अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूती के लिहाज़ से ग्रीनलैंड को अमेरिका के नियंत्रण में होना चाहिए। लेकिन ग्रीनलैंड के नेताओं और डेनमार्क ने इसे साफ-साफ ठुकरा दिया है। पर ये पूरा विवाद है क्या  ? और वास्तव में ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है या फिर अमेरिका का ?  क्या है इतिहास और ये ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए अहम क्यों है ।  इसको जानना ज़रूरी है।
हाल ही में वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद ट्रंप ने फिर से ग्रीनलैंड पर अमेरिका के कब्जे की बात दोहराई है । वेनेजुएला ऑपरेशन के अगले दिन ट्रंप ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि, “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज़ से हमें ग्रीनलैंड चाहिए। यह बहुत रणनीतिक जगह है। इस समय ग्रीनलैंड के आसपास रूसी और चीनी जहाज़ हर जगह मौजूद हैं।” 

इस पर ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस फ्रेडरिक नील्सन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और कहा, “अब बहुत हो गया,” साथ ही उन्होंने अमेरिका के ग्रीनलैंड पर नियंत्रण के विचार को “कोरी कल्पना” बताया। वहीं डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने कहा, “अमेरिका को डेनिश साम्राज्य के तहत आने वाले तीनों देशों में से किसी को भी अपने देश में मिलाने का कोई अधिकार नहीं है।” ग्रीनलैंड की पहली महिला प्रधानमंत्री एलेका हैमंड ने कहा,“वह हमें किसी सामान की तरह देख रहे हैं, जिसे खरीदा जा सकता है।”
इससे पहले जब 2019 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन उन्हें साफ जवाब मिला था कि यह बिकाऊ नहीं है। जनवरी 2025 में फिर से व्हाइट हाउस पहुंचने के बाद ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर अपनी रुचि दोबारा जताई और यहां तक कह दिया कि जरूरत पड़ी तो ताकत इस्तेमाल करने से भी पीछे नहीं हटेंगे। ट्रंप के इस तेवर ने डेनमार्क को हैरान कर दिया है, जबकि डेनमार्क नाटो का सहयोगी है और अमेरिका से उसके रिश्ते हमेशा से काफ़ी करीबी रहे हैं।
ग्रीनलैंड को लेकर कुछ बड़े नेताओं की यात्राएं भी विवाद की वजह बनीं। मार्च में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ग्रीनलैंड पहुंचे और वहां भाषण में डेनमार्क पर निशाना साधते हुए कहा कि वह इलाके की सुरक्षा पर ठीक से निवेश नहीं कर रहा। 2025 के आखिर में अमेरिका के इरादों को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया, जब ट्रंप ने जेफ लैंड्री को ग्रीनलैंड के लिए विशेष दूत नियुक्त किया। लैंड्री ने खुले तौर पर ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने की बात कही, जिससे तनाव और ज्यादा बढ़ गया।
आगे बढ़ने से पहले आप ये भी जान लीजिए कि ग्रीनलैंड कहां है और ट्रंप के लिए अहम क्यों है? दरअसल ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है और यह आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है। यह दुनिया के सबसे कम आबादी वाले इलाकों में से एक है। यहां करीब 56 हजार लोग रहते हैं, जिनमें ज़्यादातर स्थानीय इनुइट समुदाय के लोग हैं। ग्रीनलैंड का लगभग 80% हिस्सा बर्फ से ढका हुआ है, इसलिए ज़्यादातर आबादी दक्षिण-पश्चिमी तट पर, राजधानी नूक के आसपास रहती है। ग्रीनलैंड की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से मछली पकड़ने पर टिकी है और इसे डेनमार्क सरकार से भारी सब्सिडी भी मिलती है।
ग्रीनलैंड में अमेरिका की सुरक्षा दिलचस्पी काफी पुरानी है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब नाज़ी जर्मनी ने डेनमार्क पर कब्जा कर लिया, तब अमेरिका ने ग्रीनलैंड में एंट्री की और वहां सैन्य और रेडियो स्टेशन बनाए। युद्ध खत्म होने के बाद भी अमेरिकी सेनाएं ग्रीनलैंड में बनी रहीं। आज जिसे पिटुफिक स्पेस बेस कहा जाता है वो पहले थूले एयर बेस नाम से जाना जाता था, उसे तब से लगातार अमेरिका ही संचालित कर रहा है। 1951 में डेनमार्क के साथ हुए एक रक्षा समझौते के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड की सुरक्षा में बड़ी भूमिका मिली, जिसमें सैन्य ठिकाने बनाने और उन्हें बनाए रखने का अधिकार भी शामिल था।
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक अगर रूस अमेरिका की तरफ मिसाइल दागे, तो परमाणु हथियारों का सबसे छोटा रास्ता नॉर्थ पोल और ग्रीनलैंड से होकर ही जाएगा। इसी वजह से पिटुफिक स्पेस बेस अमेरिका की सुरक्षा के लिए बेहद अहम है।” आर्कटिक सुरक्षा पर न्यूज़लेटर ‘66° नॉर्थ’ के लेखक लुकास वाहडेन के मुताबिक, “अमेरिका कई बार कोशिश कर चुका है कि डेनमार्क को ग्रीनलैंड से बाहर कर दिया जाए और उसे अमेरिका का हिस्सा बना लिया जाए, या कम से कम उसकी सुरक्षा पूरी तरह अमेरिका के हाथ में आ जाए।”
1867 में, रूस से अलास्का खरीदने के बाद, अमेरिका के विदेश मंत्री विलियम एच. सीवार्ड ने डेनमार्क से ग्रीनलैंड खरीदने की बातचीत शुरू की थी, लेकिन कोई समझौता नहीं हो पाया। फिर 1946 में अमेरिका ने 100 मिलियन डॉलर (जो आज के हिसाब से करीब 1.2 अरब डॉलर होते हैं) देने की पेशकश की, लेकिन डेनमार्क सरकार ने इसे ठुकरा दिया।
अब आप सोच रहे होंगे कि ग्रीनलैंड का डेनमार्क से क्या लेना देना है । तो आपको बता दें कि भले ही ग्रीनलैंड उत्तरी अमेरिका महाद्वीप का हिस्सा है, लेकिन करीब 3,000 किलोमीटर दूर स्थित डेनमार्क ने इसे लगभग 300 सालों से अपने नियंत्रण में रखा हुआ है। 20वीं सदी के मध्य तक ग्रीनलैंड को एक उपनिवेश (कॉलोनी) की तरह चलाया जाता था। इस लंबे दौर में यह इलाका काफी अलग-थलग और गरीब रहा। 1953 में ग्रीनलैंड को औपचारिक रूप से डेनमार्क साम्राज्य का हिस्सा बना दिया गया और वहां रहने वाले लोग डेनमार्क के नागरिक बन गए। 1979 में हुए एक जनमत संग्रह (रेफरेंडम) के बाद ग्रीनलैंड को आंतरिक स्वशासन (होम रूल) मिला। इसके तहत ज्यादातर नीतियों का अधिकार ग्रीनलैंड के पास आ गया, जबकि विदेश नीति और रक्षा अब भी डेनमार्क के पास रही। आज ग्रीनलैंड में डेनमार्क के सैन्य अड्डे भी हैं और अमेरिका के भी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं।
ग्रीनलैंड पर चल रही खींचतान और ट्रंप की कब्ज़ा करने की कोशिशों पर ग्रीनलैंड में रहने वालों की राय कुछ बंटी हुई है । 2026 की शुरुआत में ट्रंप की धमकियों पर प्रतिक्रिया देते हुए ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस फ्रेडरिक नील्सन ने साफ कहा, “अब और दबाव नहीं। अब और इशारे नहीं। और ग्रीनलैंड को अपने में मिलाने की कल्पनाएं भी नहीं। हम बातचीत के लिए तैयार हैं, चर्चा के लिए तैयार हैं, लेकिन यह सब सही रास्ते से और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करते हुए होना चाहिए।” बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक लोगों का कहना है कि “ग्रीनलैंड ग्रीनलैंड वालों का है। ट्रंप आ सकते हैं, लेकिन बस उतना ही।”रिपोर्ट्स बताती हैं कि ज्यादातर ग्रीनलैंडवासी डेनमार्क से आज़ादी के पक्ष में हैं, लेकिन भारी बहुमत अमेरिका का हिस्सा बनने के विचार को पूरी तरह खारिज करता है। जब 2019 में ट्रंप ने पहली बार ग्रीनलैंड खरीदने की बात कही थी, तब भी स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया था।
तो कुल मिलाकर ग्रीनलैंड सिर्फ बर्फ से ढका एक दूर-दराज़ का द्वीप नहीं है, बल्कि वैश्विक ताक़तों की नई जियो-पॉलिटिक्स का अहम मोर्चा बन चुका है। एक तरफ अमेरिका है, जो इसे अपनी सुरक्षा के लिए ज़रूरी बता रहा है, दूसरी तरफ डेनमार्क और खुद ग्रीनलैंड के लोग हैं, जो साफ कह रहे हैं कि ग्रीनलैंड कोई सौदा नहीं है। सवाल यही है कि क्या ट्रंप की ये ज़िद आने वाले समय में आर्कटिक इलाके को नई टकराव की ज़मीन बना देगी? या फिर अंतरराष्ट्रीय कानून और ग्रीनलैंड के लोगों की इच्छा इस दबाव के आगे टिक पाएगी?