क्या नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से बीजेपी के एक और सहयोगी दल जेडीयू अपने अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करेगा? कई राज्यों में बीजेपी के पूर्व सहयोगी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ओडिशा में बीजेडी, महाराष्ट्र में शिवसेना, हरियाणा में जजपा, पंजाब में अकाली दल जैसी पार्टियाँ एक समय में अपने-अपने राज्यों में प्रमुख पार्टियाँ थीं, लेकिन बीजेपी के साथ गठबंधन के बाद उनकी हालत ख़राब हो गई है। कांग्रेस जैसे विपक्षी दल लगातार आरोप लगाते हैं कि बीजेपी अपने गठबंधन सहयोगियों को निगल जाती है। तो क्या विपक्ष के इन आरोपों में दम है और क्या बिहार में भी जेडीयू के साथ ऐसा ही कुछ होने वाला है?

नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने और मुख्यमंत्री पद छोड़ने की खबर से फिर से बीजेपी पर ये आरोप लग रहे हैं। विपक्षी दलों ने सीधा आरोप लगाया है कि बीजेपी अपने सहयोगी दलों को इस्तेमाल करती है और फिर उन्हें कमजोर या खत्म कर देती है। तेजस्वी यादव ने कहा, 'बीजेपी ने नीतीश जी को हाईजैक कर लिया है। अब जेडीयू भी खत्म होने की राह पर है।' खुद जेडीयू के कार्यकर्ता नीतीश के सीएम पद छोड़ने और राज्यसभा जाने का विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेता भी यही कह रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सच में भाजपा अपने पुराने दोस्तों को खत्म करती है?
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नीतीश कुमार और जेडीयू का मामला

नीतीश कुमार साढ़े तीन दशक से बिहार की राजनीति के बड़े चेहरे हैं। हाल के विधानसभा चुनाव के सिर्फ 4 महीने बाद वे राज्यसभा जा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी ने उन्हें 'रबर स्टांप' बनाना चाहती थी, इसलिए उन्हें हटा दिया। तेजस्वी यादव ने कहा, 'भाजपा जिसके साथ जाती है, उसे बर्बाद कर देती है।'

जेडीयू के कार्यकर्ता भी नाराज हैं। उन्होंने पार्टी ऑफिस में तोड़फोड़ की। अब सवाल है कि क्या जेडीयू खत्म हो जाएगा? जेडीयू अभी भी बिहार में मजबूत है, लेकिन नीतीश के बिना पार्टी में कमजोरी आ सकती है। बीजेपी कहती है कि नीतीश जी खुद फैसला ले रहे हैं और नई सरकार मजबूत बनेगी।
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बीजेडी के साथ क्या हुआ?

ओडिशा में नवीन पटनायक की बीजेडी लंबे समय तक बीजेपी का सहयोगी रहा। 2009 तक गठबंधन था। बाद में अलग हो गए। तब भी केंद्र में बीजेडी बीजेपी का सहयोग करता रहा। 2024 के चुनाव में बीजेपी ने ओडिशा में भारी जीत हासिल की और बीजेडी बुरी तरह हार गई। नवीन पटनायक अब सक्रिय राजनीति से दूर हैं। बीजेडी की सीटें बहुत कम हो गईं। विपक्ष कहता है कि बीजेपी ने बीजेडी को खत्म करने की रणनीति अपनाई। बीजेपी का जवाब रहा है कि चुनाव में जनता ने फैसला किया।

शिवसेना के साथ क्या किया?

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना बीजेपी की सबसे पुरानी सहयोगियों में से एक थी। 2022 में शिवसेना एनडीए से अलग हुई तो पार्टी टूट गई। एकनाथ शिंदे गुट ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली। अब शिंदे गुट को ही आधिकारिक शिवसेना माना जाता है। उद्धव ठाकरे का गुट कांग्रेस-एनसीपी के साथ विपक्ष में है। विपक्ष का आरोप है कि 'भाजपा ने शिवसेना तोड़ दी और एक गुट को अपने साथ मिला लिया।' बीजेपी कहती है कि शिंदे गुट ने खुद फ़ैसला लिया। ऐसा ही आरोप एनसीपी के मामले में भी लगता है। शरद पवार की एनसीपी से अजित पवार खेमा अलग हुआ और इसने बीजेपी के साथ सरकार बना ली। बाद में अजित पवार की एनसीपी को ही असली एनसीपी माना गया। अब शरद पवार के खेमे की स्थिति कमजोर है।

हरियाणा में जजपा का हाल

हरियाणा में दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी यानी जजपा 2019 में बीजेपी की सहयोगी बनी। 2024 के चुनाव में जजपा का पूरा सफाया हो गया। एक भी सीट नहीं आई। अब जजपा कमजोर हो गई है और दुष्यंत चौटाला विपक्ष में हैं। विपक्ष कहता है कि 'भाजपा ने जजपा का इस्तेमाल किया और फिर छोड़ दिया।'

अकाली दल के साथ क्या हुआ?

पंजाब की शिरोमणि अकाली दल भाजपा की पुरानी सहयोगी थी। 2020 में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ अकाली दल ने गठबंधन तोड़ दिया। अब दोनों पार्टियां अलग हैं। अकाली दल कभी-कभी भाजपा का साथ देती है, लेकिन पूरा गठबंधन टूट चुका है। विपक्ष कहता है कि बीजेपी के साथ रहने वाले दल या तो टूट जाते हैं या कमजोर हो जाते हैं।

अन्य सहयोगी दलों के साथ क्या हुआ?

लोक जनशक्ति पार्टी भी ऐसी ही पार्टी है। चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस गुट में बंट गई। एक गुट बीजेपी के साथ, दूसरा अलग। अपना दल, राष्ट्रीय लोक दल जैसी छोटी पार्टियां भी या तो कमजोर हुईं या सीमित हो गईं। हालाँकि, बीजेपी के सहयोगी कुछ दल हैं जिनकी स्थिति ज़्यादा ख़राब नहीं हुई है। लेकिन ये पार्टियाँ बहुत छोटी हैं और इनसे बीजेपी को कोई बड़ा ख़तरा नहीं दिखता है।

विपक्ष का आरोप है कि भाजपा 'यूज एंड थ्रो' की नीति अपनाती है। यानी सहयोगी को चुनाव में इस्तेमाल करो, सत्ता में आने के बाद कमजोर कर दो।

राहुल गांधी, तेजस्वी यादव, ममता बनर्जी, स्टालिन जैसे नेता बार-बार कहते हैं कि 'भाजपा क्षेत्रीय दलों को खत्म करके पूरे देश में एक पार्टी का राज बनाना चाहती है।' वे कहते हैं कि बीजेपी पहले गठबंधन बनाती है, फिर विधायक खरीदती है, पार्टी तोड़ती है या नेता को हटा देती है।
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बीजेपी क्या कहती है?

बीजेपी विपक्ष के इन आरोपों से इनकार करती है और कहती है कि वह छोटे दलों को भी सम्मान देती है और विकास के लिए साथ काम करती है। वह यह भी कहती है कि वह गठबंधन के साथियों के लिए सीएम पद तक छोड़ देती है। इसके लिए वह महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे और बिहार में नीतीश कुमार तक की मिसाल देती रही है। लेकिन अब बीजेपी के इन्हीं मिसालों पर सवाल उठ रहे हैं। न तो शिंदे महाराष्ट्र में सीएम रहे और न ही बिहार में नीतीश सीएम रहेंगे।

अभी बिहार में नई सरकार बनेगी। सबकी नजर है कि जेडीयू का क्या होता है। क्या विपक्ष का आरोप सही साबित होगा या भाजपा फिर से मजबूत गठबंधन बनाएगी?