बांग्लादेश में बीएनपी की सरकार। यानी भारत के लिए सबसे बुरे में सबसे बेहतर विकल्प। तो यह बेहतर विकल्प भारत के लिए कैसा होगा? क्या यह खालिदा जिया के कार्यकाल की तरह होगा जहाँ बांग्लादेश में हर समस्या के लिए भारत पर आरोप लगाया जाता था और भारत-विरोधी नैरेटिव चलाया जाता था? या फिर बीएनपी नये अवतार में सामने आएगी और भारत के साथ संबंध बेहतर बनाकर अवसर को भुनाएगी?

इन सवालों के जवाब बांग्लादेश में हुए चुनाव के दौरान और चुनाव नतीजों के बाद बीएनपी और पार्टी प्रमुख तारिक रहमान के रुख से मिल सकता है। तो आइए जानते हैं कि बांग्लादेश के चुनाव नतीजे क्या हैं, बीएनपी व तारिक रहमान के रुख क्या हैं और यह भारत के प्रति उसके अपने शुरुआती रुख से अलग कैसे है।

बांग्लादेश में हुए आम चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी ने बड़ी जीत हासिल की है। पार्टी ने संसद की 299 सीटों में से कम से कम 200 से ज़्यादा सीटें जीती हैं, जो दो-तिहाई बहुमत है। यह जीत 20 साल बाद बीएनपी की सत्ता में वापसी है। पार्टी के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान अब बांग्लादेश के अगले प्रधानमंत्री बनने की राह पर हैं। उन्होंने ढाका-17 और बोग्रा-6 सीटों से चुनाव जीता है। इस जीत के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को बधाई दी है। बीएनपी ने भी भारत का शुक्रिया अदा किया और मज़बूत रिश्तों की उम्मीद जताई। तो सवाल है कि क्या बीएनपी अपने पहले के रवैये से अलग हटकर भारत के साथ संबंध बेहतर करेगा? आख़िर पहले बीएनपी का भारत के साथ रुख कैसा रहा था?
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बीएनपी का भारत के प्रति रुख

बीएनपी की स्थापना 1978 में जियाउर रहमान ने की थी, जो भारत से दूरी और संप्रभुता पर जोर देती थी। बीएनपी की विचारधारा इस्लामी राष्ट्रवाद और 'बांग्लादेश फर्स्ट' पर आधारित है। यह अवामी लीग की भारत-समर्थक, सेक्युलर नीति से अलग थी।

खालिदा जिया के कार्यकाल 1991-96 और 2001-06 में संबंध सबसे ख़राब रहे। भारत ने बीएनपी पर आरोप लगाया कि वह उत्तर-पूर्व के उग्रवादी गुटों को शरण देती है, बॉर्डर पर घुसपैठ और आतंकवाद को बढ़ावा देती है। बीएनपी ने भारत पर बॉर्डर किलिंग्स, पानी बंटवारे और ट्रांजिट जैसे मुद्दों पर कड़ी आलोचना की। 2001-06 में बीएनपी-जमात गठबंधन के दौरान संबंध निचले स्तर पर पहुंच गए।

अवामी लीग की शेख हसीना के दौर 2009-2024 में अवामी लीग की भारत-समर्थक नीतियों के कारण बीएनपी को विपक्ष में रहते हुए भारत-विरोधी नैरेटिव अपनाना पड़ा। बीएनपी को पाकिस्तान की आईएसआई से जुड़ा माना जाता था। अवामी लीग भारत-समर्थक थी, जबकि बीएनपी भारत को संदेह की नज़र से देखती रही।

लेकिन 2024-2025 में एक बड़ा टर्निंग पॉइंट आ गया। अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन से शेख हसीना की सरकार गिरी और वे भारत में शरण लेने को मजबूर हुईं। इसके बाद भारत-बांग्लादेश संबंध सबसे खराब दौर में पहुंचे। बीएनपी ने हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की और भारत-विरोधी भावनाओं को भुनाया।

बीएनपी का ताज़ा रुख

हाल के समय में बीएनपी रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रही है। चुनाव घोषणा-पत्र में सीमा और पानी के मुद्दों पर जोर है, लेकिन भारत का नाम लिए बिना। तारिक ने कहा कि बीएनपी भारत से अच्छे रिश्ते चाहती है, लेकिन बांग्लादेश के हित पहले हैं। जमात का प्रभाव और जनता की एंटी-इंडिया भावना चुनौती है, लेकिन माना जा रहा है कि बीएनपी भारत के साथ संबंध बेहतर रखना चाहेगी, क्योंकि यह उसके हित में होगा।

तारिक रहमान का भारत पर रुख

तारिक रहमान ने 'बांग्लादेश फर्स्ट' का नारा दिया है, जो अमेरिका के 'अमेरिका फर्स्ट' जैसा है। वे भारत, चीन और पाकिस्तान से बराबर दूरी रखना चाहते हैं। उन्होंने कहा, 'न दिल्ली, न पिंडी, बांग्लादेश सबसे पहले।' वे रिश्ते सुधारने की बात करते हैं, लेकिन सीमा विवाद, हत्याओं और तीस्ता पानी पर सख्त हैं। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने हाल में ढाका जाकर तारिक से मुलाकात की, जो सकारात्मक संकेत है। तारिक की विचारधारा राष्ट्रवादी है, जो बांग्लादेश की संप्रभुता पर जोर देती है। वे अर्थव्यवस्था-आधारित विदेश नीति चाहते हैं और भारत से 'सम्मान और बराबरी' पर रिश्ते। उनके संकेत बताते हैं कि वे हसीना के समय की 'निर्भरता' से दूर रहेंगे, लेकिन संघर्ष नहीं चाहते।
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पहले तारिक भारत-विरोधी तत्वों से जुड़े माने जाते थे, लेकिन अब सुधार की बात करते हैं। उनकी विचारधारा राष्ट्रवादी है, जो बांग्लादेश की आज़ादी और विकास पर केंद्रित है। वे कट्टरवाद से दूरी रखते हैं, लेकिन जमात से गठबंधन का इतिहास रहा है। उनके संकेत भारत से रिश्ते मजबूत करने के हैं, लेकिन हसीना के प्रत्यर्पण पर जोर भी देते हैं। वह कहते हैं कि बड़ा देश होने के नाते भारत की जिम्मेदारी अधिक है।

तारिक रहमान कौन हैं?

तारिक रहमान बीएनपी के प्रमुख नेता हैं और उन्होंने पार्टी को विदेश से ही चलाया है। तारिक रहमान पूर्व सैन्य शासक और राष्ट्रपति जियाउर रहमान के सबसे बड़े बेटे हैं। उनकी मां खालिदा जिया बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं और दो बार सरकार की प्रमुख रहीं। इस वजह से वे बचपन से ही बीएनपी और अवामी लीग के बीच की कड़वी राजनीतिक लड़ाई के केंद्र में रहे। उनकी राजनीतिक जिंदगी हमेशा जांच के घेरे में रही।

2008 में अवामी लीग की बड़ी जीत के बाद तारिक बांग्लादेश छोड़कर लंदन चले गए। उन्होंने सुरक्षा की चिंता और राजनीतिक उत्पीड़न का हवाला दिया। पिछले क़रीब 17 साल से वे विदेश में रहकर पार्टी की रणनीति बनाते रहे। दक्षिण एशिया की राजनीति में यह एक दुर्लभ मामला है, जिसकी आलोचना भी हुई और उनकी पार्टी पर पकड़ की तारीफ भी हुई।

तारिक रहमान समर्थकों के लिए जियाउर रहमान की विरासत हैं और लोकतंत्र की वापसी का प्रतीक। आलोचकों के लिए वे परिवारवाद और जवाबदेही के अनसुलझे सवाल हैं। अब वे बांग्लादेश की राजनीति के केंद्र में हैं।

बीएनपी की जीत से भारत को फायदा या नुकसान?

यह चुनाव बांग्लादेश के लिए एक नया दौर है, क्योंकि 2024 में युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलन ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से बाहर कर दिया था। अब सवाल यह है कि बीएनपी की जीत से भारत को फायदा होगा या नुकसान?

बांग्लादेश भारत का अहम पड़ोसी है। दोनों देशों के बीच व्यापार, सुरक्षा और सीमा के मुद्दे जुड़े हैं। शेख हसीना के समय भारत-बांग्लादेश रिश्ते गोल्डन एरा में थे, लेकिन 2024 के आंदोलन के बाद तनाव बढ़ा।

फायदे की संभावना

माना जा रहा है कि बीएनपी की सरकार भारत के लिए सबसे अच्छा विकल्प है, खासकर जमात-ए-इस्लामी की तुलना में। जमात अधिक कट्टर है और पाकिस्तान-चीन से क़रीब हो सकती है। बीएनपी को अधिक उदार और लोकतांत्रिक माना जाता है। भारत ने तुरंत बधाई देकर रिश्ते सुधारने का संकेत दिया। पीएम मोदी ने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश का समर्थन करेगा। बीएनपी ने भी भारत का शुक्रिया अदा किया और मज़बूत रिश्तों की उम्मीद जताई। इससे स्थिरता आएगी और सीमा पर सहयोग बढ़ सकता है। भारत की चिंता हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा है और बीएनपी इस पर ध्यान दे सकती है।
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नुक़सान की आशंका

हालाँकि, चुनौतियाँ भी हैं। बांग्लादेश में पिछले 18 महीनों में भारत-विरोधी भावना बढ़ी है। तारिक रहमान ने कहा है कि अगर भारत शेख हसीना को शरण देता रहेगा तो बांग्लादेशी लोगों में नाराज़गी आएगी। हसीना को बांग्लादेश में मौत की सजा मिली है और उनके प्रत्यर्पण की मांग है। इससे रिश्ते खराब हो सकते हैं। जमात-ए-इस्लामी ने क़रीब 70 सीटें जीती हैं, जो बीएनपी पर दबाव डाल सकती है और भारत के साथ रिश्तों को जटिल बना सकती है। सीमा पर गोलीबारी और तीस्ता नदी के पानी बँटवारे जैसे मुद्दों पर बीएनपी सख्त रुख अपना सकती है।

कुल मिलाकर, भारत के लिए यह 'कम बुरा' विकल्प है, लेकिन रिश्ते सुधारने के लिए दोनों पक्षों को प्रयास करने होंगे। बांग्लादेश की यह नई सरकार दोनों देशों के लिए नई शुरुआत हो सकती है। भारत और बांग्लादेश को मिलकर काम करना होगा, ताकि सीमा सुरक्षित रहे, व्यापार बढ़े और अल्पसंख्यक सुरक्षित रहें। बाक़ी चीजें सरकार बनने के बाद इसके रुख से साफ़ होगा।