असम बीजेपी में बढ़ती बगावत को दबाने की कोशिशें तेज़, लेकिन क्या पार्टी हालात संभाल पाएगी? जानें अंदरूनी संकट, कारण और चुनावी असर।
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असम विधानसभा चुनाव से पहले सत्तारूढ़ बीजेपी में बगावत तेज हो रही है। हालाँकि मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा समेत पार्टी के शीर्ष नेता अब इस पर अंकुश लगाने के लिए बागी नेताओं को मलाईदार पद देने का भरोसा दे रहे हैं। लेकिन फ़िलहाल यह कहना मुश्किल है कि यह कवायद कितनी कारगर साबित होगी।
टिकट नहीं मिलने से नाराज़गी
पार्टी में बगावत की प्रमुख वजह निवर्तमान विधायकों को टिकट नहीं मिलना है। पार्टी ने इस बार 19 विधायकों को टिकट नहीं दिया है। जले पर नमक छिड़कने की तर्ज पर कुछ सीटों पर निवर्तमान विधायकों की जगह कांग्रेस से हाल में शामिल होने वाले नेताओं को टिकट मिलने से यह नाराजगी और बढ़ी है। बीजेपी सरकार में मंत्री रही नंदिता गारलोसा ने अपने पद से इस्तीफा देकर कांग्रेस का हाथ थाम लिया है और अपनी पारंपरिक हाफलांग सीट से चुनाव लड़ रही हैं।
असम विधानसभा चुनाव के लिए कुल 776 उम्मीदवार मैदान में हैं। 26 मार्च को नाम वापस लेने की अंतिम तारीख है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि जालुकबाड़ी सीट से मुख्यमंत्री के तौर पर मैदान में उतरी कांग्रेस उम्मीदवार विदिशा नियोग का नामांकन पत्र खारिज हो गया है। जालुकबाड़ी हिमंता की पारंपरिक सीट है और वो यहां छठी बार मैदान में हैं। वो तीन बार कांग्रेस के टिकट पर यहां से जीत चुके हैं और अब तीसरी बार भाजपा के टिकट पर किस्मत आजमा रहे हैं।
नेताओं की बगावत के कारण राज्य की कुछ सीटों पर बीजेपी और उसकी अहम सहयोगी असम गण परिषद के अलावा एनडीए के घटक दलों के बीच दोस्ताना मुक़ाबले की संभावना है।
प्रदेश उपाध्यक्ष निर्दलीय लड़ रहे
बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष जयंत कुमार दास पार्टी से इस्तीफा देकर निर्दलीय के तौर पर दिसपुर सीट से मैदान में हैं। भाजपा ने यहां पूर्व कांग्रेस नेता प्रद्युत बोरदोलोई को टिकट दिया है। इसी तरह टिकट नहीं मिलने से नाराज कातीगोरा के भाजपा विधायक अमर चंद जैन अब इसी सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं।बीजेपी ने इस बार कई विधायकों और पूर्व नेताओं को टिकट नहीं दिया है। इनमें पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सिद्धार्थ भट्टाचार्य और पांच बार विधायक रहे अतुल बोरा जैसे दिग्गज शामिल हैं। टिकटों के बंटवारे में कथित भेदभाव का आरोप लगाते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता जयंत दास और विधायक निहार रंजन दास इस्तीफा दे चुके हैं।
कुछ सीटों पर एनडीए के सहयोगी दल एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में हैं। मिसाल के तौर पर शिवसागर सीट से असम गण परिषद ने प्रदीप हजारिका को टिकट दिया है तो भाजपा ने अब इस पर कुशल दोवारी को मैदान में उतार दिया है। इन दोनों का मुकाबला कांग्रेस की सहयोगी राइजोर दल के प्रमुख अखिल गोगोई से है।
इसी तरह परिसीमन के बाद नई बनी चमरिया सीट पर अगप ने भाजपा से बातचीत के बाद नुरुल इस्लाम को टिकट दिया था। लेकिन अब भाजपा ने वहां ज्योत्सना कलिता को मैदान में उतार कर दोस्ताना मुकाबले का रास्ता खोल दिया है।
हालाँकि बीजेपी इसे खास तवज्जो देने को तैयार नहीं हैं। प्रदेश भाजपा के मुख्य प्रवक्ता रूपम गोस्वामी ने पत्रकारों से कहा कि बड़ी पार्टियों में टिकटों के एक से ज्यादा दावेदार होने के कारण असंतोष स्वाभाविक है। इससे पार्टी की जीत की संभावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा। निर्दलीय के तौर पर मैदान में उतरने वाले बागी नेता भी शायद अपनी उम्मीदवारी वापस ले लेंगे।
नाराज़गी दूर करने का प्रयास
ऊपरी तौर पर पार्टी भले कुछ भी दावा करे, अंदरखाने उसने बागियों को लुभाने की कवायद शुरू कर दी है। इसके लिए चुनाव बाद उनको मलाईदार पदों पर बिठाने का भरोसा दिया जा रहा है। रविवार को डिमा हसाओ जिले के दौरे पर गए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने घोषणा की कि जिन विधायकों को टिकट नहीं मिले हैं उनको चुनाव के बाद बढ़िया भूमिकाएं दी जाएंगी। टिकट नहीं मिलने का मतलब दुनिया खत्म होना नहीं है।
बागियों को लुभाने की कवायद के तहत पार्टी ने बिहपुरिया के विधायक अमिय कुमार भुइयां को प्रदेश उपाध्यक्ष बना दिया है। वो निर्दलीय के तौर पर मैदान में उतरने का मन बना रहे थे। उनकी जगह कांग्रेस से हाल में आने वाले भूपेन बोरा को टिकट मिलने के बाद भाजपा को वन मैन पार्टी बताया था।
पार्टी के सूत्रों ने बताया कि दिसपुर के विधायक अतुल बोरा भी नाराज चल रहे हैं। लेकिन पार्टी ने उनको अगले लोकसभा चुनाव में टिकट देने का भरोसा दिया है। इस सीट पर कांग्रेस से आने वाले प्रद्युत बोरदोलोई को टिकट मिलने के तुरंत बाद बोरा ने निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ने या कांग्रेस के उम्मीदवार का समर्थन करने का एलान किया था। वो पांच बार इस हाईप्रोफाइल सीट से चुने जाते रहे हैं। लेकिन मुख्यमंत्री हिमंता सरमा से मुलाकात के बाद उन्होंने अपने सुर कुछ नरम कर लिए हैं।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस चुनौतीपूर्ण परिस्थिति से कैसे निपटती है। बगावत के कारण कुछ सीटों पर कड़ा मुकाबला होने की संभावना है। कुछ सीटों पर दोस्ताना मुकाबले की वजह से पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता है।