मैं अमूमन अटकलों पर टिप्पणी करने से बचता हूँ । लेकिन आज एक ऐसे विषय पर लिख रहा हूँ जिसे हमारे पाठक अटकल कह सकते हैं । दरअसल, पिछले कई महीनों से दिल्ली के सत्ता के गलियारों में कुछ ऐसी चर्चा हो रही है जिस पर सहसा विश्वास करना पहले मुश्किल होता था लेकिन अब ये लगने लगा है कि अगर धुंआ उठ रहा है तो आग कहीं न कही ज़रूर जल रही होगी । हर समझदार पत्रकार, सत्ता से जुड़ा व्यक्ति और नौकरशाही में वरिष्ठ पदों पर बैठे अफ़सर एक ही बात कह रहे हैं कि कहीं कुछ न कुछ पक रहा है जिसकी आहट तो सुनाई पड़ रही है लेकिन दिखाई नहीं पड़ रहा है । सब कुछ पर्दे के पीछे है । नेपथ्य में ।
18 अगस्त 2026 को लंदन के मशहूर अखबार ‘फ़ाइनेंशियल टाइम्स’ ने एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट छापी । उसका शीर्षक था “एक संत जो मोदी का उत्तराधिकारी हो सकता है” । ये खबर योगी आदित्यनाथ के बारे में थी । खबर का मज़मून था कि योगी मोदी के बाद देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं । मैं चौंका । क्योंकि मोदी जी अभी देश के प्रधानमंत्री हैं । पार्टी और सरकार में उनके बिना परिंदा भी पर नहीं मारता तो फिर इस खबर का अर्थ क्या है ? खबर क्यों की गई ? अख़बार बड़ा है तो ये भी नहीं कह सकता कि पैसे देकर छपवाई गई है। अर्थ बिल्कुल साफ़ था कि मोदी के बाद कौन उनका उत्तराधिकारी हो सकता है, ये चर्चा सिर्फ देश में नहीं बल्कि विदेशों में भी होने लगी है ।
इस बीच मुझे याद आया कि कुछ महीने पहले दो ऑनलाइन न्यूज़ पब्लिकेशन में खबर छपी थी कि ‘गृहमंत्री अमित शाह को अगले मंत्रिमंडल फेरबदल में उपप्रधानमंत्री बनाया जा सकता है’ । इस खबर में किसी सोर्स को कोट नहीं किया गया था । बस सूत्रों के हवाले से लिखा गया था । दोनों पब्लिकेशन गंभीर माने जाते हैं तो खबर को यूं ही टाल देने का कोई मन नहीं हुआ । बात आई गई हो गई । जब योगी वाली खबर छपी तो मैं चौंका और जब मैंने उसे सत्ता के गलियारों में हो रही फुसफुसाहट से जोड़ा तो एक पैटर्न नज़र आया । और मैं धीरे धीरे इस निष्कर्ष पर पहुंचने लगा कि कुछ न कुछ घटित हो रहा है जो सामने नहीं आ रहा है । काफी पड़ताल और काफी लोगों से बातचीत करने के बाद मैं अब इस नतीजे पर पहुंचा कि बीजेपी के अंदर, और संघ परिवार में एक ‘बेचैनी’ है जिसे अभी कोई सतह पर लाना नहीं चाहता और ऐसा साफ लगता है कि यूपी चुनाव के पहले कुछ न कुछ बड़ा हो सकता है ।
वैसे ये चर्चा कोई नई नहीं है कि मोदी के बाद कौन ? नेहरू के जीवनकाल में ही ये सवाल देश और विदेश में चर्चा का सबब बन गया था कि नेहरू का उत्तराधिकारी कौन हो सकता है । कई नामों पर अटकलें लगीं । इंदिरा गांधी के समय भी ये चर्चा अस्सी के दशक में आम हो गई थी । हालाँकि तब राजीव गांधी को एक स्वाभाविक दावेदार के तौर पर देखा जाता था । लेकिन चर्चा तो चर्चा है । ये चर्चा हमेशा तभी होती है जब नेता बहुत ताकतवर हो और लंबे समय तक सत्ता के शीर्ष पर रहा हो । नेहरू 17 साल तक प्रधानमंत्री रहे । इंदिरा गांधी 16 साल और अब मोदी को 12 साल से ज्यादा कुर्सी पर बैठे हो गया है । लिहाजा उनके बाद कौन की चर्चा चले तो हैरान नहीं होना चाहिये । और इस पर भी हैरान नहीं होना चाहिये, अगर सत्ता में उनकी कुर्सी की दावेदारी के लिये कुछ बड़े नेता अपनी पेशबंदी करने लगे हों और मोहरे भी बिठाने लगे हों।
वैसे तो हमेशा ही ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है कि आख़िर कौन उत्तराधिकारी बनेगा लेकिन दावेदारी का क्या ? आज के समय में तीन बड़े दावेदार साफ़ नज़र आते है । सबसे पहला नाम याद आता है गृहमंत्री अमित शाह का । मोदी के साथ उनका रिश्ता गुरू शिष्य का है । उनका पूरा राजनीतिक कैरियर मोदी का बनाया हुआ है । गुजरात में मुख्यमंत्री बनने के साथ से ही मोदी और शाह की जोड़ी बनने लगी थी । मोदी के बाद गुजरात में वो सबसे ताकतवर व्यक्ति माने जाते थे । मोदी दिल्ली आये तो अमित शाह भी आये और देखते देखते सारे वरिष्ठ नेताओं को पीछे छोड़ते हुए नंबर दो बन गये । मोदी का नेतृत्व और शाह की रणनीति ने वो गुल खिलाया कि जहां एक ओर बीजेपी सर्वशक्तिमान पार्टी बन गयी तो कई वरिष्ठ और महत्वाकांक्षी नेताओं को बर्फ में लगा दिया गया । जो समझदार थे वो नतमस्तक हो गये, जो इगो में थे वो घर बैठा दिये गये । बीजेपी अटल आडवाणी की विरासत से निकल कर एक नई पार्टी बन गई । और ऐसे में अगर अमित शाह खुद को मोदी का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानें तो हैरानी कैसी ?
लेकिन फ़ाइनेंशियल टाइम्स की खबर एक कहानी कहती है । शाह का सफर आसान नहीं है । योगी आदित्यनाथ की दावेदारी को ख़ारिज नहीं किया जा सकता । राजनीति एक क्रूर खेल है । जीत और हार बहुत सारे तत्वों पर निर्भर करती है । योगी की सबसे बड़ी ताकत ये है कि वो सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री हैं । साढे़ नौ साल से पद पर हैं और गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर होने की वजह से उनके हिंदुत्व पर किसी को कोई शक नहीं है । वो मोदी के बाद हिंदुत्व समर्थकों में सबसे लोकप्रिय बीजेपी नेता हैं ।
हर चुनाव में मोदी के बाद उनकी मांग होती है । इस मामले में शाह कमजोर साबित होते हैं । नौकरशाही में ये चर्चा आम है कि अगर योगी तीसरी बार यूपी के मुख्यमंत्री बन गये तो मोदी की तरह उनको रोकना बहुत मुश्किल हो जायेगा । जैसे मोदी के तीसरी बार गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद दिल्ली के तथाकथित बड़े नेता उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने से नहीं रोक पाये ।
लेकिन इस खेल में एक तीसरा नाम भी जुड़ गया है । वो हैं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस । महाराष्ट्र भारत की आर्थिक राजधानी है । बड़े बड़े उद्योगपतियों का समर्थन मिलना उनके लिये सबसे आसान है । वो संघ परिवार के सबसे चहेते हैं । नागपुर से आते हैं । और राजनीतिक कौशल में निपुण माने जाते हैं । 2014 में मुख्यमंत्री बनने के बाद जिस सलीक़े से उन्होंने पार्टी में अपने प्रतिद्वंद्वियों को निपटाया वो इस बात का सबूत है कि चतुराई में वो किसी से कम नहीं हैं । फिर उनके बारे में कहा जाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और डिप्लोमेसी में वो बेहतर हो सकते हैं । यानी इस विषय में शाह और योगी से बीस ।
राजनीति के चतुर खिलाड़ी होने के बाद भी उनकी छवि एक कट्टर हिंदुत्ववादी की नहीं है । ऐसे समय में जब कि मोहन भागवत और दत्तात्रेय होसबोले को अमेरिका जा कर दुनिया को ये बताने की ज़रूरत पड़ रही है कि संघ मुस्लिम विरोधी, ईसाई विरोधी संगठन नहीं है, और उसकी तुलना श्वेत नस्लवादियों से करना उचित नहीं है, फडणवीस के दावे को मज़बूत करता है ।
वैसे अनुभव ये कहता है कि ऐसे मौकों पर अक्सर बाजी वो जीतता है जिसे रेस में नहीं माना जाता । जो सामने पर्दे पर नहीं दिखता । पर्दे के पीछे से चालों को चलता रहता है । 1991 में अर्जुन सिंह और शरद पवार की लड़ाई में नरसिंह राव बाजी मार ले गये क्योकि उन्हें सबसे कमजोर खिलाड़ी माना गया था । लाल बहादुर शास्त्री के बाद इंदिरा का चयन इस लिये कांग्रेस के दिग्गजों ने किया था क्योंकि वो मोरारजी देसाई की तुलना में “गूंगी गुड़िया” थीं । बीजेपी में ये खेल नया है । लिहाजा कुछ भी अटकल लगाना बेमानी होगा ।
एक बात तय है मोदी के बाद कौन का फ़ैसला आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व को करना है । और आरएसएस उसी शख़्स को तय करेगा जो उसके हिंदुत्व के अगले पच्चीस साल के एजेंडे को आगे बढ़ाने में मददगार होगा । भागवत की अमेरिका यात्रा इस बात का संकेत है कि संघ परिवार हिंदुत्व की बिगड़ती छवि से परेशान है और वो परिमार्जन की तैयारी में है । कौन नेता उनकी स्कीम में फिट बैठेगा, ये भविष्य को तय करने दीजिये । लेकिन ये मान लीजिये कि दिल्ली के गलियारों में कोई चर्चा ऐसे ही नहीं होती । और ये चर्चा इन दिनों गरम है तो सीधा अर्थ है कि कहीं कुछ चालें चली जा रही हैं । कुछ तो है जो नेपथ्य में है ।