राजस्थान के ताजा स्थानीय निकाय चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को कुल 19 सीटें मिली हैं। पिछले चुनाव में उसके पास 24 सीटें थीं। पांच सीटों की कमी अपने आप में कोई बड़ा राजनीतिक भूचाल नहीं है। राजस्थान बसपा का मुख्य गढ़ भी कभी नहीं रहा। लेकिन कभी-कभी छोटी संख्या किसी बहुत बड़ी राजनीतिक कहानी का संकेत देती है। वह कहानी है कांशीराम के बनाए उस बहुजन आंदोलन की, जिसने उत्तर भारत की राजनीति का सामाजिक व्याकरण ही बदल दिया था। जिसने एक दलित महिला को चार बार देश के सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बनाया था और 2007 में अपने दम पर 206 विधायकों वाली सरकार खड़ी कर दी थी। आज उसी पार्टी का उत्तर प्रदेश विधानसभा में एक भी विधायक नहीं है, लोकसभा में एक भी सांसद नहीं और राज्यसभा में बचा आखिरी सांसद भी नवंबर 2026 में रिटायर हो जाएगा। सवाल इसलिए गंभीर है—क्या कांशीराम का बहुजन मिशन अपने राजनीतिक अवसान की तरफ बढ़ रहा है?
इस कहानी की शुरुआत किसी बड़े राजनीतिक परिवार, पूंजीपति या स्थापित पार्टी से नहीं हुई थी। कांशीराम ने सबसे पहले पढ़े-लिखे दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक सरकारी कर्मचारियों को संगठित किया। 1970 के दशक में शुरू हुआ यह प्रयास 1978 में राष्ट्रीय स्तर पर BAMCEF के रूप में सामने आया। 1981 में उन्होंने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति यानी DS-4 बनाई और 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी स्थापित की। यह क्रम बहुत महत्वपूर्ण था—पहले वैचारिक कार्यकर्ता, फिर सामाजिक संगठन और अंत में राजनीतिक पार्टी। यानी पहले जमीन तैयार की गई, फिर बीज बोया गया और तब फसल की उम्मीद की गई।
कांशीराम का दलितों से जुड़ाव
कांशीराम देश भर में घूमे। साइकिल यात्राएं कीं। कैडर कैंप लगाए। उनका विचार था कि जिस समाज की आबादी बहुत बड़ी है लेकिन सत्ता में हिस्सेदारी बहुत छोटी, उसकी पहली जरूरत अपनी संख्या को राजनीतिक चेतना में बदलना है। शोध में भी कांशीराम की पद्धति को कर्मचारियों के संगठन से जन-आंदोलन और फिर चुनावी पार्टी तक पहुंचने वाली सुविचारित प्रक्रिया माना गया है। उनका निशाना कांग्रेस की वह पुरानी राजनीति भी थी जिसमें दलित समाज बड़ी संख्या में कांग्रेस को वोट देता था, लेकिन स्वतंत्र दलित राजनीतिक नेतृत्व विकसित नहीं हो पाता था। कांशीराम ने इसे चुनौती दी। उनका संदेश मोटे तौर पर यह था कि बहुजन किसी दूसरे का वोट बैंक क्यों बने, वह खुद सत्ता का दावेदार क्यों न बने? उत्तर प्रदेश इसका सबसे बड़ा प्रयोग क्षेत्र बना।
बसपा कैसे पहुँची थी शिखर पर?
1989 में बसपा 13 विधानसभा सीटों तक पहुंची। 1993 में समाजवादी पार्टी के साथ उसका ऐतिहासिक गठबंधन हुआ और बसपा ने 67 सीटें जीतीं। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। दलित और पिछड़ी जातियों का यह मेल उत्तर प्रदेश की परंपरागत सामाजिक सत्ता के लिए बहुत बड़ी चुनौती था। लेकिन गठबंधन टूट गया। 1995 का कुख्यात गेस्ट हाउस कांड हुआ। उसी वर्ष बीजेपी के समर्थन से मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं। इसके बाद 1997, 2002 और 2007 में वे फिर मुख्यमंत्री बनीं। इस उपलब्धि का ऐतिहासिक महत्व आज बसपा की आलोचना करते समय भी नहीं भूलना चाहिए। एक साधारण दलित परिवार की महिला का उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना भारतीय लोकतंत्र की असाधारण घटनाओं में से एक था। बसपा ने लाखों दलितों को यह मनोवैज्ञानिक शक्ति दी कि वे केवल सरकार से सहायता मांगने वाला समुदाय नहीं हैं- वे खुद सरकार बना सकते हैं।
फिर 2007 आया। यह बसपा और मायावती का शिखर था। कांशीराम की मूल बहुजन राजनीति को मायावती ने ‘सर्वजन’ सोशल इंजीनियरिंग में विस्तार दिया। जाटव-दलित आधार के साथ ब्राह्मण और दूसरे सामाजिक समूह जोड़े गए। नारा और राजनीतिक भाषा भी बदली। कभी तीखे सवर्ण-विरोधी नारों के लिए पहचानी जाने वाली पार्टी अब ‘हाथी नहीं गणेश है…’ जैसे समावेशी प्रतीकों की तरफ़ बढ़ी। नतीजा चमत्कारिक था- 403 में 206 सीटें और 30.43 प्रतिशत वोट। मायावती अपने बूते पूर्ण बहुमत की मुख्यमंत्री बनीं। उस दौर में उन्हें भावी प्रधानमंत्री तक माना जाने लगा। लेकिन वही शिखर अंततः गिरावट की शुरुआत भी साबित हुआ।
2007 में 206 सीटें और 30.43 प्रतिशत वोट थे। 2012 में बसपा 80 सीटों और लगभग 25.9 प्रतिशत पर आ गई। 2017 में केवल 19 सीटें बचीं, हालाँकि वोट तब भी 22.23 प्रतिशत था। 2022 में गिरावट विस्फोटक हुई- केवल एक विधानसभा सीट और 12.88 प्रतिशत वोट। लोकसभा की कहानी भी ऐसी ही है। 2009 में उत्तर प्रदेश में बसपा ने 20 लोकसभा सीटें जीती थीं। 2014 में करीब 19.8 प्रतिशत वोट मिलने के बावजूद एक भी सीट नहीं मिली।
2019 में समाजवादी पार्टी से गठबंधन करके 10 सीटें मिलीं। लेकिन 2024 में फिर अकेले चुनाव लड़ने पर वोट घटकर 9.39 प्रतिशत रह गया और पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी। 206 से 80, 80 से 19 और 19 से एक। लोकसभा में 20 से शून्य। इतनी बड़ी गिरावट केवल चुनावी संयोग नहीं हो सकती।
बसपा के सामने संकट
अब बसपा के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि 2026 तक उसका संसदीय प्रतिनिधित्व पूरी तरह ख़त्म हो जाएगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा के इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह का अगस्त 2026 में निधन हो गया। वे बलिया जिले की रसड़ा सीट से तीन बार विधायक रहे थे- 2012, 2017 और 2022 में। 2022 में जब पूरी बसपा एक सीट पर सिमट गई थी तब भी उमाशंकर सिंह ही अकेले विधायक थे जो जीत सके थे। उनके निधन के बाद 403 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा का एक भी विधायक नहीं बचा है। यह 1989 के बाद पहली बार हुआ है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा का कोई प्रतिनिधि नहीं है। राज्यसभा में बसपा के पास फिलहाल केवल एक सांसद—रामजी गौतम—बचे हैं। उनका कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त हो रहा है। उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के जो 10 सदस्य रिटायर हो रहे हैं, उनमें रामजी गौतम भी शामिल हैं। इसका मतलब साफ़ है—नवंबर 2026 के बाद बसपा के पास संसद के किसी भी सदन में एक भी सांसद नहीं बचेगा।
यह पहली बार होगा जब 1989 में बसपा की संसदीय एंट्री के बाद पार्टी पूरी तरह संसद से बाहर हो जाएगी। 1989 में बसपा ने पहली बार लोकसभा में तीन सांसद भेजे थे—मायावती बिजनौर से, राम किशन यादव आजमगढ़ से और हरभजन लखा फिल्लौर से। उसके बाद से बसपा का संसद में आना-जाना लगा रहा। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न मिलने के बाद अब राज्यसभा से भी पार्टी का नाम मिट जाएगा। बसपा के लिए राज्यसभा सीट बचाना भी असंभव है। उत्तर प्रदेश में राज्यसभा का एक सदस्य चुनने के लिए 37 विधायकों की जरूरत होती है। बसपा के पास सिर्फ एक विधायक था, वह भी अब नहीं है। ऐसे में पार्टी राज्यसभा चुनाव में खड़े होने की स्थिति में भी नहीं है।
मायावती परिवार में ढूंढ रहीं उत्तराधिकारी
कांशीराम की ताकत कैडर था। मायावती के दौर में बसपा धीरे-धीरे एक अत्यधिक केंद्रीकृत पार्टी बनती गई। अनेक बड़े नेता निकले या निकाले गए। स्थानीय स्तर पर स्वतंत्र राजनीतिक हैसियत वाले नेतृत्व की दूसरी पंक्ति विकसित नहीं हो सकी। विडंबना देखिए—कांशीराम ने मायावती को अपना उत्तराधिकारी बनाया था। दोनों के बीच कोई रक्त संबंध नहीं था। उन्होंने अपने आंदोलन के भीतर से एक कार्यकर्ता चुना और उसे देश के सबसे महत्वपूर्ण दलित नेताओं में बदल दिया। आज उसी पार्टी के उत्तराधिकार की चर्चा मायावती के भाई आनंद कुमार और भतीजों आकाश तथा ईशान आनंद के आसपास घूमती है। सितंबर 2026 के ताजा घटनाक्रम में आकाश आनंद फिर जिम्मेदारियों से हटाए गए और परिवार तथा संगठन को लेकर मायावती को सार्वजनिक सफाई देनी पड़ी। कांशीराम का मॉडल कैडर से उत्तराधिकारी पैदा करने का था; आज उत्तराधिकारी परिवार में खोजा जा रहा है। यह सिर्फ एक संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि पूरे आंदोलन की दिशा बदलने का संकेत है।बसपा और बीजेपी
बीजेपी ने गैर-जाटव दलित जातियों—पासी, वाल्मीकि, कोरी, खटीक आदि—के बीच अपनी पहुंच बढ़ाई। कल्याण योजनाओं, हिंदुत्व, स्थानीय प्रतिनिधित्व और सामाजिक समीकरणों के मिश्रण ने उस बहुजन गठबंधन को कमजोर किया जिसे कांशीराम ने दशकों की मेहनत से बनाया था। यह सिर्फ वोट की राजनीति नहीं थी—यह सामाजिक विभाजन की राजनीति थी, जिसने बहुजन एकता की जमीन को ही कमजोर कर दिया। चंद्रशेखर आजाद जैसे नेताओं ने खासकर युवा दलितों के बीच आक्रामक और सड़क पर दिखाई देने वाली राजनीति का विकल्प प्रस्तुत किया है। नगीना से चंद्रशेखर की लोकसभा जीत ने इस संभावना को वास्तविक चुनावी रूप दे दिया। यानी दलित राजनीति खत्म नहीं हुई है, बस उसका चेहरा बदल रहा है। बसपा का विकल्प खड़ा हो रहा है। लेकिन बसपा के पतन पर होने वाली राजनीतिक चर्चाओं में एक और सवाल लगातार उठता है, जिसे नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा। विपक्षी राजनीति और बसपा के पुराने समर्थकों के एक हिस्से में वर्षों से यह धारणा मौजूद है कि मायावती केंद्रीय सत्ता और जांच एजेंसियों से सीधा टकराव नहीं चाहतीं। इसे अक्सर उनके पुराने कानूनी विवादों, ताज कॉरिडोर प्रकरण और आय से अधिक संपत्ति संबंधी जांच के इतिहास से जोड़कर कहा जाता है।
क्या मायावती बीजेपी का विरोध करती हैं?
इससे यह राजनीतिक धारणा पैदा हुई कि मायावती बीजेपी से इतना ही विरोध करती हैं जितना उनके लिए सुरक्षित हो, लेकिन उस सीमा तक नहीं जातीं जहां सीधा राजनीतिक युद्ध शुरू हो जाए। यह समझना ज़रूरी है कि यह सिर्फ़ एक धारणा है, लेकिन यह धारणा इसलिए इतनी मज़बूत हो चुकी है क्योंकि बसपा की रणनीति ने इसे और मज़बूत होने का मौका दिया है। 2019 में सपा से गठबंधन करके 10 लोकसभा सीटें जीतने के बावजूद मायावती ने गठबंधन समाप्त कर दिया। 2022 में अकेले विधानसभा चुनाव लड़ा—एक सीट मिली। 2024 में जब बीजेपी के मुकाबले INDIA गठबंधन खड़ा हुआ, बसपा फिर अकेली रही। परिणाम—शून्य सीट और 9.39 प्रतिशत वोट। लगातार हार के बावजूद “एकला चलो रे” की यह जिद स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा करती है। यदि मुख्य उद्देश्य भाजपा को सत्ता से हटाना है तो विपक्षी गठबंधन से दूरी क्यों? यदि उद्देश्य बसपा को पुनर्जीवित करना है तो लगातार अकेले लड़कर वोट और संगठन दोनों गंवाने वाली रणनीति क्यों नहीं बदली जाती?
मायावती का अपना तर्क रहा है कि बसपा को कांग्रेस, भाजपा या क्षेत्रीय दलों की पिछलग्गू बनने के बजाय स्वतंत्र बहुजन शक्ति बने रहना चाहिए। इस तर्क में कांशीराम की मूल राजनीति की प्रतिध्वनि भी सुनाई देती है। कांशीराम स्वयं स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति निर्माण के प्रबल समर्थक थे और उन्होंने परिस्थितियों के अनुसार गठबंधन भी किए। लेकिन फर्क यह है कि कांशीराम का “अकेला चलना” विस्तार की रणनीति था; आज का अकेलापन सिकुड़ती हुई पार्टी की रणनीति दिखाई देता है। कांशीराम अकेले चलते थे ताकि कारवां बड़ा हो सके; आज बसपा अकेली चलते-चलते छोटी होती जा रही है। राजस्थान की 19 स्थानीय निकाय सीटों को इसी बड़े कैनवास पर देखना चाहिए।
क्या बसपा खत्म हो गई?
बसपा खत्म हो गई है—यह कहना अभी गलत होगा। उत्तर प्रदेश में उसके पास अब भी लाखों वोट हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में उसे 12.88 प्रतिशत वोट मिले थे और 2024 के लोकसभा चुनाव में 9.39 प्रतिशत। जाटव समुदाय में मायावती का प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। भारतीय राजनीति में सामाजिक आधार वाली पार्टियां अप्रत्याशित वापसी भी कर सकती हैं। राजनीति में कभी कुछ भी असंभव नहीं होता। लेकिन पार्टी के सामने अब अस्तित्व से भी बड़ा सवाल है—उसका उद्देश्य क्या है? क्या वह फिर सत्ता हासिल करना चाहती है? क्या वह स्वतंत्र बहुजन आंदोलन बचाना चाहती है? क्या वह केवल अपना सुरक्षित वोट प्रतिशत बनाए रखना चाहती है? या वह किसी ऐसी राजनीतिक प्रतीक्षा में है जिसकी दिशा उसके कार्यकर्ताओं तक को स्पष्ट नहीं है।
कांशीराम ने साइकिल चलाकर, छोटी सभाएं करके, सरकारी कर्मचारियों से चंदा लेकर और हजारों कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करके आंदोलन खड़ा किया था। उन्होंने सत्ता को सामाजिक परिवर्तन की ‘मास्टर की’ माना। मायावती ने उस चाबी से सत्ता का दरवाजा सचमुच खोला। चार बार मुख्यमंत्री बनीं और 2007 में अपने दम पर बहुमत हासिल किया। भारतीय दलित इतिहास में उनका स्थान इसलिए सुरक्षित है। यह कोई छोटी बात नहीं है। लेकिन किसी नेता का ऐतिहासिक मूल्यांकन केवल इस बात से नहीं होता कि उसे विरासत में क्या मिला और वह खुद कितनी ऊंचाई तक पहुंचा। यह भी पूछा जाता है कि उसने अगली पीढ़ी को क्या सौंपा। और यहीं बसपा की आज की तस्वीर बेचैन करती है।
कांशीराम एक गैर-पारिवारिक कार्यकर्ता मायावती को उत्तराधिकारी बनाकर गए थे। मायावती के बाद उत्तराधिकारी की खोज परिवार के भीतर घूम रही है। कांशीराम का संगठन जमीन पर संवाद करता था; आज पारिवारिक विवाद X पर स्पष्ट किए जा रहे हैं। यह सिर्फ नेतृत्व का बदलाव नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक संस्कृति का बदलाव है।
राजस्थान का 24 से 19 इसलिए सिर्फ पांच पार्षदों की कमी नहीं है। वह उस राजनीतिक ग्राफ का एक और छोटा निशान है जो 2007 के बाद लगातार नीचे की ओर जा रहा है। कांशीराम का सपना शायद अभी मरा नहीं है। बहुजन समाज भी कहीं नहीं गया है। उसकी सामाजिक असमानताएं और प्रतिनिधित्व के सवाल भी समाप्त नहीं हुए हैं। दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को आज भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व की उतनी ही ज़रूरत है जितनी कांशीराम के दौर में थी। लेकिन एक आंदोलन और उस आंदोलन को चलाने वाली पार्टी एक ही चीज नहीं होते। आंदोलन जमीन पर जीवित रहता है, पार्टी सत्ता की सीढ़ियों पर। कांशीराम ने आंदोलन भी बनाया और पार्टी भी। आज पार्टी बची है, आंदोलन सवालों के घेरे में है। बहुजन राजनीति की ज़रूरत आज भी मौजूद है; प्रश्न यह है कि क्या बहुजन समाज पार्टी अब भी उस ज़रूरत की सबसे प्रभावी राजनीतिक अभिव्यक्ति है? 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव शायद इस सवाल का अब तक का सबसे निर्णायक उत्तर देगा। और उस उत्तर से सिर्फ बसपा का भविष्य नहीं, बल्कि पूरे बहुजन आंदोलन की दिशा तय होगी।