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क्या ईरान पर हमला कर देगा अमेरिका?

अमेरिकी प्रशासन तरह-तरह के सैंक्शन लगाकर ईरान को झुकाने में लगा है। इसका अंत युद्ध भी हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तो यह उस कहावत को दोहराएगा कि अमेरिका के रिपब्लिकन प्रेजिडेंट बिना युद्ध लड़े दूसरी बार चुनाव में नहीं जा सकते!
शीतल पी. सिंह

एक दिन पहले ही कद्दावर डेमोक्रेट नेता और सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने चेतावनी दी है, ‘मिस्टर प्रेजिडेंट, संविधान की इज़्ज़त कीजिये। आपके पास ईरान पर हमला करने के लिए कोई क़ानूनी अधिकार नहीं है। कांग्रेस के सामने आइये, सबूत पेश करिये और अपने तर्क दीजिये। अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो हम वॉर पावर्स एक्ट के तहत अपनी शक्तियों के प्रयोग से आपको रोक देंगे।’

ईरान पर अमेरिका के संभावित हमले के मद्देनज़र सैंडर्स की यह चेतावनी हमारे समय में अमेरिकी विदेश नीति पर एक युद्धोन्मादी सनद की तरह है। आज अमेरिकी सीनेट इस बात पर मतदान करेगी कि क्यों न राष्ट्रपति को सऊदी अरब और यूएई को आठ बिलियन डॉलर के हथियार सौदे को पूरा करने से रोक दिया जाए। इस प्रस्ताव को सीनेट का बहुमत प्राप्त है क्योंकि कई रिपब्लिकन सीनेटर भी इसका समर्थन कर रहे हैं। हालाँकि ट्रम्प इसे वीटो कर सकते हैं। उन्हें वीटो के अधिकार से भी रोकने के लिए प्रस्ताव के समर्थन में सीनेट के दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन चाहिए जो मुश्किल लगता है। 

सऊदी अरब और यूएई ईरान पर हमले के लिए अमेरिका से लगातार अपील कर रहे हैं। इज़राइल अपनी ओर से ऐसी कार्रवाई की माँग करता रहा है। सऊदी अरब और यूएई के साथ अमेरिका के ये सौदे इसी तैयारी का हिस्सा हैं।

ईरान पर हमला करने के लिए ताज़ा माहौल ओमान की खाड़ी में बीते हफ़्ते कुछ सऊदी तेल टैंकरों पर हुए संदिग्ध हमलों की रोशनी में खड़ा किया जा रहा है। ये टैंकर जापान जा रहे थे। ठीक इसी समय जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे ईरान पहुँच रहे थे। ईरान ने इस घटना को प्रायोजित बताया था, लेकिन सऊदी अरब और अमेरिका इसे ईरान की करतूत बता रहे हैं।

पिछले कुछ महीनों से अमेरिकी और पश्चिमी मीडिया में ईरान विरोधी ख़बरों में बढ़ोतरी हुई है। ऐसी तमाम ख़बरें जगह-जगह छपी हैं जिनमें अमेरिकी प्रशासन की ईरान पर संभावित हमले की तैयारियों की मीमांसा रहती है। अमेरिकी नेतागण इस मामले में ट्रम्प की युद्धोन्माद की नीति की आलोचना भी करते रहते हैं। पश्चिमी देशों में से कोई भी इस पर सहमत नहीं है। ब्रिटेन की सत्तारूढ़ पार्टी को छोड़कर पूरे यूरोप में इसकी आलोचना ही हुई है।

सोमवार को ट्रम्प प्रशासन के सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने अमेरिकी मीडिया को दिए साक्षात्कार में कहा, ‘इस मामले में प्रेजिडेंट के दृढ़ निश्चय पर शक करना भारी भूल होगी।’

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अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती

इसी दिन शाम को रक्षा मामलों के कार्यवाहक सचिव पैट्रिक शनाहन ने स्वीकार किया कि इस क्षेत्र में अमेरिका 1000 अतिरिक्त सैनिक तैनात कर चुका है।

इसी समय एक दूसरे मंच पर अमेरिकी सरकार के सैन्य प्रवक्ता ने मीडिया से कहा, ‘अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट माइक पॉम्पियो अमेरिकी सेनाओं के सेन्ट्रल कमांड मुख्यालय पहुँचे हैं जहाँ उन्होंने सैन्य अधिकारियों की बैठक ली।’

एक साथ एक ही लाइन पर इतनी गतिविधियों ने दुनिया के कान खड़े कर दिए। ख़ुद अमेरिका में युद्ध विरोधी राजनीतिज्ञों ने ट्रम्प प्रशासन की सीधे आलोचना शुरू कर दी। न सिर्फ़ डेमोक्रेटिक बल्कि तमाम रिपब्लिकन नेता इसके ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए। मीडिया ने भी सवाल किए।

ट्रम्प की आलोचना

ट्रम्प की मुख्य आलोचना यह हुई कि उनके पास ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने की कोई क़ानूनी वैधता नहीं है। जिस 9/11 के हमले के बाद बने क़ानून का हवाला अमेरिकी प्रशासन दे रहा है उसमें किसी अमेरिकी नागरिक के हताहत होने अथवा अमेरिकी हित पर हमला होने की शर्त है। इसके बाद भी उसकी सीनेट से मंजूरी की दरकार है। बर्नी सैंडर्स जैसे डेमोक्रेटिक नेता इसी वजह से ट्रम्प को सीनेट का सामना करने के लिए ललकार रहे हैं।

अमेरिकी मीडिया संस्थान सीबीएस को दिए बयान में पॉम्पियो ने कहा कि 2001 में कांग्रेस में जो बिल पास किया गया था, हम उसका उपयोग कर सकते हैं। हमारे विकल्प क़ानून सम्मत हैं।

एक-दूसरे सीनेटर जो हमारे गिरिराज सिंह की तरह हैं टॉम कॉटन, उन्होंने तो ईरान पर तुरंत हमला करने का आह्वान कर दिया। यह सब सीबीएस के इसी रविवार के टॉक शो में हुआ।

हालाँकि एक दूसरी रिपब्लिकन सीनेटर लिसा मुरकोव्स्की ने कहा कि वह दूसरे रिपब्लिकन सीनेटरों से इस सप्ताह इस सवाल पर चर्चा करेंगी कि हमारे कौन-कौन से क़ानूनी हक़ हैं? और क्या युद्ध सच में ज़रूरी है?

इसी बीच पिछले सप्ताह जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे तेहरान गए जिस पर ट्रम्प ने एक उम्मीद भरा ट्वीट किया। इस ट्वीट से ऐसा लगा कि ट्रम्प दो नावों पर सवार हैं। वार्ता भी करना चाहते हैं और युद्ध की तैयारी भी।

जो भी पहले हो जाए! टाइम पत्रिका को सोमवार को दिए साक्षात्कार में ओमान की खाड़ी में टैंकरों पर हुए हमले को ट्रम्प ने बहुत छोटी घटना बताया था।

अप्रैल में ही अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने ईरान के इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड नामक इलीट फ़ोर्स को अल क़ायदा की तरह का आतंकवादी संगठन क़रार दिया था। साथ ही इसने अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिक कॉन्वॉय पर हुए एक आत्मघाती हमले के आरोप को भी ईरान पर मढ़ दिया था जिसे तालिबानी प्रवक्ता ने ख़ुद की कार्रवाई बताया था। इस सबसे तो यही लगता है कि ट्रम्प प्रशासन ईरान पर हमले के तर्क तैयार कर रहा है।

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नये समझौते का दबाव

ट्रम्प प्रशासन के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार ट्रम्प दबाव डालकर ईरान से दूसरा परमाणु समझौता करना चाहते हैं। जो सौदा वियना में उनके पूर्ववर्ती ओबामा प्रशासन ने किया था उसे वह 2017 में एकतरफ़ा भंग करने का एलान करके अलग-थलग पड़ गए हैं। ख़ुद अमेरिका में उनकी इस कार्रवाई का भारी विरोध है। फ्रांस और जर्मनी के नेताओं ने तो उनके मुँह पर ही उनसे असहमति जता दी थी। ट्रम्प चुनाव से पहले ईरान को झुकाकर एक नए समझौते का दबाव बना रहे हैं पर ईरान उनकी परीक्षा ले रहा है। ईरान का कहना है कि किसी समझौते का कोई मुद्दा किसी टेबल पर है कहाँ? अमेरिकी प्रशासन तरह-तरह के प्रतिबंध लगाकर ईरान को झुकाने में लगा है। इसका अंत युद्ध भी हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तो यह उस कहावत को दोहराएगा कि अमेरिका के रिपब्लिकन प्रेजिडेंट बिना युद्ध लड़े दूसरी बार चुनाव में नहीं जा सकते!

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