ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की ने पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच बने रक्षा गठबंधन में शामिल होने में दिलचस्पी दिखाई है। सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि बातचीत काफी काफी आगे निकल चुकी है और समझौता होने की संभावना बहुत अधिक है।

पाकिस्तान और सऊदी अरब ने सितंबर 2025 में 'स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट' पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें किसी एक देश पर हमला दूसरे पर हमला माना जाएगा। यह प्रावधान नाटो के आर्टिकल 5 की तरह है। यदि तुर्की इसमें शामिल होता है, तो यह मध्य पूर्व और उससे आगे की शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव ला सकता है।

तुर्की, जो नाटो का सदस्य है और अमेरिका के बाद इसके पास दूसरी सबसे बड़ी सेना है, पाकिस्तान के साथ करीबी सैन्य संबंध रखता है। कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन करने के अलावा, मई 2025 में भारत के साथ चार दिवसीय छोटे युद्ध (ऑपरेशन सिंदूर) के दौरान तुर्की ने पाकिस्तान को 350 से अधिक बायरक्तार टीबी2 और अन्य ड्रोन तथा उनके ऑपरेटर प्रदान किए थे। इस सहयोग से पाकिस्तान ने भारतीय लक्ष्यों पर हमले किए। अगर इस्लामिक नाटो बनता है तो यह भारत के लिए चिन्ता की बात हो सकती है।

हाल के वर्षों में तुर्की-पाकिस्तान रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा है। तुर्की पाकिस्तान नौसेना के लिए एक बेड़ा (बाबुर-क्लास फ्रिगेट्स (मिलजेम-क्लास कॉर्वेट के संस्करण) का निर्माण कर रहा है। दो जहाज तुर्की में बने और दो पाकिस्तान में निर्माणाधीन हैं। इसके अलावा, तुर्की एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज पाक वायु सेना के 42 एफ-16 लड़ाकू विमानों का मिडलाइफ रिफिट कर रही है, जिससे उनकी उम्र 12,000 घंटे तक बढ़ जाएगी।

अंकारा स्थित थिंक टैंक टीईपीएवी के रणनीतिकार निहात अली ओजकान ने ब्लूमबर्ग को बताया कि तुर्की के पास सैन्य अनुभव और विकसित रक्षा उद्योग है, पाकिस्तान के पास परमाणु क्षमता और बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जबकि सऊदी अरब के पास तेल की वजह से वित्तीय ताकत है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नाटो की महत्ता कम करने और क्षेत्र में अमेरिका-इजराइल हितों को प्राथमिकता देने से बदलती गतिशीलता के कारण देश नए सुरक्षा तंत्र बना रहे हैं।

ओजकान ने कहा, "अमेरिका अपने और इसराइल के हितों को प्राथमिकता दे रहा है, क्षेत्रीय संघर्षों की वजह से दोस्त देश और दुश्मन देश पहचानने के नए तरीके तलाशे जा रहे हैं।"

ब्लूमबर्ग ने तीनों देशों से टिप्पणी मांगी थी। तुर्की के रक्षा मंत्रालय ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, जबकि पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने जवाब नहीं दिया। सऊदी अधिकारी उपलब्ध नहीं थे।

इस्लामिक नाटो या मुस्लिम नाटो गठबंधन तुर्की-सऊदी संबंधों में नई शुरुआत का संकेत देगा, जहां वर्षों की प्रतिद्वंद्विता के बाद अब आर्थिक और रक्षा सहयोग बढ़ रहा है। दोनों देश ईरान के प्रभाव, सीरिया में सुन्नी सरकार और फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना जैसे मुद्दों पर चिंतित हैं।

यदि तुर्की शामिल होता है, तो यह नाटो सदस्य, परमाणु शक्ति और इस्लाम के पवित्र स्थलों के संरक्षक सऊदी अरब का दुर्लभ मिलन होगा, जो पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया और अफ्रीका के हिस्सों में सुरक्षा साझेदारियों को नया आकार दे सकता है। भारत के लिए यह घटनाक्रम निगरानी और चिन्ता का विषय हो सकता है, क्योंकि तुर्की पहले से ही पाकिस्तान का मजबूत समर्थक रहा है। 'इस्लामिक नाटो' जैसा गठबंधन क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां पेश कर सकता है।