सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के बहाने सुप्रीम कोर्ट में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर नए सिरे से बहस छिड़ गई है। ये बहस पूरे देश के न्यायिक और लोकतांत्रिक ढांचे को हिला देने वाली है। 9 अप्रैल 2026 को सबरीमाला मंदिर मामले की पुनर्विचार याचिकाओं पर 9 जजों की संविधान पीठ के समक्ष केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जनहित याचिका (PIL) यानी पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन की पूरी प्रणाली को समाप्त करने का आग्रह किया। सरकार ने तर्क दिया, “समय आ गया है कि PIL को न सिर्फ रीकैलिब्रेट किया जाए, बल्कि इसे पूरी तरह हटा दिया जाए।” यह मांग उस संदर्भ में आई जब पीठ ने ग़ैर-भक्तों की तरफ़ से दायर PILs की मेंटेनेबिलिटी पर सवाल उठाए थे। केंद्र का कहना है कि PIL की मूल ज़रूरत अब पूरी हो चुकी है और इसका भारी दुरुपयोग हो रहा है। सवाल उठा रहा है कि क्या केंद्र सरकार जन हित याचिकाओं से डर गई है इसीलिए खत्म करने की मांग कर रही है?

केंद्र सरकार ने यह मांग क्यों की?

केंद्र सरकार का मुख्य तर्क यह है कि PIL 1970-80 के दशक की ज़रूरत थी, जब ग़रीबी, अशिक्षा, सामाजिक बहिष्कार और क़ानूनी सहायता की कमी के कारण लाखों लोग अदालत तक नहीं पहुंच पाते थे। आज ई-फाइलिंग, नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA), ज़िला लीगल सर्विसेज अथॉरिटीज़ और बेहतर न्याय पहुंच से स्थिति बदल चुकी है। सरकार का दावा है कि PIL अब “एजेंडा-ड्रिवन” याचिकाओं का माध्यम बन गई है, ख़ासकर धार्मिक प्रथाओं, नीतिगत मामलों और व्यक्तिगत हितों में हस्तक्षेप के लिए। सबरीमाला मामले में ग़ैर-भक्तों की तरफ़ से दायर याचिकाओं का ज़िक्र करते हुए सरकार ने कहा कि PIL अब “संवैधानिक अपवाद” नहीं, बल्कि “संस्थागत ओवररीच” का हथियार बन गई है। PIL दाखिल होने की संख्या 1985 के 25,000 से बढ़कर 2019 में 70,836 हो गई, लेकिन इनमें से ज्यादातर “माइन्यूस्क्यूल प्रतिशत” ही सच्ची जनहित की होती हैं।
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PIL से केंद्र सरकार को क्या है खत़रा?

सरकार का मानना है कि PIL अब नीति-निर्माण में अनावश्यक हस्तक्षेप का ज़रिया बन गई है। पर्यावरण, धार्मिक रीति-रिवाज, CAA-NRC जैसे संवेदनशील मुद्दों, किसान कानूनों या विकास परियोजनाओं पर PILs के ज़रिए अदालतें कार्यपालिका के फ़ैसलों पर रोक लगा सकती हैं। इससे “न्यायिक सक्रियता” नामक ओवररीच का आरोप लगता है। कुछ PILs को “पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन” कहा जाता है, जहां छिपे एजेंडे, राजनीतिक मक़सद या गै़र-सरकारी संगठनों के दबाव से याचिकाएं दायर होती हैं। सरकार का तर्क है कि इससे वास्तविक पीड़ित व्यक्ति की बजाय “सर्वोगेट लिटिगेशन” बढ़ता है और अदालतों का समय बर्बाद होता है। परंतु आलोचक इसे लोकतंत्र की रक्षा का हथियार मानते हैं, क्योंकि PIL ने भ्रष्टाचार (2G, कोल घोटाला जैसे मुद्दों में अप्रत्यक्ष रूप से) और अधिकारों के उल्लंघन को उजागर किया है।

क्या है PIL की संवैधानिक वैधता?

संविधान में PIL शब्द का कहीं उल्लेख नहीं है, लेकिन यह रास्ता संविधान के ही अनुच्छेद 32 (मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका) और अनुच्छेद 226 (हाई कोर्ट में) से निकला है। 1970 के दशक में न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर और पी.एन. भगवती ने “लोकस स्टैंडी” (याचिकाकर्ता का सीधा हित जुड़ा होना) के स़ख्त नियम को ढीला कर दिया। उन्होंने “एपिस्टोलरी ज्यूरिस्डिक्शन” अपनाया– यानी पत्र, पोस्टकार्ड या समाचार रिपोर्ट को भी याचिका माना जा सकता है। 1981 के एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (जजेस ट्रांसफर केस) में सुप्रीम कोर्ट ने PIL को औपचारिक रूप से परिभाषित किया और कहा कि कोई भी “जन-हित” के लिए याचिका दायर कर सकता है, भले उसका व्यक्तिगत हित न जुड़ा हो। 

यह न्यायिक सक्रियता का परिणाम था, ख़ासकर 1975 के आपातकाल के बाद, जब न्यायपालिका ने कार्यपालिका पर अंकुश लगाने का फैसला किया।

PIL की अहमियत और ज़रूरत

PIL की अहमियत और लोकतंत्र में इसकी ज़रूरत अतुलनीय है। लोकतंत्र में न्याय सिर्फ अमीरों या प्रभावशाली वर्गों के लिए नहीं, बल्कि ग़रीब, दलित, आदिवासी, महिला और पर्यावरण के लिए भी होना चाहिए। PIL ने अदालत को “जन-आंदोलन” का मंच बनाया। इससे लाखों बंधुआ मजदूर, क़ैदी, प्रदूषण पीड़ित और यौन शोषण के शिकार लोगों को न्याय मिला। यह “चेक एंड बैलेंस” का मज़बूत स्तंभ है– कार्यपालिका की मनमानी, क़ानूनों का दुरुपयोग या मौन को चुनौती देता है। बिना PIL के गरीबों के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21– जीवन का अधिकार) सिर्फ काग़ज़ी रह जाते। लोकतंत्र में PIL “वॉयस ऑफ द वॉयसलेस” है। यह सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और मानवाधिकारों को मजबूत करती है। आलोचना सही है कि इसका दुरुपयोग होता है, लेकिन समाप्ति से लोकतंत्र कमज़ोर होगा। सुधार बेहतर विकल्प है– जैसे सख़्त फिल्टर, जुर्माना और एजेंडा-आधारित याचिकाओं पर रोक।
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जनहित याचिकाओं का इतिहास 1970

PIL का इतिहास 1970 के दशक से शुरू होता है। पहली PIL 1976 में मुंबई कामगार सभा बनाम अब्दुलभाई फ़ैज़ल्लाभाई केस में आई। लेकिन असली क्रांति 1979 के हुसैनारा ख़ातून बनाम बिहार राज्य मामले से हुई। इसमें बिहार के हज़ारों विचाराधीन कैदियों (undertrials) की दुर्दशा उजागर हुई, जिन्हें अधिकतम सज़ा से ज़्यादा समय जेल में बिताना पड़ा। कोर्ट ने “त्वरित न्याय” को मौलिक अधिकार माना और 40,000 क़ैदियों की रिहाई का आदेश दिया। 1981 के एस.पी. गुप्ता मामले ने PIL को मजबूत आधार दिया। 1984 के बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ में बंधुआ मज़दूरी पर रोक लगाई गई।

जनहित याचिकाओं पर अहम फ़ैसले

कुछ अहम PIL फ़ैसले लोकतंत्र की मिसाल बने। 1980 के दशक में एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ केस ने पर्यावरण संरक्षण को नई दिशा दी।‌ गंगा प्रदूषण पर रोक, वाहन प्रदूषण मानक, भोपाल गैस त्रासदी में ज़िम्मेदारी तय की। विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) में यौन उत्पीड़न पर “विशाखा गाइडलाइंस” जारी किए गए, जो बाद में POSH कानून बने। परमानंद कटारा बनाम भारत सरकार मामले ने सड़क दुर्घटना में पीड़ितों को तत्काल चिकित्सा का अधिकार सुनिश्चित किया। सन 2018 के नवतेज सिंह जोहर मामले में समलिंगी संबंधों को अपराधमुक्त किया गया। कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ में निष्क्रिय ईथनेशिया (passive euthanasia) को मंज़ूरी मिली। इन फ़ैसलों ने अनुच्छेद 21 को विस्तार दिया – जीवन का अधिकार अब स्वच्छ पर्यावरण, सम्मानजनक जीवन, शिक्षा और स्वास्थ्य तक फैल गया।
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जनहित याचिकाओं की आलोचना

हालांकि, PIL की आलोचना भी पुरानी है। 1990 के दशक से “PIL फ्लड” की शिकायतें आईं। कुछ याचिकाएं राजनीतिक, कुछ व्यक्तिगत बदले की भावना से दायर होती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद कई बार कहा कि PIL को “पब्लिसिटी इंटरेस्ट” न बनने दें। 2000 के बाद कोर्ट ने गाइडलाइंस जारी की।‌ याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता जांची, कइयों पर जुर्माना लगाया और बिना आधार की कई याचिकाएं ख़ारिज कीं। केंद्र की मौजूदा मांग इसी दुरुपयोग पर आधारित है, लेकिन CJI सूर्यकांत ने साफ़ कहा, “अदालतें PIL स्वीकार करने में पहले से बहुत सतर्क हैं। हम हर रोज़ वास्तविक कारण जांचते हैं। नोटिस तभी जारी होता है जब दम हो।”
केंद्र सरकार के तर्क चाहे जो हों, सच्चाई यह है कि वक्त के साथ जनहित याचिकाएं और इनके ज़रिए न्याय पाने का सिस्टम भारतीय लोकतंत्र का अभिन्न अंग बन चुका है। यह न्याय को सुलभ बनाता है, शक्तियों के संतुलन को बनाए रखता है और सामाजिक परिवर्तन लाता है। केंद्र की मांग सुधार की दिशा में सोचने योग्य है, लेकिन इसे पूरी तरह खत्म करने से ग़रीबों का न्याय पाने का दरवाज़ा बंद हो जाएगा। PIL को ख़त्म करने की बजाय इसे मज़बूत फिल्टर, समयबद्ध सुनवाई और दुरुपयोग पर सख़्त सज़ा देकर बचाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है – “हम सतर्क हैं।” अब ज़रूरत है कि कार्यपालिका, न्यायपालिका और नागरिक तीनों मिलकर PIL को उसके मूल उद्देश्य – सच्चे जनहित – तक सीमित रखें। लोकतंत्र तभी मज़बूत होगा जब न्याय हर नागरिक तक पहुंचे, बिना किसी के एजेंडे का शिकार बने। PIL ख़त्म नहीं, बल्कि परिष्कृत होना चाहिए – ताकि यह लोकतंत्र का हथियार बने रहे, बोझ न बने।