बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के एक मात्र बेटे निशांत कुमार अब 50 साल की उम्र में परिवारवाद के पैराशूट से राजनीति में उतर गए हैं। नीतीश के मुख्यमंत्री पद छोड़ने और राज्य सभा में जाने के बाद नयी सरकार में उनका शामिल होना तय है। देर सबेर पार्टी का नेतृत्व भी उन्हें सौंपा जा सकता है। नीतीश ने अपने राजनीतिक गुरु जॉर्ज फ़र्नांडीस, कर्पूरी ठाकुर और जय प्रकाश नारायण (जे पी) के रास्ते पर चलते हुए अपने परिवार को अब तक राजनीति से दूर रखा था। स्थिति ये थी कि जब उनकी पत्नी जीवित थीं तब भी वो और उनके बेटे निशांत उनके साथ मुख्यमंत्री निवास में नहीं रह कर एक अलग मकान में रहते थे। अपने गुरुओं की तरह नीतीश हमेशा वंशवाद के विरोधी थे। पार्टी में परिवार को बढ़ावा देने के कारण नीतीश हमेशा लालू यादव की आलोचना करते रहे हैं। लेकिन अब नीतीश की राजनीतिक विरासत भी उनके परिवार में ही जा रही है।
राजनीति के पंडितों का मानना है कि बेटे को राजनीति में उतारने का फ़ैसला नीतीश से ज़्यादा उनकी पार्टी के नेताओं, खास कर उनके क़रीबियों का है। नीतीश के बाद पार्टी का कोई भी नेता उनकी राजनीतिक विरासत संभालने में सक्षम दिखाई नहीं दे रहा है इसलिए निशांत मजबूरी बन गए हैं। पार्टी के नेताओं को उम्मीद है कि नीतीश ने अति पिछड़ा, अति दलित और महिलाओं का जो वोट बैंक तैयार किया है उसे निशांत एकजुट रख पाएंगे। राजनीति का गुण सिखाने के लिए नीतीश मौजूद हैं और केंद्र में रह कर भी वो निशांत को राजनीति की महारत हासिल करने की कुंजी थमा सकते हैं। बड़ा सवाल ये है कि करीब 20 सालों तक सत्ता में रहने वाली पार्टी में कोई एक भी नेता ऐसा क्यों नहीं है जो नीतीश की विरासत को संभाल सके?

अति पिछड़ों का दाँव

नीतीश कुमार की राजनीति अति पिछड़ा यानी ईबीसी (इकोनॉमिकली बैकवर्ड क्लास) के इर्द गिर्द घूमती है। 1990 में लालू यादव की सरकार बनने के बाद बिहार में ओबीसी (अदर बैकवर्ड क्लास) का दबदबा बढ़ना शुरू हुआ। लेकिन उसका ज़्यादा फायदा यादवों को मिला। 1974 के छात्र आंदोलन की उपज नीतीश कुमार भी लालू यादव के साथ जनता दल में थे। ये साथ करीब 15-20 वर्षों तक चला। धीरे-धीरे नीतीश ने महसूस कर लिया कि “लालू और यादव” वर्चस्व के बीच उनका कोई भविष्य नहीं हो सकता है।

लालू की राजनीति का अवसान

अपनी अलग पहचान बनाने के लिए 1993-94 में नीतीश ने बिहार में “कुर्मी चेतना रैली” और ओबीसी के अंदर ईबीसी के लिए अलग कोटा की मांग शुरू की। नीतीश का ये फॉर्मूला चल निकला। लेकिन लालू यादव के वर्चस्व को तोड़ना आसान नहीं था। 1994 में उन्होंने जॉर्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर जनता दल को तोड़ दिया और समता पार्टी का गठन किया और खुल कर लालू के खिलाफ खड़े हो गए। इसके बावजूद 1995 में लालू को जबरदस्त जीत मिली और वो फिर मुख्यमंत्री बन गए। लालू का राजनीति अवसान 1997 में शुरू हुआ जब चारा घोटाला में उन्हें जेल जाना पड़ा। इसी दौर में लालू ने जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) बना लिया और अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना कर सरकार और पार्टी पर नियंत्रण कायम रखा।

सन 2000 में पहली बार नीतीश को मुख्यमंत्री बनने का मौक़ा मिला लेकिन विधान सभा में बहुमत नहीं मिलने के कारण एक सप्ताह में ही कुर्सी छोड़नी पड़ी।

राबड़ी देवी फिर मुख्यमंत्री बनीं और 2005 के चुनावों तक सत्ता पर काबिज रहीं। इस दौरान लालू को कई बार जेल जाना पड़ा। इस दौर में बिहार अपराध का पर्याय बन गया। अपहरण, फिरौती, लूट और खुलेआम हत्या, आम हो गया। नीतीश और बीजेपी ने लालू परिवार के शासन को जंगल राज का नाम दिया। नीतीश 2005 में बीजेपी के साथ एनडीए गठबंधन में चुनाव में उतरे। एनडीए को बहुमत मिला और लालू परिवार को उन्होंने सत्ता से उखाड़ फेंका। 

नीतीश का वोट बैंक

2005 तक नीतीश अति पिछड़ों के साथ अति दलितों को जोड़ चुके थे। “लालू और यादव” वर्चस्व तथा खुले अपराधों के कारण सवर्णों का एक बड़ा वर्ग नीतीश और एनडीए के साथ आ गया था। मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश ने महिलाओं को एक अलग वोट बैंक में विकसित किया। स्कूल जाने वाली लड़कियों को साइकिल बाँटकर और पंचायतों में आरक्षण देकर नीतीश ने महिलाओं को अपने पुरुष परिवार वालों की सोच से अलग अपनी इच्छा से वोट डालने के लिए प्रेरित किया।

जेडीयू का संकट

लालू यादव की तरह नीतीश की पार्टी में कोई बड़ा नेता नहीं उभर पाया। एक समय पर उपेंद्र कुशवाहा को नीतीश के बाद अति पिछड़ों का बड़ा नेता माना जाने लगा था। लेकिन जल्दी ही उन्हें पार्टी से बाहर जाना पड़ा। इस समय चार नेताओं को उनकी पार्टी में सबसे ज़्यादा अहमियत प्राप्त है। इनमें केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह भूमिहार और सांसद संजय झा ब्राह्मण हैं इसलिए जातियों के खेमे में बंटे बिहार में वो अति पिछड़ों की पार्टी का नेता नहीं हो सकते। बिहार सरकार में मंत्री विजय चौधरी और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा अति पिछड़े समुदाय से हैं लेकिन पार्टी को संभाल पाने का दम ख़म नहीं दिखा पाए हैं।

पार्टी के नेता समझते हैं कि नीतीश के बाद पार्टी को बचा पाना उनके बस में नहीं है। इसलिए लंबे समय से वो निशांत को पार्टी में शामिल करने की मांग कर रहे थे। लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव की तरह निशांत के पास कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है।

तेजस्वी से मुक़ाबला कर पाएँगे निशांत?

तेजस्वी करीब 25 साल की उम्र (2015) में एमएलए और नीतीश की सरकार में उप मुख्यमंत्री बन गए थे। यह सरकार दो साल में ही गिर गयी थी। बाद में 2022-23 में नीतीश की ही सरकार में वो फिर उप मुख्यमंत्री बने। ये सरकार भी ज़्यादा दिनों तक नहीं चली। तेजस्वी ने लालू को चारा घोटाला में सजा और उनके बीमार होने के कारण 2020 और 2025 में विधान सभा तथा 2019 और 2024 के लोक सभा चुनावों का नेतृत्व किया। यह अलग बात है कि वो पार्टी और अपने महा गठबंधन को बड़ी जीत नहीं दिला सके लेकिन चुनावी राजनीति का उन्हें लंबा अनुभव हो चुका है। निशांत उनका मुक़ाबला कर पाएंगे या नहीं, इसको लेकर कई सवाल हैं। बहरहाल बीजेपी की अपना मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा जरूर पूरी होती दिखाई दे रही है।