अमेरिका की एक फेडरल अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को बड़ा झटका देते हुए उस नए नियम को लागू करने पर रोक लगा दी है, जिसके तहत विदेशी छात्रों, शोधकर्ताओं और पत्रकारों के अमेरिका में रहने की अवधि सीमित की जानी थी। यह रोक उस समय लगाई गई है जब अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) का नया नियम लागू होने से ठीक एक दिन बाकी था।
अमेरिकी जिला जज एफ. डेनिस सेलर ने बोस्टन में यह फैसला सुनाया। उन्होंने उच्च शिक्षा संस्थानों और श्रमिक संगठनों समेत कई संगठनों के गठबंधन के पक्ष में फैसला दिया। अदालत ने कहा कि DHS ने नई वीजा नीति तैयार करते समय जिन कारणों का इस्तेमाल किया, वे बेहद कमजोर थे और विभाग ने कानून के तहत जरूरी प्रक्रियाओं का पर्याप्त पालन नहीं किया।

क्या था ट्रंप प्रशासन का नया वीजा नियम?

ट्रंप प्रशासन ने जुलाई 2026 में विदेशी छात्रों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों में शामिल लोगों और विदेशी पत्रकारों के लिए वीजा की अवधि को निश्चित करने का फैसला किया था। मौजूदा व्यवस्था में विदेशी छात्रों को आम तौर पर उनकी ‘duration of status’ यानी उनके अध्ययन या प्रशिक्षण की अवधि तक अमेरिका में रहने की अनुमति मिलती थी। नई व्यवस्था इस प्रणाली को बदल देती।
प्रस्तावित नियम के अनुसार:
F वीजा वाले विदेशी छात्रों की अवधि अधिकतम चार साल होती। J वीजा वाले एक्सचेंज विजिटर्स के लिए भी अधिकतम अवधि चार साल निर्धारित की जाती।
वीजा वाले विदेशी पत्रकारों को अधिकतम 240 दिन की अवधि मिलती। चीन के नागरिक पत्रकारों के लिए यह अवधि सिर्फ 90 दिन प्रस्तावित थी।
जिन लोगों को निर्धारित अवधि से अधिक अमेरिका में रहना होता, उन्हें वीजा विस्तार के लिए आवेदन करना पड़ता।
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करीब 20 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हो सकते थे

अदालत के समक्ष रखे गए आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका में करीब 16 लाख लोग F वीजा और लगभग 5 लाख लोग J वीजा पर हैं। इनमें बड़ी संख्या विदेशी छात्रों, शोधकर्ताओं और अकादमिक क्षेत्र से जुड़े लोगों की है। अमेरिका के प्रमुख शोध विश्वविद्यालयों जैसे MIT और Harvard में विदेशी छात्रों, खासकर स्नातकोत्तर स्तर पर पढ़ने वाले छात्रों की बड़ी संख्या है। जज सेलर ने कहा कि नई व्यवस्था लागू होने से इन विश्वविद्यालयों को सैकड़ों मिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता था और विदेशी छात्रों के दाखिले में भी भारी गिरावट आ सकती थी।

जज ने प्रशासन की दलीलों को कमजोर बताया 

DHS ने नई व्यवस्था के पक्ष में मुख्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा और वीजा प्रणाली में धोखाधड़ी रोकने का तर्क दिया था। ट्रंप प्रशासन का कहना था कि मौजूदा व्यवस्था का गलत इस्तेमाल कुछ विदेशी छात्रों द्वारा लंबे समय तक अमेरिका में रहने के लिए किया जा सकता है। लेकिन न्यायाधीश सेलर ने इन तर्कों को पर्याप्त नहीं माना। उनके अनुसार DHS ने नीति में इतने बड़े बदलाव के संभावित प्रभावों पर पर्याप्त विचार नहीं किया और कम कठोर विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार नहीं किया।
अदालत ने यह भी कहा कि लगभग पांच दशकों से चली आ रही व्यवस्था ने अमेरिका को दुनिया भर से छात्रों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करने में मदद की है। इस व्यवस्था के कारण विज्ञान, चिकित्सा और तकनीक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण शोध हुए और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी बड़ा लाभ मिला।

‘फॉरएवर स्टूडेंट्स’ पर ट्रंप प्रशासन का तर्क

ट्रंप प्रशासन ने ‘duration of status’ व्यवस्था की आलोचना करते हुए दावा किया था कि इससे कुछ लोग लगातार नए पाठ्यक्रमों में दाखिला लेकर अमेरिका में लंबे समय तक रह सकते हैं। प्रशासन ने ऐसे लोगों को ‘forever students’ यानी हमेशा छात्र बने रहने वाले लोगों के रूप में पेश किया था।
नई व्यवस्था में छात्रों पर कुछ अतिरिक्त पाबंदियां भी लगाई जानी थीं। उदाहरण के लिए, ग्रेजुएट छात्रों को अपनी शैक्षणिक दिशा बदलने या किसी दूसरे विश्वविद्यालय में स्थानांतरित होने के लिए अनुमति लेनी पड़ती। डिग्री या प्रशिक्षण पूरा होने के बाद अमेरिका छोड़ने की अवधि भी 60 दिन से घटाकर 30 दिन करने का प्रस्ताव था।

विदेशी शोधकर्ताओं को लेकर भी चिंता

अदालत में दाखिल मामले में उच्च शिक्षा संगठनों ने तर्क दिया कि चार साल की सीमा विशेष रूप से शोधकर्ताओं और पोस्टडॉक्टरल छात्रों के लिए गंभीर समस्या पैदा करेगी। कई वैज्ञानिक और मेडिकल शोध कार्यक्रम चार साल से अधिक समय लेते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ता अमेरिका में जीवन विज्ञान के क्षेत्र में पीएचडी करने वालों का लगभग एक-चौथाई और पोस्टडॉक्टरल शोधकर्ताओं का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा हैं। बायोमेडिकल क्षेत्र में पीएचडी पूरी करने में औसतन पांच से छह साल लग सकते हैं। इसलिए नई व्यवस्था में बड़ी संख्या में शोधकर्ताओं को अपने प्रशिक्षण या शोध की अवधि पूरी करने के लिए अतिरिक्त वीजा विस्तार की जरूरत पड़ती।

विश्वविद्यालयों और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर

न्यायाधीश सेलर ने कहा कि अगर यह नियम लागू होता तो अमेरिकी उच्च शिक्षा व्यवस्था और अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान हो सकता था। उनके आकलन के अनुसार विश्वविद्यालयों को सैकड़ों मिलियन डॉलर की अतिरिक्त लागत उठानी पड़ सकती थी और विदेशी छात्रों की संख्या में गिरावट आ सकती थी। उन्होंने संभावित नुकसान को बेहद गंभीर बताया। मामले में शामिल Presidents’ Alliance on Higher Education and Immigration ने अदालत के फैसले का स्वागत किया। संगठन की प्रमुख मिरियम फेल्डब्लम ने कहा कि फैसले से अंतरराष्ट्रीय छात्रों, विश्वविद्यालयों और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान से फिलहाल राहत मिली है।

DHS ने अदालत के फैसले की आलोचना की

ट्रंप प्रशासन के DHS के जनरल काउंसिल जेम्स पर्सिवल ने फैसले की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि अदालत के आदेश से अमेरिकी इमिग्रेशन सिस्टम के दुरुपयोग को रोकना मुश्किल होगा। उनका तर्क था कि कुछ लोग छात्र वीजा पर बहुत कम पढ़ाई करते हुए भी वर्षों तक अमेरिका में रहने की कोशिश कर सकते हैं।

मामला अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ

अदालत का मौजूदा फैसला ट्रंप प्रशासन के नियम को अंतिम रूप से रद्द नहीं करता। यह फिलहाल प्रारंभिक रोक (preliminary injunction) है, जिससे मुकदमे की आगे की सुनवाई के दौरान नया नियम लागू नहीं हो सकेगा। न्यायाधीश ने संकेत दिया कि याचिकाकर्ताओं के मामले में सफलता की पर्याप्त संभावना है, लेकिन उन्होंने अभी अंतिम फैसला नहीं दिया है।
इस तरह अमेरिकी अदालत का यह फैसला ट्रंप प्रशासन की कानूनी आव्रजन नीति को सख्त करने की मुहिम के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक बाधा माना जा रहा है। खासकर विदेशी छात्रों, शोधकर्ताओं और पत्रकारों के लिए फिलहाल पुरानी ‘duration of status’ व्यवस्था जारी रहेगी, जब तक मामले में आगे कोई अलग अदालत का आदेश नहीं आता।