जब डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी व्यापार नीति में फिर से आयात शुल्क को केंद्रीय औजार बनाया, तो उन्होंने केवल इस्पात या एल्युमिनियम पर कर नहीं लगाया। उन्होंने भरोसे को झटका दिया।
साल 2018 के बाद दुनिया ने देखा कि फैसले अचानक आते थे। कभी राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर टैक्स बढ़े, कभी बातचीत की पेशकश हुई, कभी नई चेतावनी। बाज़ार संभलते-संभलते फिर हिल जाते थे। कंपनियाँ अपनी सप्लाई चेन दोबारा बुनने लगती थीं। संदेश साफ था। अब निश्चितता भी पक्की नहीं है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था भरोसे पर चलती है। निवेशक वर्षों की योजना बनाते हैं। उद्योग लंबी साझेदारियाँ करते हैं। जब नियम बार-बार बदलते हैं, तो समय ही ताकत बन जाता है। जो अनिश्चितता झेल सकता है, वही दूसरों को जल्दी निर्णय लेने पर मजबूर कर सकता है। इस अर्थ में शुल्क राजस्व का साधन कम और दबाव का साधन ज्यादा थे।
विकासशील देशों के लिए यह दृश्य बिल्कुल नया नहीं था। एक दौर था जब शुल्क ढाल भी थे और सीढ़ी भी। दक्षिण कोरिया ने अपने उद्योगों को समय दिया। ताइवान ने संरक्षण को निर्यात अनुशासन से जोड़ा। चीन ने तकनीक सीखी, उत्पादन बढ़ाया और दुनिया के बाजार में उतर गया। वहाँ संरक्षण स्थायी दीवार नहीं था। वह तैयारी का चरण था।
फिर वैश्वीकरण का समय आया। औसत शुल्क घटे। व्यापार नियमों में बंधा। सप्लाई चेन महाद्वीपों में फैल गईं। लगा कि अब खेल तय है।
लेकिन राजनीति अक्सर नियमों से आगे निकल जाती है।
ट्रंप की नीति ने व्यापार को फिर से सौदे की मेज पर ला दिया। शुल्क अब हिसाब-किताब नहीं थे। वे संकेत थे। वे यह जताने का तरीका थे कि रिश्ते बराबरी से नहीं, ताकत से तय होंगे।
भारत इसी बदलते समय में खड़ा था। आलोचकों का कहना है कि भारत ने जल्दी नरमी दिखाई। उसने दबाव में कुछ दरवाजे खोले। कुछ देशों ने टकराव ज्यादा देर तक झेला। भारत ने संतुलन चुना। यह बहस उचित है। पर तस्वीर पूरी देखनी चाहिए।
पहला सवाल यह है कि क्या आज भी संरक्षण ही विकास का मुख्य रास्ता है। भारत की ताकत अब दवाओं, सेवाओं और डिजिटल तकनीक में है। ये क्षेत्र शुरुआत से ही दुनिया से जुड़े हैं। अगर संरक्षण अनुशासन से न जुड़ा हो, तो वह सुस्ती ला सकता है। असली कसौटी यह है कि हमारे उद्योग प्रतिस्पर्धा के लिए कितने तैयार हैं।
दूसरा सवाल यह है कि क्या चीन का रास्ता हूबहू अपनाया जा सकता है। चीन की व्यवस्था केंद्रीकृत है। वहाँ नीति लंबे समय तक एक दिशा में चल सकती है। भारत लोकतंत्र है। यहाँ विविधता है। यहाँ सहमति बनती है। समय लगता है। इसलिए हमारी रणनीति भी हमारे स्वभाव के अनुसार बनेगी।
तीसरी बात यह है कि शुल्क को केवल अस्थायी कदम मान लेना ठीक नहीं था। यदि सामने वाला उन्हें सौदे का औजार समझता है, तो इंतजार भी जोखिम बन जाता है।
और व्यापार कभी अकेला नहीं चलता। भारत और अमेरिका के संबंध रक्षा, तकनीक और सामरिक सहयोग तक फैले हैं। कभी-कभी एक क्षेत्र में लचीलापन दूसरे क्षेत्र में जगह बनाता है। कूटनीति सीधी रेखा नहीं होती। वह संतुलन की कला है।
कृषि की चिंता स्वाभाविक है। किसान केवल आँकड़ा नहीं है। वह परिवार है। वह समाज की रीढ़ है। लेकिन समाधान केवल दीवार खड़ी करना नहीं है। समाधान खेत को बाजार से मजबूती से जोड़ना है।
भारत ने मोटे अनाज को दुनिया के सामने रखा है। बाजरा परंपरा भी है और भविष्य भी। वह कम पानी में उगता है। वह जलवायु की मार सह सकता है। यदि हम उसे पोषण और जलवायु की वैश्विक चर्चा से जोड़ें, तो मांग खुद बनेगी। तब हम बचाव में नहीं, पहल में होंगे।
तकनीक के क्षेत्र में भी संतुलन जरूरी है। निवेश को बुलाना है। साथ ही यहाँ सीखने और बनाने की अपनी क्षमता खड़ी करनी है। विश्वविद्यालय और उद्योग को जोड़ना है। शोध को प्रोत्साहन देना है। बाहर से पूँजी आए, पर समझ और कौशल यहीं जड़ पकड़ें, यही असली कसौटी है।
आज की प्रतिस्पर्धा केवल सीमा शुल्क की नहीं है। वह सप्लाई चेन की है। वह मानकों की है। वह तकनीकी क्षमता की है। दुनिया टूटी नहीं है, पर खेमों में बँट रही है। हर खेमे को भरोसेमंद साथी चाहिए।
ऐसे समय में शोर से ताकत नहीं बनती। ताकत सलीके से बनती है। एक उभरता देश हर चुनौती पर तलवार नहीं खींचता। वह अपनी धार तेज करता है।
शुल्क आएँगे और जाएँगे। सरकारें बदलेंगी। पर जो देश अपनी सड़कें मजबूत करता है, शिक्षा सुधारता है और शोध में निवेश करता है, उसकी नींव गहरी होती जाती है।
क्षणिक शक्ति चौंकाती है। जवाबी शक्ति थकाती है। पर सधी हुई शक्ति टिकती है।
आखिर में सवाल यह नहीं है कि हमने कितनी ऊँची आवाज़ में जवाब दिया। सवाल यह है कि हमने अपनी क्षमता कितनी बढ़ाई।
दुनिया में कई देश दबाव डालेंगे। कई देश शोर करेंगे। पर इतिहास अंत में उसी का साथ देता है जो ईंट पर ईंट जोड़ता है।
शुल्क भुला दिए जाएँगे। पर जो राष्ट्र अपनी ताकत को धीरे-धीरे गढ़ता है, उसका कद समय के साथ अपने आप ऊँचा होता जाता है।