गुवाहाटी हाई कोर्ट ने नफ़रती भाषण मामले में असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा को नोटिस जारी किया है, उनके भाषणों में विभाजन फैलाने वाली प्रवृत्ति को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। पढ़िए हाई कोर्ट ने क्या क्या कहा।
हिमंता बिस्व सरमा एआई वीडियो का स्क्रीनग्रैब
नफ़रती भाषण मामले में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने सीएम को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस कई याचिकाओं पर जारी किया गया है। इनमें आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री बार-बार मुस्लिम समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रती भाषण दे रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा दिखाए गए कुछ भाषणों में फिसिपरस टेंडेंसी यानी समाज में फूट डालने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। सरमा ने लगातार मुस्लिमों के लिए अपमानित करने वाले शब्द 'मियां' का इस्तेमाल किया और बीजेपी ने मुस्लिमों पर एआई वीडियो जारी किया था जिसे नरसंहार का आह्वान बताया गया।
इन्हीं मामलों में दायर याचिकाओं पर गुवाहाटी हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस अशुतोष कुमार और जस्टिस अरुण देव चौधरी की डिवीजन बेंच ने सुनवाई की। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार कोर्ट ने केंद्र सरकार, असम सरकार, असम के डीजीपी और मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा को नोटिस जारी करने का आदेश दिया। अगली सुनवाई अप्रैल में होगी। कोर्ट ने अंतरिम राहत की मांग पर भी नोटिस जारी किया, लेकिन अभी कोई तुरंत आदेश नहीं दिया।
याचिकाकर्ताओं की तरफ़ से सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी, सीयू सिंह और मीनाक्षी अरोड़ा ने दलीलें दीं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने लगातार, आदतन और जानबूझकर नफरत फैलाने वाले शब्द इस्तेमाल किए हैं। यह संविधान की धर्मनिरपेक्षता, समानता और भाईचारे के ख़िलाफ़ है।
हिमंता पर मुख्य आरोप क्या हैं?
याचिकाकर्ताओं ने कई उदाहरण दिए-
- 27 जनवरी को एक भाषण में मुख्यमंत्री ने कहा था कि 4-5 लाख 'मियां' वोटरों को वोटर लिस्ट से हटाया जाएगा। उन्होंने कहा कि 'हिमंता बिस्व सरमा और बीजेपी मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हैं'। 'मियां' शब्द मुस्लिमों को अपमानजनक तरीके से कहा जाता है।
- बयान में हिमंता ने कहा था कि रिक्शा में किराया 5 रुपये है तो मियांओं को सिर्फ 4 रुपये दें, उन्हें परेशान करें ताकि वे असम छोड़ दें।
- एक वीडियो में बीजेपी के असम यूनिट के हैंडल पर मुख्यमंत्री को बंदूक से दो मुस्लिम पुरुषों की एनिमेटेड तस्वीर पर गोली मारते दिखाया गया। वीडियो में लिखा था 'पॉइंट ब्लैंक शॉट' और 'नो मर्सी'। यह वीडियो 4 दिन तक चला और 10 लाख से ज्यादा बार देखा गया। विवाद बढ़ा तो हटाया गया।
- मुख्यमंत्री ने कहा कि पड़ोसी राज्यों में चुनाव हारे क्योंकि मुस्लिमों ने वोट दिया। बाढ़ को भी एक कॉलेज से जोड़ा, जो अल्पसंख्यक व्यक्ति ने बनवाया था।
- छात्रों से कहा कि एक खास कॉलेज में न जाएं, वरना बाढ़ नहीं रुकेगी।
- छत्तीसगढ़ में उन्होंने बिना पुष्ट आँकड़ों के ही कहा कि असम में मुस्लिम आबादी 1951 में 12% से बढ़कर 40% हो गई।
- वोटरों से अपील की कि 'अकबर' को हटाएँ, वरना "मां कौशल्या की भूमि" अपवित्र हो जाएगी।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऐसे नफ़रती भाषण समाज में फूट डालते हैं, कानून-व्यवस्था बिगाड़ सकते हैं और संविधान के खिलाफ हैं।
हाई कोर्ट में क्या हुआ?
सीनियर एडवोकेट सीयू सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री 'डॉग व्हिसलिंग' यानी संकेतों से नफरत रहे हैं। उन्होंने सरमा के उस बयान का ज़िक्र किया जिसमें उन्होंने कहा था कि मियां मुस्लिम असम में वोट न डालें, बल्कि बांग्लादेश में डालें। हिमंता ने वोट चोरी करने की बात की।
चीफ़ जस्टिस ने कहा, 'जो आप दिखा रहे हैं, उसमें फिसिपरस टेंडेंसी (बाँटने वाली प्रवृत्ति) दिखती है। देखते हैं वे क्या जवाब देते हैं।' कोर्ट ने कहा कि कुछ बयान भड़काऊ लगते हैं, लेकिन हर बयान को अलग-अलग देखना होगा।
याचिकाकर्ता कौन हैं?
याचिका दायर करने वालों में प्रसिद्ध असमिया विद्वान डॉ. हिरेन गोहाईं, कांग्रेस पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी), अन्य नागरिक और संगठन शामिल हैं। वे चाहते हैं कि मुख्यमंत्री पर एफआईआर दर्ज हो, जांच हो और आगे ऐसे भाषण पर रोक लगे।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट जाने को कहा था
जब हिमंता सरमा के नफ़रती भाषण का यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था तो सीजेआई की बेंच ने उल्टे याचिका लगाने वालों को ही फटकार लगा दी थी कि वे हाई कोर्ट जाने के बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुँचे थे। इसने हिमंता के खिलाफ 'हेट स्पीच' के आरोपों पर दाखिल याचिकाओं को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को पहले गुवाहाटी हाई कोर्ट जाने को कहा। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पांचोली की पीठ ने याचिकाओं पर सुनवाई की थी।
लेकिन इसी सुप्रीम कोर्ट ने 25 फ़रवरी को एक अन्य मामले में सुनवाई करते हुए किसी खास समुदाय को निशाना बनाने वाले मंत्रियों को बड़ी चेतावनी दी। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने खास तौर पर कहा कि उच्च संवैधानिक पद पर बैठे लोग किसी समुदाय को धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर निशाना नहीं बना सकते, क्योंकि यह संविधान के खिलाफ है। इसने साफ़ कहा है कि कोई भी व्यक्ति या समूह भाषणों, मीम्स, कार्टून या किसी भी कला के ज़रिए किसी समुदाय का अपमान या निंदा नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी खासकर असम के मुख्यमंत्री के भाषणों को लेकर हाल ही में हुए विवाद के संदर्भ में अहम है। बहरहाल, यह मामला असम में राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बन गया है। एक तरफ याचिकाकर्ता कहते हैं कि मुख्यमंत्री अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं, जिससे समाज में तनाव बढ़ रहा है। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री के समर्थक इसे राजनीतिक हमला बता रहे हैं। अब अप्रैल में सुनवाई में कोर्ट का फ़ैसला अहम होगा।