राममंदिर के चढ़ावा में चोरी के लगभग सत्तर मामलों में पक्के सबूत मिलने के बाद भी मंदिर ट्रस्ट और उत्तर प्रदेश शासन द्वारा गठित एसआईटी की कार्रवाई का पहला दौर बीत जाने के बाद भी भरोसा नहीं हो रहा है कि मामले के दोषियों को सजा मिल पाएगी या असली अपराधी और मंदिर आंदोलन के असली लाभार्थियों का कभी बाल भी बांका हो पाएगा। इतना जरूर होगा कि कुछ दोषी पकड़े जाएंगे और शायद थोड़ी सजा भी पा जाएंगे। यह भी होगा ही कि आगे से प्रबंधन थोड़ा ज्यादा चौकस होगा और विश्व हिन्दू परिषद को चन्दा संबंधी गड़बड़ी पर नोटिस देने वाले विश्वबंधु गुप्त को परेशान करने से लेकर अयोध्या में जमीन रजिस्ट्री के स्पष्ट घोटाले जैसे मामले सामने आने पर आँख बंद नहीं किया जाएगा। 

लेकिन आम लोगों के नज़रिये से हुए इस महापाप की सजा, प्रायश्चित्त और मंदिर आंदोलन के ‘पुण्य-प्रताप’ से सत्ता में बैठने और मालामाल होने वालों तक इस कांड की आंच पहुंचेगी, इसकी संभावना कम ही लगती है। सारा कुछ राजनीतिक नुकसान कम करने के प्रबंधन से जुड़ा लग रहा है। अभी तक एक भी कदम दोषियों को पकड़ने और सजा दिलाने की तरह ठोस उठाया नहीं लगता- बुलडोजर चलाने और एनकाउंटर करने का यूपी का मॉडल लागू करने का तो कोई वकालत भी नहीं कर सकता।
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जो खबरें आई हैं उनके अनुसार मंदिर ट्रस्ट के प्रमुख नृत्य गोपाल दास समेत सभी सदस्य बहुत गुस्से में थे लेकिन किया इतना ही कि इस्तीफा दे चुके सदस्यों का इस्तीफा मंजूर कर लिया गया। शायद इसे न मानने का प्रावधान भी नहीं है। उधर मुख्य कर्ताधर्ता चंपत राय यह संकल्प दोहराते घूम रहे हैं कि वे यह अपयश लेकर अयोध्या से वापस नहीं जाएंगे। उनके पक्ष में कथित संत समाज के कुछ लोग खुला समर्थन घोषित करने लगे हैं और एसआईटी ने उनको और उनके चेले को बरी ही कर दिया। 

पहली नजर में यह मामला आरोपी द्वारा खुला घूमने की स्थिति का लाभ लेने का लगता है और वे जांच या दंड प्रक्रिया को प्रभावित करते दिखते हैं। अजीब यह है कि कोषाध्यक्ष महाराज भी खुलेआम कह रहे हैं कि उनको चढ़ावा और चन्दा से कोई लेना देना नहीं रहा है। एक और वरिष्ठ नृपेन्द्र मिश्र सब कुछ बीतने पर प्रकट हुए और ऐसा बयान दिया जैसे इस प्रकरण से उनका कोई लेना देना ही नहीं है। संसद में नया कानून बनाकर मंदिर का नया प्रशासन देने वाले या उत्तर प्रदेश में शासन संभालने और रामराज्य लाने का दावा करने वाले ‘दूध का दूध और पानी का पानी करने’ कहने के अलावा ज्यादा कुछ करते नजर नहीं आये हैं।

चंदा चोरी का मामला सामने आने के बाद एफआईआर दर्ज कराने से लेकर एसआईटी में ट्रस्ट प्रशासन के लोगों को रखने और जांच की अवधि बढ़ाने जैसी बुनियादी गलतियों को अगर आप चूक मान लेंगे तो आपसे इस बड़े अनैतिक अपराध की गंभीरता और उसके प्रायश्चित और सजा के प्रसंग में उससे भी बड़ी चूक हो जाएगी।

असल में यह मान मनौव्वल से रिकवरी कराकर मामले को रफा दफा कराने और दोषियों को थोड़ा बहुत दांत फटकार देने का प्रयास हो सकता है। कल जो दान के कीमती सामान प्रदर्शित हुए उसमें कुछ इसी तरह रिकवर हुए हो सकते हैं। चोरी के ठोस प्रमाण के बाद अपराधियों को खुला छोड़ना और बाद में कुछ को पुलिस रिमांड की जगह न्यायिक हिरासत में भेजने का फैसला इसी चलते हुआ होगा। अभी भी ट्रस्ट किस अधिकार से अपनी कार्यपद्धति में बदलाव और सीईओ जैसा पद बनाने का फ़ैसला कर रहा है, यह साफ़ नहीं है। हम जानते हैं कि पंद्रह दिन में फ़ैसला होने की अवधि किस तरह बढ़ती गई है और अब ट्रस्ट दोबारा पंद्रह दिन बाद बैठेगा तब तक काफी कुछ धूल बैठ चुकी होगी। जिस तरह विनय कटियार जैसे लोग एक दिन एक सुर में बोलते हैं और अगले दिन पलट जाते हैं, यह मैनेजमेंट की संघ की स्टाइल है।

संघ और बीजेपी का मैनेजमेंट

संघ और बीजेपी का मैनेजमेंट स्टाइल अब अनजान भी नहीं है। और उसमें किन किन चीजों का प्रयोग होता है और हो सकता है यह अज्ञात नहीं है। लेकिन इस बार एक खास बात है। इस बार असली नाराजगी उन साधु संतों में है जिनको राम के नाम से तो मतलब है लेकिन जिनको सत्ता और राजनीति से कोई खास मतलब नहीं है। उनको धन का भी वैसा मोह नहीं है। 

अब यह जरूर है कि उनकी सहमति से ही अब तक मंदिर आंदोलन में भाजपा शामिल हुई थी और इससे आंदोलन बड़ा हुआ और मंदिर निर्माण संभव हुआ। लेकिन जब मंदिर एक संप्रदाय की मिल्कियत की चीज है तो उसके लोग संघ और भाजपा से दूरी बना सकते हैं या उनको ट्रस्ट से बाहर रखने का फैसला ले सकते हैं। यह बहुत दूर की कौड़ी लग सकता है लेकिन हिन्दू परंपराओं में इस किस्म का स्पष्ट विभाजन रहा है। अभी तक किसी शंकराचार्य द्वारा भगवान राम का मंदिर में जाकर दर्शन न करना भी उससे जुड़ा है और इसे कोई अपराध नहीं मानता। अब महंत नृत्य गोपाल दास और उनके सहयोगी इस महापाप के प्रायश्चित और अपराधियों को दंड दिलाने के लिए अपने कामकाज में इतनी सफाई लाते हैं या चुप हो जाते है (मैनेज हो जाते हैं) यह देखने की चीज होगी।
पर यह अपराध जितने बड़े पैमाने का है और अभी तक समाज में जो प्रतिक्रिया दिखती है उसमें सिर्फ प्रबंधन कौशल से काम हो जाए और सारे लोग मैनेज हो जाएं यह संभव नहीं लगता है। यह भरोसा टूटने का मामला है-राजनैतिक भरोसा नहीं आस्था और धार्मिक भरोसा टूटने का मामला है। इसमें सेकुलरिज्म छोड़ने और उसका मजाक उड़ाने तक की बात तो मैनेज हो गई थी लेकिन हिन्दू आस्था के साथ हुआ खिलवाड़ और उसमें सबसे ताकतवर लोगों की सहमति या लापरवाही या गैर जिम्मेवारी का सवाल भी जुड़ा हुआ है। 

जिन लोगों ने नोटबंदी की असफलता को, कृषि कानूनों पर असफलता को, कोविड की तालाबंदी के दुष्प्रभावों को जैसे तैसे मैनेज कर लिया उनके लिए भी इस प्रसंग को संभालना मुश्किल रहेगा। यह प्रकरण समाज के उसी वर्ग के भरोसे को आहत करने वाला बना है जो हिन्दू धर्म और संप्रदायों का आधार रहा है बल्कि संघ और बीजेपी का भी अंध भक्त रहा है। लेकिन जब भक्ति में सीधे राम के प्रति निष्ठा का सवाल आये तो वह प्रबंधन कौशल से संभाल जाए यह लगता तो नहीं है।