्लिम देश होने के बावजूद पाकिस्तान के प्रभाव को संतुलित करता रहा है। शिया नेतृत्व ने पाकिस्तान में सुन्नी उग्रवादी समूहों की आलोचना की, जो भारत विरोधी नैरेटिव फैलाते हैं। 1990 और 2000 के दशक में पाकिस्तान समर्थित तालिबान को रोकने में ईरान और भारत साथ थे। ईरान ने कश्मीर पर पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय दबाव में भी भारत का साथ दिया। अगर ईरान कमजोर हुआ तो पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारत का क्षेत्रीय रणनीतिक क़दम कम हो जाएगा, और पाकिस्तान को अप्रत्यक्ष फायदा होगा।
भारत ईरान व्यापार पर असर
भारत ईरान का आठवाँ सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। पिछले साल दोनों देशों के बीच 1.3 से 1.7 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। भारत ने चाबहार और संबंधित प्रोजेक्ट्स में 1 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश किया है। अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से कुछ देरी हुई, लेकिन अस्थिरता से ये निवेश ख़तरे में पड़ सकते हैं।
चीन का बढ़ता असर
ईरान पाकिस्तान के मामले में भारत का साथ देता है, लेकिन चीन के साथ उसका झुकाव भी साफ़ है। 2021 में चीन और ईरान ने 25 साल का रणनीतिक समझौता किया। 2025 में चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था, जहां 14.5 अरब डॉलर से ज्यादा ईरानी सामान चीन गया। पश्चिमी प्रतिबंधों से ईरान की अर्थव्यवस्था कमजोर है, इसलिए वो चीन पर निर्भर है। भारत का चाबहार में होना चीन के बढ़ते प्रभाव को थोड़ा संतुलित करता है। लेकिन अस्थिरता में नई सरकार भी सुरक्षा और निवेश के लिए चीन की तरफ ज्यादा झुकेगी।
भारत का अगला कदम क्या हो?
अमेरिका, चीन और श्रीलंका में राजदूत रह चुकीं पूर्व भारतीय राजनयिक निरुपमा मेनन राव ने एक्स पर पोस्ट में कहा कि भारत को ईरान के साथ सावधानी और संतुलित रुख अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा, 'स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि बाहर के देश नतीजे को नियंत्रित नहीं कर सकते। पहला काम है भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, कांसुलर तैयारी और आपात योजना बनाना।'उन्होंने कहा है कि भारत को सभी पक्षों से घटनाक्रम देखना चाहिए, जल्दबाजी में निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए और कई संभावित नतीजों पर विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा, 'महत्वपूर्ण है तैयारी: समझना कि ये कहां जा सकता है, क्या असर पड़ सकते हैं और संवाद के चैनल खुले रखने हैं।'
अगर ईरान लंबे समय तक अस्थिर रहा या टूट गया, तो इसका असर ऊर्जा बाजार, शिपिंग रूट्स, प्रवासी और उग्रवाद पर पड़ेगा। दक्षिण एशिया इससे अलग नहीं रहेगा। इसलिए भारत को रणनीतिक सावधानी, निरंतर जुड़ाव और लगातार मूल्यांकन की ज़रूरत है।