अमेरिका के प्रतिनिधि सभा ने रूस और ईरान पर नए प्रतिबंध लगाने वाले एक महत्वपूर्ण विधेयक को आगे बढ़ाने के पक्ष में मतदान किया है। इस विधेयक के कानून बनने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है। भारत और चीन इस प्रावधान से प्रभावित होने वाले प्रमुख देशों में हैं। हालांकि, अभी भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं हुआ है और विधेयक को प्रतिनिधि सभा की अंतिम मंजूरी तथा राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की जरूरत है।

214-211 वोट से आगे बढ़ा विधेयक

प्रतिनिधि सभा ने मंगलवार शाम विधेयक को आगे बढ़ाने से जुड़ा प्रक्रियात्मक प्रस्ताव 214-211 वोटों से पारित किया। दो डेमोक्रेट सांसदों ने रिपब्लिकन सांसदों के साथ मतदान किया। यह फैसला सदन के डेमोक्रेटिक नेतृत्व के लिए अप्रत्याशित बताया गया। अब विधेयक पर बुधवार, 16 सितंबर (भारत में गुरुवार का दिन) को अंतिम मतदान होने की उम्मीद है।
इस विधेयक का नाम “Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026” है। इसका उद्देश्य रूस के नेतृत्व और ऊर्जा क्षेत्र पर प्रतिबंध कड़े करना, रूस की तेल-प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले जहाजों के कथित “शैडो फ्लीट” को निशाना बनाना और ईरान पर मौजूदा प्रतिबंधों को आगे बढ़ाना है।
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भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ क्यों?

विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदार देशों से जुड़ा है। इसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को ऐसे देशों से आयात होने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया जा सकता है, जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदते हैं। सीनेट से पारित संस्करण में भारत या चीन का नाम सीधे नहीं लिखा गया है। इसमें रूस के तेल और गैस के सबसे बड़े पांच आयातकों को आधार बनाया गया है। भारत और चीन रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदारों में शामिल हैं।
इससे पहले प्रतिनिधि सभा में कुछ सांसदों ने संशोधन पेश कर भारत, चीन, तुर्किये, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाकिया, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, कजाखस्तान और किर्गिजस्तान जैसे देशों का नाम सीधे शामिल करने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन इन प्रस्तावित संशोधनों को हाउस रूल्स कमेटी ने स्वीकार नहीं किया।

सीनेट में 86-11 से पारित हो चुका है विधेयक

इस विधेयक को अमेरिकी सीनेट पहले ही 86-11 वोटों से पारित कर चुकी है। सीनेट का संस्करण 7 अगस्त को पारित हुआ था। उसमें रूस के शीर्ष अधिकारियों, ऊर्जा क्षेत्र, वित्तीय संस्थानों और शैडो फ्लीट के खिलाफ कार्रवाई के प्रावधान हैं। विधेयक में रूस के साथ-साथ ईरान पर भी प्रावधान हैं। Iran Sanctions Act को 2031 तक जारी रखने की व्यवस्था भी प्रस्तावित कानून का हिस्सा है।

अमेरिका का तर्क—रूसी तेल से युद्ध को मिल रही आर्थिक मदद

अमेरिका का कहना है कि रूस के तेल कारोबार से मिलने वाला राजस्व यूक्रेन के खिलाफ उसके युद्ध को आर्थिक आधार देता है। इसलिए वॉशिंगटन रूस पर सीधे प्रतिबंधों के साथ-साथ उन देशों पर भी दबाव बढ़ाना चाहता है जो रूसी ऊर्जा खरीदते हैं। विधेयक में रूस की तेल बिक्री को प्रतिबंधों से बचाने में कथित तौर पर मदद करने वाले जहाजों के नेटवर्क को भी निशाना बनाया गया है।

डेमोक्रेट सांसदों की आपत्ति

विधेयक को लेकर अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर भी मतभेद हैं। हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के शीर्ष डेमोक्रेट सांसद ग्रेगरी मीक्स ने राष्ट्रपति को बहुत व्यापक टैरिफ अधिकार दिए जाने पर आपत्ति जताई है। मीक्स ने विधेयक की उस धारा को हटाने का संशोधन भी प्रस्तावित किया था, जो राष्ट्रपति को रूस के व्यापारिक साझेदारों पर व्यापक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की शक्ति देती है। उन्होंने राष्ट्रपति को राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर प्रतिबंधों से सीमित अवधि के लिए छूट देने और यूक्रेन को रक्षा सामग्री खरीदने के लिए 15 अरब डॉलर के प्रत्यक्ष ऋण की व्यवस्था का भी प्रस्ताव रखा था। हाउस रूल्स कमेटी ने इन संशोधनों को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी।
विधेयक के आलोचकों का तर्क है कि इससे राष्ट्रपति को बहुत व्यापक टैरिफ शक्तियां मिल सकती हैं और ऊंचे टैरिफ का असर अमेरिकी कारोबारों और उपभोक्ताओं की लागत पर पड़ सकता है। वहीं समर्थकों का कहना है कि रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए यह एक महत्वपूर्ण कदम है।

अब आगे क्या होगा?

प्रतिनिधि सभा में बुधवार को विधेयक पर अंतिम मतदान होने की उम्मीद है। अगर सदन इसे पारित कर देता है तो इसे राष्ट्रपति ट्रंप के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाएगा। राष्ट्रपति की मंजूरी और कानून बनने से पहले भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं होगा। समय भी महत्वपूर्ण है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा गुरुवार से जल्दी अवकाश पर जाने वाली है और 3 नवंबर के मध्यावधि चुनावों के बाद 9 नवंबर को फिर से बैठने की उम्मीद है। इसलिए विधेयक को लेकर बुधवार का मतदान खास महत्व रखता है।

भारत-अमेरिका व्यापार पर संभावित असर

भारत के लिए इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए है क्योंकि नई व्यवस्था लागू होने पर रूसी ऊर्जा खरीद को लेकर अमेरिकी व्यापार नीति में अतिरिक्त दबाव पैदा हो सकता है। हालांकि, मौजूदा स्थिति में इसे संभावित टैरिफ का खतरा कहना अधिक सही है, न कि भारत पर लागू हो चुका 100 प्रतिशत शुल्क।विधेयक के सीनेट संस्करण में पांच सबसे बड़े रूसी तेल-गैस आयातकों को आधार बनाया गया है और इन देशों की स्थिति में बदलाव के अनुसार सूची की समीक्षा की जा सकती है।
इस तरह फिलहाल घटनाक्रम तीन चरणों में है—सीनेट से मंजूरी, प्रतिनिधि सभा में अंतिम मतदान और उसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी। अंतिम दो चरण पूरे होने तक भारत पर प्रस्तावित 100 प्रतिशत टैरिफ प्रभावी नहीं माना जा सकता।