मोदी सरकार ने अचानक पर्यावरण एक्टिविस्ट और लद्दाख के प्रख्यात कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की रिहाई का रास्ता साफ़ कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट में उनके मामले की सुनवाई से महज़ दो दिन पहले गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत लगाए गए डिटेंशन को वापस ले लिया। 14 मार्च 2026 को यह फैसला लिया गया, जबकि सुनवाई 17 मार्च को तय थी। वांगचुक क़रीब 170 दिन जेल में रहे। बिना किसी मुक़दमे के। यह घटनाक्रम न सिर्फ सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता है, बल्कि पूरे लोकतंत्र की परीक्षा लेता है। यह रिहाई न्याय की जीत है या सुप्रीम कोर्ट से बचने का चालाकी भरा क़दम? क्या सरकार की गिरफ्तारी वाली भाषा और अब की भाषा में फ़र्क़ साफ दिखाता है। गोदी मीडिया ने वांगचुक को देशद्रोही साबित करने में कोई कोर क़सर बाक़ी नहीं छोड़ी। लेकिन सवाल उठाता है कि क्या यह सरकार असहमति को दबाने की मशीन बन गई है?

क्या सरकार को सुप्रीम कोर्ट से डर था?

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से ठीक दो दिन पहले गृह मंत्रालय का यह क़दम संयोग नहीं हो सकता। वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे आंगमो ने हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की थी, जिसमें NSA डिटेंशन को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने पहले ही सरकार के दस्तावेज़ पर सवाल उठाए थे—वांगचुक के भाषणों का अनुवाद ग़लत और लंबा बताया गया था। बेंच ने पूछा था कि मूल भाषण से अनुवाद में इतना फ़र्क़ क्यों? सरकार ने वांगचुक को “चीफ़ प्रोवोकेटर” बताया था, लेकिन कोर्ट के सवालों से साफ था कि डिटेंशन का आधार कमज़ोर पड़ रहा था।

NSA वापसी का रहस्य

14 मार्च को मंत्रालय ने NSA की धारा 14 का इस्तेमाल कर दुर्लभ क़दम उठाया और डिटेंशन रद्द कर दिया। गृह मंत्रालय के आधिकारिक बयान में कहा गया कि वांगचुक ने पहले ही आधे समय की सज़ा काट ली है और अब “शांतिपूर्ण माहौल” बनाने के लिए यह जरूरी है। लेकिन सच्चाई यह है कि सुनवाई 17 मार्च को थी और कोर्ट ने कहा था कि अब कोई नया तर्क नहीं सुना जाएगा। क्या सरकार को डर था कि कोर्ट फटकार लगाएगा या डिटेंशन को अवैध घोषित कर देगा? NSA जैसे काले कानून का इस्तेमाल बिना मुक़दमे जेल भेजने के लिए होता है। अक्सर इसका दुरुपयोग होता है। मोदी सरकार ने लद्दाख में शांति बहाल करने का दावा किया, लेकिन असल में यह सुप्रीम कोर्ट की नज़र से बचने का तरीक़ा लगता है। अगर कोर्ट ने डिटेंशन ग़लत पाया तो पूरे मामले में सरकार की छवि धूमिल होती। यह फ़ैसला न सिर्फ वांगचुक की रिहाई का रास्ता साफ करता है, बल्कि सरकार की कमज़ोरी उजागर करता है—असहमति को दबाने के लिए कानून का सहारा लेना, फिर कोर्ट के डर से पीछे हटना। यह लोकतंत्र है या तानाशाही की छाया?

मोदी सरकार का दोहरा चरित्र उजागर

सितंबर 2025 में वांगचुक की गिरफ्तारी के वक़्त सरकार की भाषा बिल्कुल अलग थी। लद्दाख प्रशासन और गृह मंत्रालय ने उन्हें “अरब स्प्रिंग स्टाइल” विद्रोह भड़काने वाला, नेपाल के जेन-ज़ी आंदोलन का हवाला देने वाला और सरकार को “ओवरथ्रो” करने की कोशिश करने वाला बताया था। 24 सितंबर 2025 को लेह में हिंसक प्रदर्शन हुए। इसमें चार मौतें हुईं। इनका ठीकरा वांगचुक पर फोड़ा गया। कहा गया कि वे भूख हड़ताल के ज़रिए लोगों को भड़का रहे थे। पाकिस्तान से लिंक की जांच चल रही है और उनकी गतिविधियां “राज्य की सुरक्षा के लिए हानिकारक” हैं। 

वांगचुक को जोधपुर जेल भेजा गया, 1600 किलोमीटर दूर, ताकि लद्दाख में उनकी आवाज़ न पहुंचे। सरकारी बयान में उन्हें “देशद्रोही” जैसा चित्रित किया गया—उल्टा-सीधा आरोप, बिना ठोस सबूत के।

बदल गए सरकार के सुर

अब, रिहाई के बाद सरकार क्या कह रही है? “शांति, स्थिरता और आपसी विश्वास” का माहौल बनाने के लिए डिटेंशन वापस लिया गया। कहा गया कि संवाद के लिए रास्ता साफ़ करना ज़रूरी है। कोई माफ़ी नहीं, कोई स्वीकारोक्ति नहीं कि गिरफ़्तारी ग़लत थी। बस, “रचनात्मक संवाद” का जुमला। यह दोहरा चरित्र साफ दिखता है। गिरफ्तारी के समय वांगचुक को ख़तरा बताया गया, अब उन्हें संवाद का हिस्सा बनाने की बात। क्या सरकार ने छह महीने तक एक निर्दोष कार्यकर्ता को जेल में रखकर अपनी ग़लती छिपाई? NSA का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए किया गया, फिर कोर्ट के दबाव में वापस लिया। मोदी सरकार का यह रुख़ न सिर्फ वांगचुक के साथ अन्याय है, बल्कि पूरे देश के लोकतंत्र पर सवाल खड़ा करता है। जहां एक तरफ “सबका साथ, सबका विकास” का नारा, वहीं असहमति को “राष्ट्रीय सुरक्षा” का ख़तरा बताना- हाइपोक्रिसी की हर सीमा को लांघना है।

मीडिया ने देशद्रोही की तरह पेश किया: अब क्या कहेगा?

गिरफ़्तारी के समय कुछ मीडिया चैनलों ने वांगचुक को “देशद्रोही” और “एंटी-नेशनल” का तमगा लगाने में कोई क़सर नहीं छोड़ी। वे वही वांगचुक थे, जिन्होंने “3 इडियट्स” फिल्म को प्रेरित किया, आइस स्टूपा बनाकर पर्यावरण का चेहरा बने। लेकिन अचानक वे “अरब स्प्रिंग” वाले विद्रोही बन गए। टीवी डिबेट्स में उन्हें पाकिस्तान से जोड़ा गया, उनकी भूख हड़ताल को “देश तोड़ने की साजिश” बताया गया। कुछ अख़बारों ने उन्हें “ट्रेटर” यानी ग़द्दार तक कह डाला। मीडिया ने ख़ुद को सरकार का एक्सटेंशन बना लिया—तथ्य छोड़कर प्रोपगैंडा फैलाया। “देशद्रोही” शब्द बार-बार दोहराया गया, ताकि जनता वांगचुक को ख़तरा समझे। यह मीडिया का दोहरा चरित्र था, जो सरकार की लाइन पर चलता है।
अब रिहाई के बाद मीडिया क्या कहेगा? ज़्यादातर चैनल चुप हैं या मामूली ख़बर चला रहे हैं। कोई माफ़ी नहीं, कोई स्वीकारोक्ति नहीं कि हमने ग़लत चित्रण किया। क्या अब वे कहेंगे कि वांगचुक निर्दोष थे? या फिर चुपचाप अगली ख़बर पर चले जाएंगे? यह घटना मीडिया की स्वतंत्रता पर सवाल उठाती है। मोदी सरकार के दौर में कई बार देखा गया कि असहमति को “देशद्रोह” बताकर दबाया जाता है। वांगचुक की रिहाई ने मीडिया को आईना दिखाया—जो सरकार की बात दोहराता है, वह खुद लोकतंत्र का दुश्मन बन जाता है। अब अगर मीडिया ईमानदार है तो माफी मांगे और सच्चाई बताए। वरना यह साबित होगा कि यह “देशद्रोही” मीडिया ख़ुद है, जो सच्चाई को दबाता है।

क्या हैं सोनम वांगचुक की मांगें?

दरअसल सोनम वांगचुक पर्यावरण और जनजातीय अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं।‌ सोनम वांगचुक की मांगें न सिर्फ लद्दाख की, बल्कि पूरे हिमालय और जनजातीय समुदायों की हैं। मुख्य मांग है—लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा या संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करना। छठी अनुसूची जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्तता देती है—भूमि, जंगल, खनन, पानी, कृषि पर स्थानीय परिषदों का नियंत्रण। लद्दाख की 90% आबादी अनुसूचित जनजाति है, लेकिन 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद इसे केंद्रशासित प्रदेश बना दिया गया बिना इन सुरक्षा के। वांगचुक मांगते हैं कि लद्दाखी अपनी भूमि, संस्कृति और पर्यावरण की रक्षा खुद कर सकें।
पर्यावरणीय मांगें भी मज़बूत हैं—जलवायु परिवर्तन से बचाव। हिमालय ग्लेशियर पिघल रहे हैं, लद्दाख सूख रहा है। वांगचुक ने आइस स्तूपा बनाकर पानी संरक्षण का मॉडल दिया। वे खनन और औद्योगिक परियोजनाओं का विरोध करते हैं, क्योंकि ये नाज़ुक इकोसिस्टम को नष्ट करेंगी। मांगें हैं—लद्दाख पब्लिक सर्विस कमीशन, लोकल जॉब रिजर्वेशन, लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग सांसद।
2025 के प्रदर्शन शांतिपूर्ण थे, लेकिन सरकार ने हिंसा का बहाना बनाया। वांगचुक की भूख हड़ताल पर्यावरण और अधिकारों के लिए थी, न कि विद्रोह के लिए। उनकी मांगें लोकतांत्रिक हैं—संवाद, सुरक्षा और विकास का सही मॉडल। लेकिन सरकार ने इन्हें “राष्ट्रीय सुरक्षा” का मुद्दा बना दिया।

सरकार उनकी मांगें मानने से क्यों कतराती रही?

मोदी सरकार क्यों वांगचुक की मांगों से कतराती रही? कारण साफ हैं—राजनीतिक और आर्थिक। 2019 में भाजपा ने लद्दाख को छठी अनुसूची का वादा किया था, लेकिन अनुच्छेद 370 हटने के बाद सिर्फ केंद्रशासित प्रदेश बना दिया। राज्य का दर्जा देने से केंद्र का नियंत्रण कम हो जाएगा। लद्दाख चीन सीमा पर है, सुरक्षा का बहाना बनाकर पूर्ण नियंत्रण रखना चाहती है सरकार। छठी अनुसूची से खनन, उद्योग और भूमि पर लद्दाखी परिषद का अधिकार आएगा, जो कॉर्पोरेट लॉबी को पसंद नहीं। 

सरकार विकास के नाम पर माइनिंग और प्रोजेक्ट्स थोपना चाहती है, लेकिन वांगचुक जैसे कार्यकर्ता इसे पर्यावरण हत्या बता रहे हैं।

दूसरा कारण—असहमति का दमन। मोदी सरकार में NSA, UAPA जैसे कानूनों का दुरुपयोग बढ़ा है। वांगचुक की गिरफ़्तारी इसी का उदाहरण है। मांगें मान ली गईं तो अन्य क्षेत्रों (जैसे मणिपुर, किसान आंदोलन) में भी मिसाल बनेगी। सरकार “एक राष्ट्र, एक नीति” की बात करती है, लेकिन जनजातीय अधिकारों को नज़रअंदाज करती है। वादे भूल गए, संवाद की जगह दमन। रिहाई के बाद भी प्रदर्शन जारी हैं।16 मार्च को राज्य और छठी अनुसूची की मांग पर प्रदर्शन होना है। सरकार कतराती है क्योंकि सच्चा संवाद करने से उसकी “विकास” वाली छवि धराशायी हो जाएगी। यह कतराहट लोकतंत्र की हार है।
मोदी सरकार इस मामले में पूरी तरह कटघरे में है। NSA का दुरुपयोग, कोर्ट से बचना, मीडिया का दुरुपयोग, पर्यावरणीय कार्यकर्ता को देशद्रोही बताना और जनजातीय मांगों को नज़रअंदाज करना—यह सब साबित करता है कि सरकार असहमति से डरती है। वांगचुक की रिहाई जीत है, लेकिन असली जीत तब होगी जब उनकी मांगें पूरी होंगी। क्या सरकार अब संवाद करेगी या फिर दमन? लोकतंत्र की परीक्षा जारी है।