इंडिया गठबंधन की बैठक। फाइल फोटो
तृणमूल कांग्रेस में बगावत के बाद इंडिया गठबंधन में शामिल दलों के कांग्रेस में विलय की खबर जोर शोर से उठी। एक सुझाव आया कि तृणमूल कांग्रेस को कांग्रेस में शामिल हो जाना चाहिए ताकि पार्टी में बगावत रोकी जा सके। लेकिन तृणमूल कांग्रेस में बगावत नहीं रुकी। शिव सेना ( उद्धव ठाकरे गुट) के संजय राउत ने सुझाव दिया कि सभी विपक्षी पार्टियों को कांग्रेस में शामिल हो जाना चाहिए। राउत के सुझाव पर चर्चा शुरू होने के पहले ही शिव सेना ( ठाकरे गुट) दूसरी बार टूट गयी। कांग्रेस नेता और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राउत के सुझाव का समर्थन किया। विलय की बात अभी भी हवा में है तब तक समाजवादी पार्टी के टूटने की खबरें आने लगी हैं।
क्या इंडिया गठबंधन में शामिल करीब 23 पार्टियां एक हो सकती हैं। बी जे पी से मुक़ाबले के लिए सभी पार्टियों के विलय को एक आसान उपाय बताया जा रहा है। इसके उदाहरण के तौर पर 1977 में बनी जनता पार्टी का नाम लिया जा रहा है। 1977 में कई समाजवादी पार्टियों, लोक दल, कांग्रेस से टूटे घटक और जनसंघ पार्टी ने मिल कर जनता पार्टी का गठन किया और उत्तर भारत में कांग्रेस और इंदिरा गांधी का सफाया कर दिया। क्या इस माडल को दोहराया जा सकता है। इस तरह से बनी पार्टी कितनी टिकाऊ होगी? क्या आज की बी जे पी और 1977 के कांग्रेस की तुलना हो सकती है?
क्षेत्रीय अस्मिता का सवाल
विलय की चर्चा से पहले यह समझना होगा कि क्षेत्रीय पार्टियों का उदय कब और किन परिस्थितियों में हुआ। क्या वो सिर्फ़ कुछ व्यक्तियों की सत्ता की महत्वाकांक्षा से उपजी हैं या फिर कोई क्षेत्रीय सवाल एक नयी पार्टी के लिए जमीन तैयार कर रहा था। वैसे तो आजादी के बाद से क्षेत्रीय पार्टियों का उदय होने लगा, लेकिन उस दौर की ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां अब इतिहास बन चुकी हैं और आज के दौर में जो पार्टियां राजनीति में सक्रिय हैं वे 1990 या उसके बाद अस्तित्व में आयीं। हिंदी पट्टी की चार- पाँच बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां स्थानीय सामाजिक उभार की प्रतिक्रिया में सामने आयीं।
इनमे सबसे पहले उत्तर प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी आती है। अस्सी के दशक में दलित उभार के दौर में कांसी राम ने इसकी स्थापना की और मायावती ने शीर्ष तक पहुंचाया। इस दौर में दलित और अति पिछड़े अपने दमन के ख़िलाफ़ एक मजबूत राजनीतिक शक्ति की खोज कर रहे थे। इसके बाद आयी समाजवादी पार्टी जिसने अपेक्षाकृत रूप से समृद्ध पिछड़े वर्ग को आवाज़ दिया। बिहार में नब्बे के दशक में पहले लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल और फिर नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड और राम विलास पासवान के लोकतांत्रिक जनता पार्टी का उदय हुआ।
बी एस पी को छोड़ कर सभी पार्टियों का जन्म समाजवादी पार्टियों से होते हुए जनता दल के गर्भ से हुआ। इन पार्टियों के उदय में उनके नेताओं जैसे कांसी राम- मायावती, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, नीतीश कुमार और राम विलास पासवान जैसे नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के साथ साथ जातीय गौरव और जातीय पहचान स्थापित करने की इक्षा भी शामिल थी। साठ के दशक में डॉ राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में पिछड़ों को सौ में साठ यानी पिछड़ी जातियों के लिए 60 प्रतिशत आरक्षण के समाजवादियों के आंदोलन ने 1990 में पिछड़ों के लिए आरक्षण के कानून नेसिर्फ आरक्षण नहीं बल्कि जाति केंद्रित दलों का रास्ता भी खोल दिया।
सवर्ण खासकर ब्राह्मण नेतृत्व वाली कांग्रेस उनकी राजनीतिक सत्ता पर क़ाबिज़ होने की महत्वाकांक्षा को पूरा करने में नाकाम हो चुकी थी। नयी पार्टियों के ज़रिए मायावती, मुलायम, लालू और नीतीश मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। दलित और पिछड़ी जातियां एक कदम आगे बढ़ी लेकिन इन पार्टियों पर भी परिवारवाद हावी हो गया और वे दलित - पिछड़ा सशक्तिकरण के रास्ते से हटती गयीं। बाद में बी जे पी की अगुआई में सवर्ण एक बार फिर सत्ता पर हावी होने लगे।
कांग्रेस का विभाजन
कांग्रेस में टूट की शुरुआत आजादी के तुरंत बाद से शुरू हो गयी। सबसे पहले समाजवादी विचारधारा के जय प्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, संपूर्णानंद और राज नारायण जैसे नेताओं ने कांग्रेस से नाता तोड़ कर सोसलिस्ट पार्टी का गठन करके 1952 के चुनाव में कांग्रेस को टक्कर देने की कोशिश की और नाकाम रहे। 1966 में इंदिरा गांधी के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस फिर टूटी। 1967 के चुनावों के बाद बंगला कांग्रेस,उत्कल कांग्रेस और केरल कांग्रेस जैसी कई क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस से टूट कर बनी और सीमित सफलता के बाद समाप्त हो गयीं। लेकिन राजनीति में इसे पहला क्षेत्रीय उभार माना जा सकता है।
1977 में जय प्रकाश नारायण की पहल पर ग़ैर कांग्रेसी पार्टियां एक हो गयीं लेकिन इनके राजनीतिक लक्ष्य और महत्वाकांक्षा अलग थी इसलिए दो - तीन साल में ही जनता पार्टी कई टुकड़ों में बंट गयी। जनता पार्टी में सबसे पहले दोहरी सदस्यता का सवाल उठा। पूर्व जन संघ से आए लोगों को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सदस्यता छोड़ने के लिए कहा गया। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं ने जनता पार्टी छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी की स्थापना करके संघ के रास्ते पर चलने का फैसला किया। बाद में कांग्रेस से निकल कर ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस और शरद पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया।
आंध्र में वाई एस आर कांग्रेस भी कांग्रेस के गर्भ से जन्मी पार्टी है। इनका कांग्रेस की नीतियों से कोई ख़ास विवाद नहीं है। लेकिन व्यक्तिगत और पारिवारिक आकांक्षाएं इन्हें कांग्रेस से अलग रहने के लिए मजबूर करती हैं। ममता का राजनीतिक उत्तराधिकार उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के पास तो शरद पवार का उनकी बेटी सुप्रिया सुले के पास है। मुलायम के बाद उनके बेटे अखिलेश ने तो लालू के बेटे तेजस्वी यादव ने विरासत को संभाल रखा है। इस तरह ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां परिवारवाद में फंसती गयीं।
दक्षिण में नव जागरण
तमिलनाडु में जोसफ विजय के उदय ने पुराने द्रविड़ समीकरण को हिला दिया है लेकिन इसे द्रविड़ राजनीति का अंत मानना एक भूल होगी। विजय में डी एम के नेता स्टालिन जैसी कट्टरता नहीं है। उन्होंने अपनी सरकार और पार्टी में दलितों के साथ साथ ब्राह्मण को भी जगह दी है। लंबे समय के बाद कांग्रेस को भी सरकार में जगह मिली है। इसके बावजूद वो पेरियार द्वारा शुरू किए गए द्रविड़ आंदोलन से ज़्यादा दूरी नहीं बना सकते। विजय ईसाई हैं तो ए आई ए डी एम के नेता पूर्व मुख्यमंत्री जय ललिता ब्राह्मण थीं। जय ललिता ने शीर्ष पर पहुंच कर द्रविड़ और तमिल अस्मिता के लिए ही काम किया। विजय की सहानुभूति कांग्रेस से है लेकिन वो कांग्रेस में नहीं जा सकते हैं। इससे तमिल भावना को ठेस पहुंच सकती है। तमिलनाडु में बी जे पी की पैठ नहीं होने का एक कारण ये भी है।
हाल में बी जे पी के पूर्व अध्यक्ष अन्नामलाई के अलग नयी पार्टी बनाने का फ़ैसला भी तमिल पहले की भावना को बल देता है जिसके बिना तमिलनाडु में राजनीतिक सफलता मुश्किल है। आंध्र में तेलुगू देशम का जन्म तेलुगू अस्मिता के सवाल पर हुआ। हालांकि उसके संस्थापक एन टी रामा राव कांग्रेस से नहीं थे। तेलंगाना की भारत राष्ट्र समिति अलग राज्य के आंदोलन से निकली है। आंध्र में वाई एस आर कांग्रेस सत्ता से बाहर है। फिर भी कांग्रेस के साथ उसका आना आसान नहीं है।
महाराष्ट्र में शिव सेना का जन्म बाल ठाकरे के नेतृत्व में ग़ैर मराठा विरोधी आंदोलन से हुआ। बाल ठाकरे के बाद इसका नेतृत्व उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने संभाला। उद्धव मुख्यमंत्री तक पहुंचे लेकिन उसके बाद दो बार पार्टी टूट चुकी है। हाल में इससे टूटे 6 सांसदों ने पार्टी के कांग्रेस में विलय की आशंका को पार्टी। छोड़ने का कारण बताया। कांग्रेस विरोध और मराठी अस्मिता से उपजी इस पार्टी के कांग्रेस में विलय का रास्ता आसान नहीं लगता है।
एन डी ए बनाम इंडिया
इंडिया गठबंधन में शामिल 23 पार्टियों के मुक़ाबले एन डी ए में 33 पार्टियां हैं। एन डी ए गठबंधन में तालमेल ज़्यादा दिखाई देने का एक बड़ा कारण ये है कि इसमें शामिल जे डी यू और तेलुगू देशम के अलावे सभी पार्टीयाँ बहुत छोटी हैं। चुनाव में गिनी चुनी सीटों से उनका काम चल जाता है। तमिलनाडु और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में बी जे पी ने जूनियर पार्टनर बने रहना स्वीकार कर लिया है। दूसरी तरफ़ इंडिया गठबंधन में शामिल कई पार्टियां अपने राज्य की सत्ता के साथ देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना भी देखती हैं।
आर जे डी को बिहार में, समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में तो तृणमूल कांग्रेस बंगाल में फिर सत्ता में लौटने का सपना देख रही है। इसलिए इनका कांग्रेस में विलय संभव नहीं लगता। जो पार्टियां दोनों गठबंधन से दूरी बनाकर चलती हैं उनमे आम आदमी पार्टी का कांग्रेस से सीधा संघर्ष पंजाब, दिल्ली और कई अन्य राज्यों में है। उड़ीसा में बीजू जनता दल को किसी की फ़िक्र नहीं है। इनके नेताओं के राजनीतिक और निजी स्वार्थ दोनों कांग्रेस से नहीं मिलते।
सी पी एम और अन्य वाम पंथी पार्टियों का थोड़ा बहुत असर केरल और बंगाल में बचा है। दोनों राज्यों में उनका मुक़ाबला कांग्रेस से है। आर जे डी और समाजवादी पार्टी जैसी पिछड़ा आधारित पार्टियों के कांग्रेस के साथ मिलने से भी उनका वोट बैंक कांग्रेस की तरफ़ शिफ्ट होना आसान नहीं लगता है। जब तक कांग्रेस उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे अपने पुराने गढ़ में मजबूत नहीं होती तबतक एक मजबूत विपक्षी गठबंधन का बनना भी आसान नहीं है।